<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728</id><updated>2012-01-25T22:57:04.143-08:00</updated><category term='RELIGARE ARTS'/><category term='PUNJAB LALIT KALA AKADEMI'/><category term='CHANDIGARH'/><category term='contemporary art'/><category term='UJJAIN'/><category term='SIDHARTH'/><category term='PARUL ARYA'/><category term='SCULPTURE'/><category term='LALIT KALA AKADEMI'/><category term='TRIVENI KALA SANGAM'/><category term='NEENU VIJ'/><category term='FRANSIS NEWTON SOUZA'/><category term='indian contemporary artist'/><category term='SHANTINIKETAN'/><category term='epicentre'/><category term='JAGDISH SWAMINATHAN'/><category term='peris'/><category term='AMI CHARAN SINGH'/><category term='APARNA CAUR ACADEMY'/><category term='indian contemporary art'/><category term='syed haider raza'/><category term='paintings'/><category term='RAVINDRANATH TAGORE'/><category term='JAMIA MILIA ISLAMIA UNIVERSITY'/><category term='ABIDA PARVEEN'/><category term='ruchi goyal kaura'/><category term='MOSCOW INTERNATIONAL YOUNG ART BIENNALE 2010'/><category term='JYOTIRINDRANATH'/><category term='RITU CHOPRA'/><category term='mural'/><category term='SINGING EMPTINESS'/><category term='DEVIBA WALA'/><category term='HINDI KAVITA'/><category term='LINDA HESS'/><category term='DHOOMIMAL ART GALLERY'/><category term='RAVI JAIN'/><category term='ARNOLD HOUZER'/><category term='IBRAHIM ALKAJI'/><category term='CHANDRA SHEKHAR KALE'/><category term='SHIMLA'/><category term='VISHV BHARTI UNIVERSITY'/><category term='mukesh mishra'/><category term='PARMINDER SINGH SANDHU'/><category term='MUKTIBODH'/><category term='THE DECORATED COW'/><category term='SEEMA BAWA'/><category term='KABIR'/><category term='YASHODHARA DALMIA'/><title type='text'>MUKESH MISHRA</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>29</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-5862718700046471769</id><published>2010-10-10T19:51:00.000-07:00</published><updated>2010-10-10T20:41:41.242-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='LINDA HESS'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='APARNA CAUR ACADEMY'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='CHANDRA SHEKHAR KALE'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ABIDA PARVEEN'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SINGING EMPTINESS'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='UJJAIN'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='RITU CHOPRA'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='KABIR'/><title type='text'>ऋतु चोपड़ा की पेंटिंग्स अभिव्यक्ति के स्तर पर कहीं कहीं इंस्टालेशन का-सा आभास देती हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ8KsJd3vI/AAAAAAAAAVQ/svaWmgJA0xQ/s1600/Bini+ChadariyaCMYK+copy.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ8KsJd3vI/AAAAAAAAAVQ/svaWmgJA0xQ/s1600/Bini+ChadariyaCMYK+copy.jpg" width="239" /&gt;&lt;/a&gt;ऋतु चोपड़ा की पेंटिंग्स की 'कहे कबीर' शीर्षक से नई दिल्ली की अपर्णा कौर एकेडमी ऑफ फाइन ऑर्ट्स एण्ड लिटरेचर की कला दीर्घा में 20 अक्टूबर से आयोजित हो रही एकल प्रदर्शनी ने एक फिर कबीर की प्रासंगिकता की जड़ों के गहरे तक धंसे / जमे होने को प्रकट किया है | उल्लेखनीय है कि कबीर की रचनाएँ काव्यत्व और कथ्य की दृष्टि से तो चुनौतीपूर्ण रही ही हैं, उनकी रचनाओं को किसी भी अन्य माध्यम में ट्रांसलेट करना तो और भी अधिक चुनौतीभरा रहा है | इसके बावजूद, विभिन्न माध्यमों के प्रख्यात लोगों ने कबीर की रचनाओं को अपने-अपने तरीके से देखने / परखने और संयोजित करने के प्रयास किए हैं | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि रवींद्रनाथ टैगोर, लिंडा हेस, निनेल गफुरोवा, अली सरदार जाफ़री आदि ने कबीर के पदों को चुन चुन कर अपनी-अपनी भाषाओं में अनुदित किया है और कुमार गंधर्व जैसे महान गायक ने अपने तड़प भरे, आहाल्दक और प्राण उड़ेलने वाले स्वर में उन्हें गाया है | इसका कारण कबीर के संतत्व की विरलता की बजाए उनके कवित्व की विरलता में खोजा / पाया गया है | कबीर की इसी सृजन-शक्ति ने उन्हें वर्तमान में भी प्रासंगिक बनाए रखने में सर्वाधिक भूमिका निभाई है |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ86dgwlnI/AAAAAAAAAVY/3XSDB6HYxOE/s1600/Maan-Hiranya.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ86dgwlnI/AAAAAAAAAVY/3XSDB6HYxOE/s320/Maan-Hiranya.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;युवा चित्रकार ऋतु चोपड़ा द्वारा उनकी रचनाओं के संदर्भों पर आधारित पेंटिंग्स बनाना और प्रदर्शित करना उनकी प्रासंगिकता के बने रहने का ही एक उदाहरण है | वास्तव में कबीर के कवित्व ने ही उनके दर्शन को सर्वाधिक लोक-व्याप्ति और लोक-दृष्टि दी, जिसके चलते वह आज भी प्रासंगिक और चुनौती बने हुए हैं | अलौकिक, अमूर्त वस्तु को लौकिक, मूर्त वस्तु में बदलने की अप्रतिम क्षमता कबीर में थी और कविता के लिए यह सबसे अधिक आवश्यक भी है, क्योंकि स्वयं कविता लौकिक या ऐहिक वस्तु है | ऐहिक होकर ही वह ऐसी 'आँख' बनती है जो अपनी मर्मबेधिता से आर-पार देखती है और अपने छोटे से पटल पार वे सारे दृश्य अंकित करती है जो पाठक की आँख में परावर्तित होते हैं | पारदर्शिता आखिर कहते किसे हैं - जो प्रकाश के पीछे छिपे अँधेरे को या अँधेरे के पीछे छिपे प्रकाश को देख या दिखा सकती है | कबीर की रचनाओं को प्रासंगिक बनाए रखने में वास्तव में कबीर की मानवीय व जटिल द्वंद्वपूर्ण रचना-प्रक्रिया या बुनावट का है जो उनके काव्य में साँस की तरह चलती तो है, पर दिखाई नहीं देती &amp;nbsp; है | क्योंकि यह कविता ही नहीं उनका जीवन भी है जो एक जटिल बुनावट की कहानी है | &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ99a6jR2I/AAAAAAAAAVw/_2Qut4CdIOo/s1600/Pyassi-Meen.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ99a6jR2I/AAAAAAAAAVw/_2Qut4CdIOo/s320/Pyassi-Meen.jpg" width="265" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऋतु चोपड़ा का कबीर से परिचय हालाँकि आबिदा परवीन की आवाज़ के ज़रिये हुआ; आबिदा परवीन की आवाज़ के जादू से प्रभावित होकर उन्होंने कबीर की साखी सुनना शुरू किया तो फिर कबीर उनकी आत्मा और उनकी सोच में रचते-बसते चले गये | कबीर का आत्मा और सोच में रचना-बसना उनके केनवस पर ट्रांसफर हुआ तो उनकी पेंटिग्स एक दर्शक के रूप में हमें व्यक्तिगत आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करती हुई लगती हैं | कबीर की रचनाओं से प्रेरणा पाकर बनी-रची ऋतु की पेंटिंग्स देखते हुए हम ख़ुद को अपने अंदर देखते हुए पाते&amp;nbsp;&amp;nbsp; हैं | कबीर की रचनाओं के प्रभावों और / या अर्थों को विविधतापूर्ण प्रतिरूप रचते हुए ऋतु चाक्षुक बिम्ब की भाषा में ढालती हैं | ऋतु की पेंटिंग्स में प्रकट होने वाली आकृतियाँ और वह परिदृश्य जिसमें वे स्थित हैं, किसी पूर्वस्मृति की आभा से दीप्त लगती हैं | पेंटिंग्स के फ्रेम में जो कहा गया बताया गया है या लगता है, कई बार हम अपने आप को उस फ्रेम से बाहर जाते हुए भी पाते हैं | ऋतु भले ही यह कह रहीं हों कि फलाँ पेंटिंग कबीर के फलाँ दोहे या साखी पर आधारित है, पर उनकी पेंटिंग में कबीर की सारी सोच और उनका सारा दर्शन प्रतिध्वनित हो रहा होता है | शायद यही कारण है कि ऋतु की पेंटिंग्स अभिव्यक्ति के स्तर पर कहीं कहीं इंस्टालेशन का-सा आभास देती हैं | उनकी पेंटिंग्स में - दूसरी, तीसरी, चौथी ....बार देखे जाने पर अनुभव स्थानांतरित होते जाते हैं, बदलते जाते हैं और वह जैसे एक फ्रेम में होने के बावजूद स्पेस में होने का आभास देते हैं |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ_iVVnR9I/AAAAAAAAAV4/HahsFpo2pSA/s1600/Taan+Kamaan+copy.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TLJ_iVVnR9I/AAAAAAAAAV4/HahsFpo2pSA/s320/Taan+Kamaan+copy.jpg" width="264" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऋतु चोपड़ा को कला का संस्कार उज्जैन में &amp;nbsp; मिला | कला की उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त की है, लेकिन कला के प्रति अपनी अभिरुचि को देखते हुए जब उन्हें लगा कि उन्हें कला के तकनीकी पक्ष से भी परिचित होना चाहिए तो कला की प्राथमिक शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए उन्होंने कला शिक्षक और कलाकार चंद्रशेखर काले से मार्गदर्शन प्राप्त &amp;nbsp; किया | इस बीच लिंडा हेस की पुस्तक 'सिंगिंग एम्प्टीनेस' उन्होंने पढ़ी, जिसने ऋतु को स्व से परिचित कराया | लिंडा हेस ने भारत के संत काव्य का विषद अध्ययन किया है और उनके उस विषद अध्ययन को देख / जान कर ऋतु ने जीवन और समाज को आध्यात्मिक नज़रिए से देखना / पहचानना शुरू किया | यह आध्यात्मिक नजरिया कब उनकी पेंटिंग्स में आ पहुँचा, और पेंटिंग्स में अभिव्यक्त होने वाले विषयों, विवरणों, रूपों व रंगों को निर्देशित व नियंत्रित करने लगा, यह ख़ुद उन्हें भी पता नहीं चला | उनके आध्यात्मिक नज़रिए में जो मानवीय पक्ष रहा, वह उन्हें कबीर के पास ले आया | कबीर के दोहे व साखियाँ वह प्रतिदिन रेडियो पर सुबह सुनती ही थीं | ऋतु की पेंटिंग्स के विषय अध्यात्म से जुड़े तो थे ही: लिहाजा धीरे-धीरे कबीर की रचनाओं ने उनके केनवस पर जगह बना ली | 1966 में जन्मी और उज्जैन जैसे कला व अध्यात्म से परिपूर्ण शहर में पली-बढीं ऋतु ने उज्जैन के अलावा देवास, इंदौर, जबलपुर, पुणे, मुंबई, नोएडा आदि में आयोजित समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | वह उज्जैन और दिल्ली में अपनी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनियाँ भी कर चुकीं हैं | इसी वर्ष मई व जुलाई के बीच अमेरिका के सनफ्रांसिस्को में आयोजित हुई एक बड़ी समूह प्रदर्शनी में भी उनकी पेंटिंग्स प्रदर्शित हुईं |&lt;br /&gt;ऋतु चोपड़ा की अपर्णा कौर एकेडमी ऑफ फाइन ऑर्ट्स एण्ड लिटरेचर की कला दीर्घा में 20 अक्टूबर से आयोजित हो रही तीसरी एकल प्रदर्शनी उनकी कला-यात्रा के नए आयामों से परिचित होने का मौका तो हमें देगी ही, कबीर की रचनात्मक प्रासंगिकता का एक और उदाहरण व सुबूत भी प्रस्तुत करेगी |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-5862718700046471769?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/5862718700046471769/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/5862718700046471769'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/5862718700046471769'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='ऋतु चोपड़ा की पेंटिंग्स अभिव्यक्ति के स्तर पर कहीं कहीं इंस्टालेशन का-सा आभास देती हैं'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6Pa9Lv7OI/AAAAAAAAAT4/O9Y3f_0I5ak/s1600/balance%281%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6Pa9Lv7OI/AAAAAAAAAT4/O9Y3f_0I5ak/s320/balance%281%29.jpg" width="241" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मास्को स्थित रूस के भव्य पैलेस म्यूजियम में अभी हाल ही में आयोजित &lt;a href="http://studioverve.blogspot.com/2010/07/moscow.html"&gt;'मास्को इंटरनेश्नल यंग ऑर्ट बिनाले 2010' &lt;/a&gt;में देविबा वाला के काम को चुने जाने की जानकारी ने मुझे इस कारण से खासा रोमांचित किया क्योंकि देविबा की कलाकृतियों को मैंने उस साधक की तरह देखा/पहचाना है &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जो कुछ भी एप्रोप्रियेट नहीं करता | एप्रोप्रियेट करना जैसे उनका धर्म ही नहीं है | उनका धर्म जैसे अज्ञात की खोज है, उस अज्ञात की जिसके बारे में कोई भी न सचेत है और न उत्सुक | और इसीलिए वह किसी चीज़ को, किसी अनुभव को डिस्कवर नहीं करतीं; वह उस अनुभव को रोशनी में लाती हैं जो अब तक अँधेरे में छिपा था |&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;देविबा ने अपने चित्रों के बारे में ख़ुद भी कहा है कि वह कुछ कहते नहीं हैं, बल्कि देखने वाले को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं | क्या सोचने के लिए प्रेरित करते हैं ? इसका जबाव न देविबा देती हैं, और न उनके चित्र | वास्तव में यही वह 'बात' है जो उनके काम को खास बनाती है | उनका काम एक पहेली से हमारा सामना कराता है : कभी हमने सोचा है, हम कहाँ होते हैं जब हम सोच रहे होते हैं ? बहुत सोच-विचार के बाद भी हम ज्यादा से ज्यादा यही कह सकते हैं कि वह चुप्पी की जगह होती है, मौन का एक ठौर जहाँ बहुत से ख्यालों, बहुत सी स्मृतियों, बहुत से दिवास्वप्नों की आवाजाही होती रहती है; और हम अतीत-वर्तमान-भविष्य के भंवर में गोते लगते रहते हैं | वह है क्या या वहाँ होता क्या है, इसका सीधा-सपाट जबाव देने में हमें यदि उलझन होती है तो इसलिए क्योंकि हम तर्कशील मानसिकता में जकड़े होते हैं जो हमें अनुभव को अलग-अलग रूपों में देखने के लिए तैयार करती है | देविबा का काम हमें इस तर्कशील मानसिकता की जकड़न से बाहर आने को प्रेरित करता है | हम यदि उस जकड़न से बाहर आ पायेंगे, तभी देविबा के काम के सामने खड़े रह पायेंगे, अन्यथा उन पर एक उचटती सी नज़र डाल कर आगे बढ़ जायेंगे |&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6QsJ7UVZI/AAAAAAAAAUI/t1xH1PmPCqI/s1600/balance%282%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="316" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6QsJ7UVZI/AAAAAAAAAUI/t1xH1PmPCqI/s320/balance%282%29.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;'मास्को इंटरनेश्नल यंग ऑर्ट बिनाले 2010' में देविबा वाला के साथ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; भारत के 11 और जिन युवा कलाकारों के काम को चुना गया, उनमें एक &lt;a href="http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_24.html"&gt;अर्पित बिलोरिया&lt;/a&gt; के काम से मैं परिचित रहा हूँ | इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानूँगा कि बाकी 10 कलाकारों की कृतियों से मेरा परिचय नहीं है | मास्को बिनाले के लिए 35 देशों से आईं 2500 कलाकृतियों में भारत के जिन 12 युवा &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;कलाकारों की 40 कृतियों&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; को चुना गया, उनमें देविबा वाला और अर्पित बिलोरिया के साथ अजय राजपुरोहित, हितेंद्र भाटी, सुकेशन कंका, पद्मिनी मेहता, संजय सोनी, शरद भारद्वाज, सैयद अकबर अली, तेजसिंह जोसेफ, उमेश प्रसाद तथा विपुल प्रजापति के काम &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मास्को स्थित रूस के भव्य पैलेस म्यूजियम में सुशोभित हुए | &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मास्को बिनाले में देविबा के काम को चुने जाने को एक उदाहरण के रूप में देखते हुए मैं वहाँ प्रदर्शित काम की प्रखरता तथा स्तरीयता का आश्वस्त करने योग्य अनुमान लगा सकता हूँ |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6RW9apBWI/AAAAAAAAAUQ/r6YYWs2eBpo/s1600/emotions+%281%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6RW9apBWI/AAAAAAAAAUQ/r6YYWs2eBpo/s320/emotions+%281%29.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;देविबा वाला के काम के प्रति मेरी दिलचस्पी और आश्वस्ति का एक प्रमुख कारण यह रहा कि उनके काम को जब जब भी देखने का मौका मिला, मैंने अपनी सोच में अस्तित्व को एक अनूठे रूप में प्रस्फुठित होते हुए पाया | देविबा के चित्रों में 'अस्तित्व' की जो झलक 'दिखती' है उसे ज्ञान से एक्ज़्हास्ट करने की कोई कोशिश चित्रों में नहीं नज़र आती है, बल्कि उनमें एक रहस्य जैसा दिखता है | मुझे लगता है कि 'ज्ञान' यदि उनमें होता तो एक तरह के एपोरिया का अनुभव करता | देविबा ने जिस तरह से अपने चित्रों को आकार दिए हैं, उनमें ज्ञान असंभव ही होता और वह एक तरह की इनएक्सेसिबिलिटी का ही अनुभव करता | देविबा के चित्रों में मुझे अनुभूति ज्ञान की जगह लेती हुई नज़र आती है जो अपने आप में बुनियादी तौर पर अधूरापन महसूस कराती है | अनुभूति की अर्हता इसी बात में है कि अनुभूति के क्षण में हमें अपना समस्त ज्ञान अधूरा लगने लगता है | दरअसल इसी कारण देविबा की पेंटिंग्स मुझे एक चुनौती की तरह लगती हैं और मैं बार-बार उनके सामने आने को प्रेरित होता हूँ |&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6Se5-0G5I/AAAAAAAAAUw/WPm2Ubte6Po/s1600/torrent+%2810%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6Se5-0G5I/AAAAAAAAAUw/WPm2Ubte6Po/s320/torrent+%2810%29.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;देविबा ने जो यह ख़ुद माना/कहा है कि उनके चित्र &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;देखने वाले को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, उसे लेकर मेरा अनुमान है कि उनका आशय थिंकिंग के फॉर्मलाइज्ड&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; थिंकिंग में बदलने से नहीं होगा; क्योंकि वह चीज़ अनुभव में सोच की प्रक्रिया को वाधित करती है | अनुभव में सोच का अर्थ मेरे लिए यह है कि अनुभव करते हुए ही रिफ्लेक्ट करना कि मैं क्या कर रहा हूँ | एकदम शुरू में हो सकता है कि रिफ्लेक्शन साफ-साफ न हो सके, चीज़ों को हम बहुत कुछ इंट्यूटिवली एप्रिहेंड करते हैं, दो और दो चार के लगे-बंधे नियम के आधार पर नहीं करते | कल्पना अपनी छलांग के बीच के रास्ते को लाँघ जाती है | यह विज्ञान में भी होता है, और कला में भी | मुझे लगता है कि ये सब चीज़ें हमारे जीवन में महत्त्व रखती हैं, जिसका अहसास देविबा की कला कराती है | जीवन को प्रभावित करने वाली चीजों को, यानि यथार्थ को जानने/पहचानने के लिए किए गए प्रयत्नों में पाया गया कि यथार्थ की तद्भव पहचान संभव नहीं है | माना गया है कि हम जिस किसी भी माध्यम से यथार्थ को पहचानने का उपक्रम करते हैं उस माध्यम का होना ही यथार्थ के हमारे ग्रहण को, हमारी पहचान को अनिवार्यतः प्रभावित करता है | &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6S6ZSi6LI/AAAAAAAAAU4/uZ-jrKCGsM4/s1600/untitled+%283%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6S6ZSi6LI/AAAAAAAAAU4/uZ-jrKCGsM4/s320/untitled+%283%29.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;देविबा के चित्रों का संदर्भ ले कर मैं कहना चाहूँगा कि उनमें हम जो कुछ जान या अनुभव कर पाते हैं वह कोई निरपेक्ष यथार्थ नहीं, हमारे माध्यम की प्रकृति से रूपांतरित यथार्थ होता है | दूसरे शब्दों में, यथार्थ की पहचान की हमारी प्रक्रिया ही हमारा यथार्थ हो जाती है; बल्कि तब वह यथार्थ की पहचान की नहीं, यथार्थ के सृजन की प्रक्रिया हो जाती है और हम उसी का संप्रेषण कर रहे होते हैं | देविबा के काम को जब-जब भी देखने का मौका मिला, तब-तब मैंने महसूस किया कि जैसे जब भी हम यथार्थ की कोंई नई पहचान, यथार्थ के प्रति किसी नई दृष्टि का अनुभव करते हैं तो वास्तव में समूचे यथार्थ का, यथार्थ के हमारे समूचे बोध का नया सृजन कर रहे होते हैं | इसीलिए देविबा की कृतियों से साक्षात्कार के बाद हम वही नहीं रह जाते, हमारा बोध वही नहीं रह जाता - और हम क्या हैं सिवा इस बोध के - जो पहले था ? अपने परिवेश सहित हम नये सिरे से रचे गए हो जाते हैं | देविबा की कला सिर्फ एक कलागत प्रयोग नहीं रह जाती; बल्कि वह हमारी संपूर्ण कला-दृष्टि, कहना चाहिए कि कला के माध्यम से हमारे संपूर्ण यथार्थ-बोध की नयी रचना कर देती है | इसीलिए देविबा की कला एक दर्शक के रूप में हमें आश्वस्त भी करती है और हमारे सामने चुनौती भी प्रस्तुत करती है | &lt;br /&gt;[ आलेख के साथ दिए गये चित्र &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;'मास्को इंटरनेश्नल यंग ऑर्ट बिनाले 2010' में प्रदर्शित देविबा वाला की पेंटिंग्स के हैं | ]&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-6310263763638078164?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/6310263763638078164/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6310263763638078164'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6310263763638078164'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='देविबा वाला की कला यथार्थ की नई पहचान तथा यथार्थ के प्रति नई दृष्टि का अनुभव कराती है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TF6Pa9Lv7OI/AAAAAAAAAT4/O9Y3f_0I5ak/s72-c/balance%281%29.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-47823547298140753</id><published>2010-06-21T21:59:00.000-07:00</published><updated>2010-06-21T22:03:03.500-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SHIMLA'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='JAGDISH SWAMINATHAN'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='HINDI KAVITA'/><title type='text'>जन्मदिन के मौके पर, जगदीश स्वामीनाथन को याद करते हुए</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TCBDLjbaXfI/AAAAAAAAATo/2wZWi7k4h_M/s1600/js.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TCBDLjbaXfI/AAAAAAAAATo/2wZWi7k4h_M/s320/js.jpg" width="210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आज का मेरा दिन प्रखर चित्रकार और बुद्विजीवी जगदीश स्वामीनाथन के नाम रहा | यह याद करते हुए कि आज स्वामीनाथन का जन्मदिन है, मैंने आज का दिन विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा इंटरनेट पर उपलब्ध स्वामीनाथन की पेंटिंग्स के चित्रों को देखते हुए और उनके बारे में छपी/लिखी सामग्री को पढ़ते हुए बिताया | स्वामीनाथन का जन्म वर्ष 1928 में आज के ही दिन शिमला में बसे एक तमिल परिवार में हुआ था | यह जान कर मुझे किंचित हैरानी भी हुई कि चित्रकला में उनकी दिलचस्पी यूँ तो बचपन से ही थी, लेकिन इसे गंभीरता से उन्होंने बहुत बाद में अपनाया | गंभीरता से उन्होंने पहला काम दिल्ली के हिंदू कॉलिज से प्री-मेडीकल की पढ़ाई का किया, पर इसमें ज्यादा दिन उनका मन नहीं लगा | पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में उनका रुझान पैदा हुआ | राजनीतिक जीवन की शुरूआत उन्होंने कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी से की और फिर कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए | राजनीतिक जीवन में ही उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता भी की और बच्चों के लिये कहानियां भी लिखीं | राजनीति से मोहभंग होने के बाद उन्होंने चित्रकला की तरफ कदम बढ़ाया और गंभीरतापूर्वक चित्रकला में रम गये | चित्रकला अपनाने के दौरान उन्होंने कुछ समय हालाँकि पत्रकारिता भी की और काफी कविताएँ भी लिखीं, लेकिन उनकी सक्रियता का मुख्य केंद्र चित्रकला ही रही | चित्रकला संसार में स्वामीनाथन की सक्रियता एक विचारोत्तेजक और उत्कट घटना की तरह देखी/पहचानी गई | जगदीश स्वामीनाथन के जन्मदिन के मौके पर आज उनकी रचनाओं से आमना-सामना करते हुए मैं उनकी 'दूसरा पहाड़' शीर्षक कविता को बार-बार याद करता रहा जो करीब तीस वर्ष पहले लिखी तथा प्रकाशित हुई थी | यहाँ मैं उनकी इस 'दूसरा पहाड़' शीर्षक कविता को दोहराना चाहूँगा :&lt;br /&gt;यह जो सामने पहाड़ है &lt;br /&gt;इसके पीछे एक और पहाड़ है&lt;br /&gt;जो दिखाई नहीं देता &lt;br /&gt;धार धार चढ़ जाओ इसके ऊपर &lt;br /&gt;राणा के कोट तक &lt;br /&gt;और वहाँ से पार झाँको&lt;br /&gt;तो भी नहीं &lt;br /&gt;कभी कभी जैसे &lt;br /&gt;यह पहाड़ &lt;br /&gt;धुंध में दुबक जाता है &lt;br /&gt;और फिर चुपके से &lt;br /&gt;अपनी जगह लौट कर ऐसे थिर हो जाता है &lt;br /&gt;मानों कहीं गया ही न हो &lt;br /&gt;- देखो न &lt;br /&gt;वैसे ही आकाश को थामे खड़े हैं दयार &lt;br /&gt;वैसे ही चमक रही है घराट की छत &lt;br /&gt;वैसे ही बिछी हैं मक्की की पीली चादरें &lt;br /&gt;और डिंगली में पूंछ हिलाते डंगर &lt;br /&gt;ज्यों के त्यों बने हैं, ठूँठ सा बैठा है चरवाहा&amp;nbsp; &lt;br /&gt;आप कहते हो, वह पहाड़ भी &lt;br /&gt;वैसे ही धुंध में लुपका है, उबर जायेगा&lt;br /&gt;अजी जरा आकाश को तो देखो &lt;br /&gt;कितना निम्मल है &lt;br /&gt;न कहीं धुंध न कोहरा न जंगल के ऊपर अटकी &lt;br /&gt;कोई बदल की फुही &lt;br /&gt;वह पहाड़ दिखायी नहीं देता महाराज &lt;br /&gt;उस पहाड़ में गूजरों का एक पड़ाव है &lt;br /&gt;वह भी दिखाई नहीं देता &lt;br /&gt;न गूजर, न काली पोशाक तनी&lt;br /&gt;कमर वाली उनकी औरतें &lt;br /&gt;न उन के मवेशी न झवड़े कुत्ते &lt;br /&gt;रात में जिनकी आँखें &lt;br /&gt;अंगारों सा धधकती हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पहाड़ के पीछे जो वादी है न महाराज &lt;br /&gt;वह वादी नहीं, उस पहाड़ की चुप्पी है &lt;br /&gt;जो बघेरे की तरह घात लगाये बैठा है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-47823547298140753?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/47823547298140753/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/47823547298140753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/47823547298140753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='जन्मदिन के मौके पर, जगदीश स्वामीनाथन को याद करते हुए'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TCBDLjbaXfI/AAAAAAAAATo/2wZWi7k4h_M/s72-c/js.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-3255405151078828430</id><published>2010-05-31T22:50:00.000-07:00</published><updated>2010-06-01T23:11:28.183-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='AMI CHARAN SINGH'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='MUKTIBODH'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><title type='text'>अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TASeqGzVk3I/AAAAAAAAAS4/EHjcG5E6j9w/s1600/Ami+4.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TASeqGzVk3I/AAAAAAAAAS4/EHjcG5E6j9w/s320/Ami+4.JPG" width="144" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अमी चरणसिंह तीन सीरीज़ में मुक्तिबोध की कविता 'मुझे क़दम-क़दम पर चौराहे मिलते हैं' को लेकर जो चित्र-रचना कर रहे हैं, उसके कुछेक चित्र अभी हाल ही में देखने को मिले तो मुझे बरबस ही कला-रूपों के अंतर्संबंधों पर महादेवी वर्मा की 'दीपशिखा' की भूमिका याद आ गई जिसमें उन्होंने&amp;nbsp;लिखा था कि 'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता&amp;nbsp;&amp;nbsp; है |' इस क्षमता के बावजूद, हालाँकि आधुनिक कविता और चित्रकला के बीच रिश्ता पिछले वर्षों में कमजोर पड़ता गया है | ऐसे में अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है | अमी चरणसिंह पिछले करीब तीन वर्ष से भारत के एक महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की उक्त कविता को विभिन्न रूपों में चित्रित कर रहे हैं | पहले उन्होंने पेपर पर दो-एक रंगों में एक्रिलिक से काम किया, फिर कई रंगों में काम किया और हाल ही में उन्होंने पेपर पर ऑयल से उक्त कविता को 'देखा' | अमी चरणसिंह ख़ुद भी कविताएँ लिखते हैं और उनकी कविताएँ पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं हैं | &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TASgMzyQp0I/AAAAAAAAATI/RAHlNE8SMag/s1600/Ami+2.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TASgMzyQp0I/AAAAAAAAATI/RAHlNE8SMag/s320/Ami+2.JPG" width="160" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अमी चरणसिंह ने चित्र-रचना और कविता लिखने का काम अपने जीवन में हालाँकि देर से शुरू किया - इतनी देर से कि उनके कॉलिज के साथियों को हैरान होकर उनसे पूछना पड़ा कि 'यह' सब कब हुआ ? कला की दुनिया में अमी चरणसिंह की सक्रियता कला समीक्षक के तौर पर शुरू हुई थी | हालाँकि इससे पहले, कॉलिज के दिनों में उन्होंने प्रसिद्व चित्रकार भाऊ समर्थ पर एक किताब का संपादन किया था | कला प्रदर्शनियों के साथ-साथ उन्होंने फिल्मों पर भी समीक्षात्मक रिपोर्ट्स लिखीं; और फिर वह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाने लगे | उन्होंने कला और कलाकारों पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाईं | यही सब करते हुए वह कब चित्र बनाने लगे, यह दूसरों को तो क्या शायद उन्हें भी पता नहीं चला | जब 'पता' चला तब उन्होंने चित्र-रचना के काम को गंभीरता से लेना शुरू किया | मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में अपने चित्रों को प्रदर्शित करने के साथ-साथ उन्होंने दिल्ली व मुंबई में भी अपने चित्रों को प्रदर्शित किया है | मुक्तिबोध की कविता पर अमी चरणसिंह ने जो चित्र बनाए हैं उनमें चित्रकला की जटिल शास्त्रीयता भी है, और इसीलिए यह उल्लेखनीय भी हैं | मुक्तिबोध की कविताओं पर फिल्में भी बन चुकीं हैं, जिन्हें प्रसिद्व फिल्म निर्माता मणि कौल ने संभव किया था | ज़ाहिर है कि मुक्तिबोध की कविताएँ दूसरे कला माध्यमों में काम करने वाले कलाकारों के लिये प्रेरणा और चुनौती की तरह रहीं हैं | अमी चरणसिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया और निभाया, तो यह कला के प्रति उनकी प्रतिबद्वता का सुबूत भी है |&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TAShIWBkiYI/AAAAAAAAATY/OK4Yhbj1J0w/s1600/Ami+1.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TAShIWBkiYI/AAAAAAAAATY/OK4Yhbj1J0w/s320/Ami+1.JPG" width="234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अमी चरणसिंह ने कला के प्रति अपनी प्रतिबद्वता का सुबूत प्रस्तुत करते हुए वास्तव में हिंदी की कला-चिंतन की उस समृद्व परंपरा को ही निभाने की कोशिश की है, जिसके तहत अनेक कवि-कथाकारों ने चित्रकला में भी अपनी सक्रियता रखी और दिखाई है | महादेवी वर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, जगदीश गुप्त, रामकुमार, लक्ष्मीकांत वर्मा, चंद्रकांत देवताले, विपिन अग्रवाल, विजेंद्र, नरेन्द्र जैन आदि कुछ नाम तुरंत याद आ रहे हैं - नाम और भी हैं तथा इस सूची को और बढाया जा सकता है | मकबूल फ़िदा हुसैन, गुलाम मोहम्मद शेख, जगदीश स्वामीनाथन, जय झरोटिया जैसे मशहूर चित्रकारों ने कविताएँ भी लिखीं | मुझे याद आया कि ऑल इंडिया फाइन ऑर्ट एण्ड क्रॉफ्ट सोसायटी (आइफैक्स) ने कई वर्ष पहले कविता लिखने वाले चित्रकारों के काव्यपाठ का कार्यक्रम आयोजित किया था | कवियों द्वारा चित्रकारों और या उनके चित्रों पर कविताएँ लिखने के तो असंख्य उदाहरण मिल जायेंगे | इसका उल्टा भी खूब हुआ है | चित्रकारों ने कविताओं को केनवस पर उतारने में भी काफी दिलचस्पी ली हैं | कालिदास की प्रसिद्व काव्य-कृति 'मेघदूत' चित्रकारों को शुरू से ही आकर्षित करती रही है | 'बिहारी सतसई' ने अनेक चित्रकारों को अपनी ओर आकर्षित किया | यहाँ यह याद करना भी प्रासंगिक होगा कि पिकासो से कवियों के कितने गहरे रिश्ते थे और नये काव्यान्दोलनों को जन्म देने में उसके अभिनव प्रयोगों की क्या भूमिका थी | गुलाम मोहम्मद शेख ने कविताएँ तो लिखी हीं, कबीर की कविताओं पर एक पूरी श्रृंखला भी बनाई थी | विवान सुन्दरम ने कई कविताओं पर पेंटिंग्स बनाई हैं | जय झरोटिया ने सौमित्र मोहन की 'लुकमान अली' कविता पर एक पूरी श्रृंखला बनाई थी | अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त करने के लिये शब्दों के अतिरिक्त रंगों और रेखाओं का सहारा लेने का उपक्रम सिर्फ हिंदी के लेखकों ने ही नहीं किया है, बल्कि अन्य भाषों के लेखकों के बीच भी इस तरह के उदाहरण मिल जायेंगे | यहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर को याद करना प्रासंगिक होगा | फ्रांसीसी कवि एपोलिनेयर और आंद्रे ब्रेतों ने तो अपने समय के प्रसिद्व अतियथार्थवादी (सुर्रियलिस्ट) कला-आंदोलन में खासी सक्रियता दिखाई थी |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TAShmjn5aaI/AAAAAAAAATg/Kyw0ZdqX820/s1600/Ami+3.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TAShmjn5aaI/AAAAAAAAATg/Kyw0ZdqX820/s320/Ami+3.JPG" width="145" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कविता, भाषा और मानवीय अनुभवों की प्रतीकात्मक दुनिया है | चित्रकला इस प्रतीकात्मक दुनिया को चाक्षुषता से जोड़ कर दृश्य में रूपांतरित करते हुए प्रभावोत्पादक ढंग से अधिक स्पष्ट और सम्प्रेषणीय बना सकती है | कविता शब्दों का संसार अवश्य है; किंतु साहित्य में कविता ही ऐसी विधा है जिसमें शब्दों का अतिरिक्त अर्थ बहुत अधिक होता है | वह अनुभव, यथार्थ, स्मृति, कल्पना और स्वप्नों की सांकेतिक बुनावट के साथ ही द्वंद्व, तनाव, व्यंग्य और यातना की विस्फोटक दुनिया भी है | चित्र में उसे साधना स्वाभाविक रूप से एक बड़ी चुनौती है - तब तो और भी जबकि कवि-कर्म और चित्र-रचना दोनों ही व्यक्तिगत साधना की चीज़ &amp;nbsp;&amp;nbsp; हैं | भले ही - जैसा कि महादेवी वर्मा ने कहा है कि - 'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता है', लेकिन फिर भी उनमें एक के दूसरे पर प्रभाव तलाशने की कोशिश फिजूल की बात ही समझी जाती है | कवि-कर्म और चित्र-रचना एक दूसरे को प्रभावित और प्रेरित तो करते हैं तथा उनमें संबंध भी होता है; लेकिन कविता कविता का काम करती है, और चित्र चित्र का | दोनों का काम और प्रभाव अलग-अलग ही होगा | इसीलिए मुक्तिबोध की कविता पर बनाए गये अमी चरणसिंह के चित्रों को देखते हुए मैं उनमें मुक्तिबोध की कविता को नहीं अमी चरणसिंह की रचनात्मकता को समझने / पहचानने की कोशिश करता हूँ - ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान यूँ भी मुक्तिबोध के ही दिये गये पद हैं |&lt;br /&gt;मध्यकाल के बाद और खासतौर से उत्तर मध्यकाल के बाद चित्रकला व कविता के बीच जो प्रभावपरक रिश्ता बना था वह आधुनिक परिवेश में किसी नवोत्थान के साथ आगे नहीं बढ़ सका और धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया | उक्त रिश्ता कमजोर जरूर पड़ गया है, पर पूरी तरह बिसरा नहीं है; और उस रिश्ते को नये रूप में खोजने / बनाने के प्रयास भी जारी दिखते ही हैं | ऐसे में, मुक्तिबोध की कविताओं पर अमी चरणसिंह का सीरीज़ में काम करना - मैं फिर दोहराना चाहूँगा कि - आश्वस्त करता&amp;nbsp; है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-3255405151078828430?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/3255405151078828430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/3255405151078828430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/3255405151078828430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html' title='अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/TASeqGzVk3I/AAAAAAAAAS4/EHjcG5E6j9w/s72-c/Ami+4.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-6689938631567525440</id><published>2010-05-11T21:38:00.000-07:00</published><updated>2010-05-11T21:56:15.418-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='PARUL ARYA'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='JAMIA MILIA ISLAMIA UNIVERSITY'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TRIVENI KALA SANGAM'/><title type='text'>पारुल की चित्रकृतियों में रूपकालंकारिक छवियों को बहुत सूक्ष्मता के साथ विषयानुरूप चित्रित किया गया है</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-owy84XUhI/AAAAAAAAASQ/fg-UcxwSlhs/s1600/Hanuman.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-owy84XUhI/AAAAAAAAASQ/fg-UcxwSlhs/s320/Hanuman.JPG" width="234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;त्रिवेणी कला दीर्घा में 28 मई से शुरू हो रही पारुल आर्य के चित्रों की 'अ मैटर ऑफ फेथ' शीर्षक एकल प्रदर्शनी में व्यक्ति के विश्वास के विविधतापूर्ण रूपों की अभिव्यक्ति&amp;nbsp;को देखा जा सकेगा | पारुल के चित्रों की यह चौथी एकल प्रदर्शनी है, जो करीब तीन वर्ष बाद हो रही है | इससे पहले, सितंबर 2007 में 'नेचर' शीर्षक से उनके चित्रों की तीसरी एकल प्रदर्शनी हुई थी | उससे पहले, वर्ष 2006 तथा वर्ष 2004 में क्रमशः 'एक्सप्रेशंस' तथा 'सिटी स्पेस' शीर्षक से उन्होंने अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनी की थी | इस बीच अमेरिका के कोलंबिया में पोर्टफोलिओ आर्ट गैलरी में भी कला प्रेक्षकों व दर्शकों को उन्होंने अपने चित्रों को दिखाया है | 'ह्युमनिटी चैलेंजेड' शीर्षक से नई दिल्ली की ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में आयोजित हुई एक समूह प्रदर्शनी में भी पारुल ने अपने चित्रों को प्रदर्शित किया था | पारुल को अपनी कला प्रतिभा को निखारने तथा उसे वैचारिक स्वरूप प्रदान करने का मौका उस समय मिला, जब उन्होंने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविधालय से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया | कला की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के साथ पारुल ने अपनी जिस कला-यात्रा को समकालीन कला जगत में विधिवत रूप से शुरू किया, उसमें उन्होंने प्रायः एक दार्शनिक भावभूमि पर खड़े होकर ही अपने चित्रों की रचना की है | पारुल आर्यकी सिटी स्पेस श्रृंखला की 'सिटी ऑफ कलर्स', 'पर्पल हेज', 'रिफ्लेक्शन ऑफ नाईट', 'इन द लैंपलाइट' शीर्षक चित्रकृतियाँ तथा&amp;nbsp;ह्युमनिटी चैलेंजेड श्रृंखला की 'द सर्च', 'इयरिंग', 'माई इंसपिरेशन', 'होप' शीर्षक चित्रकृतियाँ न केवल अपनी अंतर्वस्तु में महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं, बल्कि फॉर्म में भी महत्त्वपूर्ण हैं |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-o0gD5BCqI/AAAAAAAAASo/Yi-34Uqq1-o/s1600/Tree+Worshippers.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="267" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-o0gD5BCqI/AAAAAAAAASo/Yi-34Uqq1-o/s320/Tree+Worshippers.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इनके अलावा 'डिवोशन', 'वाइल्ड फैंटेसी', 'सन एण्ड लीव्स', 'ए ट्री बाय माई विंडो' शीर्षक चित्रकृतियों में भी गंभीर दार्शनिक विमर्शों को पारुल ने जिस तरह चित्रित किया है, उसके चलते ही उन्हें युवा कलाकारों के बीच एक अलग पहचान मिली है | 'अ मैटर ऑफ फेथ' शीर्षक की चित्रकृतियों में जीवन के द्वैत को बखूबी दर्शाया गया है | जीवन के द्वंद्वात्मक स्वरूप को चित्रित करती ये कलाकृतियाँ पारुल की रचनात्मकता के एक नये आयाम से हमारा परिचय कराती हैं | इन चित्रकृतियों में रूपकालंकारिक छवियों को बहुत सूक्ष्मता के साथ विषयानुरूप चित्रित किया गया है | उनकी कला यात्रा के इस चरण की चित्रकृतियों का चरित्र रूपकालंकारिक तो है ही, साथ ही वह&amp;nbsp;रेटॉरिकल भी है | पारुल की पेंटिंग्स से गुज़रना अपने आस-पास की दुनिया को अपने भीतर जगह बनाते हुए महसूस करते गुज़रने जैसा है, और इस तरह एक अलग अनुभव देता है | यूं तो प्रत्येक कलाकार के लिये यह अभीष्ट है कि वह अपनी विशिष्टताओं और सृजन शैली के माध्यम से एक भिन्न तरह की कला का सृजन&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; करे | वास्तव में यह सचमुच की जीती जागती दुनिया का ही कलात्मक प्रत्याख्यान होता है जिसमें उस कलाकार की अपनी जीवन-दृष्टि, संवेदना और अनुभव समाहित होते हैं | &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-ox8aLiBUI/AAAAAAAAASg/LJLXlGyvTS8/s1600/Being+Shiva.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-ox8aLiBUI/AAAAAAAAASg/LJLXlGyvTS8/s320/Being+Shiva.JPG" width="258" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पारुल के कुछेक काम एक चेहरे के इर्द-गिर्द हैं - अपने रूपों, विरूपणों और विकृतियों में व्यक्त होता एक मानवीय चेहरा | लेकिन उनके कई कामों में मानवीय चेहरे या आकृतियों के साथ वाहय-जगत की उपस्थिती भी दिखती है | यह वाहय-जगत कभी व्यक्ति (चेहरे) के कंट्रास्ट में है, कभी द्वंद्व में तो कभी सहयोजन में | व्यक्ति के आभ्यंतर और वहिर्जगत का संबंध पारुल के चित्रों में अनेक रूपाकारों में तो दर्ज है ही, उसे उनके अमूर्त चित्रों में भी पहचाना जा सकता है | पारुल के चित्रों का प्रतिसंसार एक ओर मनुष्य के अंतर्जगत की उथल-पुथल को रूपायित करता है, तो दूसरी ओर व्यक्ति को बाहय-परिवेश से द्वंद्वरत दिखाता है | पारुल के चित्रों की विवरण-बहुलता एक खास अर्थवत्ता रखती है और इसी कारण से हमें हमारे विश्वासों और हमारे आसपास की स्थितियों के प्रति सोचने-विचारने के लिये प्रेरित करती है | &lt;br /&gt;28 मई से नई दिल्ली की त्रिवेणी कला दीर्घा में शुरू हो रही 'अ मैटर ऑफ फेथ' शीर्षक एकल प्रदर्शनी में पारुल आर्य के चित्रों को 6 जून तक देखा जा सकेगा |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-6689938631567525440?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/6689938631567525440/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/05/blog-post_11.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6689938631567525440'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6689938631567525440'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/05/blog-post_11.html' title='पारुल की चित्रकृतियों में रूपकालंकारिक छवियों को बहुत सूक्ष्मता के साथ विषयानुरूप चित्रित किया गया है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-owy84XUhI/AAAAAAAAASQ/fg-UcxwSlhs/s72-c/Hanuman.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-2601386695422387280</id><published>2010-05-07T03:51:00.000-07:00</published><updated>2010-05-07T04:00:15.281-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='VISHV BHARTI UNIVERSITY'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='JYOTIRINDRANATH'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='RAVINDRANATH TAGORE'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SHANTINIKETAN'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><title type='text'>रवीन्द्रनाथ टैगोर के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PvecaPfqI/AAAAAAAAARo/JRhL_z17kns/s1600/RT+9.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PvecaPfqI/AAAAAAAAARo/JRhL_z17kns/s320/RT+9.jpg" width="228" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रवीन्द्रनाथ टैगोर की आज 150 वीं वर्षगांठ शुरू हो रही है | 7 मई 1861 को जन्मे रवीन्द्रनाथ ने अस्सी वर्ष की उम्र पाई थी | 7 अगस्त 1941 को अंतिम साँस लेने से पहले एक हजार से ज्यादा कविताओं, दो हजार से ज्यादा गीतों, करीब दो दर्जन नाटकों, आठ उपन्यासों, कहानियों के आठ से ज्यादा संकलनों, राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक-साहित्यिक विषयों पर लिखे तमाम लेखों&amp;nbsp;की रचना करने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर को जानने वाले लोगों में बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि उन्होंने करीब 2500 पेंटिंग्स व स्केचेज भी बनाए हैं, जिनमें से 1500 से कुछ ज्यादा शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविधालय के संग्रहालय में देखे जा सकते हैं | वर्ष 1913 में 52 वर्ष की उम्र में साहित्य के लिये नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाले रवीन्द्रनाथ के चित्रों की पहली प्रदर्शनी वर्ष 1930 में जब हुई थी, तब वह 69 वर्ष के थे | दिलचस्प संयोग है कि 80 वर्ष पहले पेरिस में हुई रवीन्द्रनाथ के चित्रों की यह पहली प्रदर्शनी इन्हीं दिनों हुई थी | 5 मई से 19 मई 1930 के बीच हुई प्रदर्शनी की इतनी जोरदार चर्चा हुई कि इसके तुरंत बाद यह प्रदर्शनी कई यूरोपीय देशों में हुई | भारत में उनके चित्रों की पहली प्रदर्शनी पेरिस में हुई प्रदर्शनी के ठीक एक वर्ष बाद, वर्ष 1931 में कलकत्ता में हुई |&lt;br /&gt;रवीन्द्रनाथ में चित्रकला के प्रति यूं तो बचपन से ही उत्सुकता का भाव था | अपने बड़े भाई ज्योतिरिन्द्रनाथ को स्केच बनाते देख वह ड्राइंग के प्रति आकर्षित व प्रेरित हुए थे और बचपन में उन्होंने कुछेक ड्राइंग व स्केच बनाए भी थे | उन दिनों उन्हें चूंकि सभी कुछ आकर्षित करता था और अपनी बहुआयामी प्रतिभा के कारण वह अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों में सक्रिय हो रहे थे, इसलिए चित्रकला की औपचारिक शिक्षा वह नहीं ले सके |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PwQVNixhI/AAAAAAAAARw/2YfsHawb4Ys/s1600/RT+1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PwQVNixhI/AAAAAAAAARw/2YfsHawb4Ys/s320/RT+1.jpg" width="250" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसके बावजूद चित्रकला के प्रति अपनी अदम्य आकांक्षा से वह मुक्त नहीं हो सके और रेखांकन व चित्रांकन, रंग और रूप उनको हमेशा ही सहज भाव से उल्लसित तथा उद्वेलित करते रहे | इसी का नतीजा रहा कि जब भी और जैसे भी उनको यह अंतर्प्रेरणा मिली कि वह चित्रों के माध्यम से अपनी गहनतम अनुभूतियों को बहिर्गमित कर सकते हैं, उन्होंने निहायत सरलता व सुगमता से अपना मंतव्य पूरा कर लिया | चित्रकला के संदर्भ में उनकी सृजनात्मक ऊर्जा इतने तीव्र आवेगात्मक रूप में अवतरित हुई कि उसने उन्हें जानने वालों के साथ-साथ ख़ुद उन्हें भी चकित और स्तंभित किया | उन्होंने कहा भी है कि चित्रकला के लिये उन्हें जो मौका मिला वह परमपिता से उन्हें अतिरिक्त जीवन के रूप में मिला | रवीन्द्रनाथ ने कला की कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं की थी, लेकिन अपनी इस कमी को उन्होंने अपने लिये एक अवसर में बदल दिया और रंग व रेखाओं की अभिव्यक्ति में उन्होंने नये और अभिनव आवेगपूर्ण प्रयोग किए | यह प्रयोग वह इसलिए भी कर सके क्योंकि बंगाल चित्रशैली से वह नितांत अपरिचित व अछूते ही थे | इस अछूतेपन के कारण ही वह बंगाल चित्रशैली को उसकी जड़ और रूढ़ मान्यताओं से मोक्ष दिलवा सके | यह काम रवीन्द्रनाथ जैसी प्रतिभा के लिये ही संभव था | उनके इन्हीं आवेगपूर्ण प्रयोगों के चलते रवीन्द्रनाथ की कला-भाषा का त्वरित किंतु क्रमिक विकास हुआ | रवीन्द्रनाथ ने अपने अंतर्जगत को आलोकित करने के लिये जिस समय चित्रकला को चुना था, उस समय तक वह एक महान कवि और प्रखर दार्शनिक के रूप में अपनी प्रभावी पहचान बना चुके थे | ज़ाहिर है कि एक कवि और दार्शनिक के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ दे देने के बाद भी उनके अंतर्जगत में संवेगों का खजाना अभी बाकी था जो रूपायित होने के लिये एक भिन्न माध्यम पर सवार होने का इंतजार कर रहा था | रवीन्द्रनाथ ने इस भिन्न माध्यम के रूप में चित्रकला को पहचाना और कला-जगत को अनेकानेक अमूल्य निधियाँ प्रदान कीं |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PxMFW0C2I/AAAAAAAAASA/HVTRD_qe0WY/s1600/RT+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PxMFW0C2I/AAAAAAAAASA/HVTRD_qe0WY/s320/RT+3.jpg" width="255" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रवीन्द्रनाथ के चित्रों से स्थापित कृतियों जैसी परिपूर्णता की मांग करना अन्याय ही होगा, क्योंकि उनकी चित्र-कृतियाँ वृद्वावस्था के तथा एक ऐसे हाथ के काम हैं जो कलागत अनुशासन से सर्वथा अनभिज्ञ था | इसका अभाव उनकी विशेषता का अंग है, जिसमें विसंगति, दृष्टि व रूपरंग की न होकर, रूपरंग और प्रस्तुति की है | यह अभाव स्वयं रूपभाषा में ही एक प्रकार की कारुणिकता उत्पन्न करता है | अपने काम की समस्त मांगें पूरी कर रवीन्द्रनाथ जब काम की तन्मयता से बाहर आते थे तब वह काम की प्रासंगिकता पर सोचते निश्चय ही थे | फिर भी वह जो काम कर रहे थे वह उन्हें करना ही था, क्योंकि मनोवेगों की अनिवार्यता ने उनके हाथ की शक्ति-सीमाओं पर अधिकार कर लिया था | इसके चलते रवीन्द्रनाथ रचना प्रक्रिया की लय और तर्कसंगति के अनुकूल काम करने को 'विवश' थे | इस पूरी प्रक्रिया में वह जैसे अपने भीतर से दिशानिर्देशित थे, उन्होंने इस भीतरी निर्देशन को मानते हुए काम में हाथ लगाया, मनोवेग को एक रूपाकार में बदला और एक रूपरंग दे दिया | चित्र बन जाने पर ख़ुद रवीन्द्रनाथ भी चकित होते थे | चित्र में यद्यपि पूर्णता का अभाव रहता, पर वह पूर्ण प्रतीत होती | शायद यही कारण रहा होगा कि वह अपनी किसी चित्रकृति का शीर्षक न तो दे पाए और न ही उन्होंने दिया | &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-Pxg-bcpfI/AAAAAAAAASI/O5qdMVtcYxg/s1600/RT+7.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="282" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-Pxg-bcpfI/AAAAAAAAASI/O5qdMVtcYxg/s320/RT+7.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रवीन्द्रनाथ में सृजनशीलता का सीधा नाता उनके व्यक्तिगत आत्मसंलाप से था | वह वही चित्रित कर रहे थे जो वह स्वयं थे | उनकी रचनात्मक मेधा और उनके आत्म-प्रकाश के बीच में कोई छाया न थी | समस्त जीवन और उसकी क्षणभंगुरता एवं निस्सारता का भाव उनकी कृतियों में देखा जा सकता है, साथ ही जीवन और आकांक्षा के अविभक्त, स्पंदनशील रूपाकार को भी ये चित्र निरुपित करते हैं | यही उनकी कविता का भी मुख्य स्वर है | रवीन्द्रनाथ के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं | रूपों और भंगिमाओं का विस्तार अभिव्यक्ति द्वारा निर्दिष्ट होता है और जीवन की चलती-फिरती दृश्यावली इस प्रमुख धारणा के अधीन है कि जीवन की प्रत्येक घटना एक साथ मानवीय और देवीय है | रवीन्द्रनाथ की कला अपनी अकृत्रिमता, करुणा और मनोहरता से हमें उद्वीप्त करती है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-2601386695422387280?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/2601386695422387280/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/2601386695422387280'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/2601386695422387280'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='रवीन्द्रनाथ टैगोर के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S-PvecaPfqI/AAAAAAAAARo/JRhL_z17kns/s72-c/RT+9.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-1591248680166963627</id><published>2010-04-16T23:02:00.000-07:00</published><updated>2010-04-16T23:21:59.670-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='NEENU VIJ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ARNOLD HOUZER'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='epicentre'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><title type='text'>नीनू विज के चित्र लैंडस्केप का आभास देते हुए भी दरअसल जगहों, वस्तुओं, रूपों और मानसिक गतियों का एक निचोड़ हैं</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lPL5_A-9I/AAAAAAAAARQ/y8q0nFbuQQ0/s1600/Invitation.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lPL5_A-9I/AAAAAAAAARQ/y8q0nFbuQQ0/s320/Invitation.jpg" width="229" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नीनू विज की गुड़गाँव के एपैरल हॉउस में स्थित&amp;nbsp;एपिसेंटर कला दीर्घा में 17 अप्रैल से आयोजित होने जा रही एकल प्रदर्शनी के शीर्षक 'एण्ड सो द स्टोरी गोज ....' ने मुझे हंगरी के विख्यात कला इतिहासकार आर्नल्ड हाऊजर की वह उक्ति याद दिला दी, जिसमें उन्होंने कलाकृति की तुलना दुनिया की ओर खुलने वाली खिड़की से की है | 'एण्ड सो द स्टोरी गोज ....' शीर्षक में मुझे ठीक खिड़की वाले अर्थ ही ध्वनित होते लगे हैं जो भविष्य की ओर - दुनिया की ओर खुलने&amp;nbsp;का दावा या वायदा कर रहा है | नीनू विज की कलाकृतियों से मैं परिचित हूँ और उनकी कलाकृतियों को लगातार मैं देखता रहा &amp;nbsp; &amp;nbsp; हूँ | नीनू पिछले काफी समय से प्रकृति-उपकरणों को लेकर ही काम कर रहीं हैं और इन उपकरणों की एक समानता के बावजूद हर बार उनके काम में एक और गहराई दीख पड़ती है | नीनू विज के कैनवस पहली नज़र में लैंडस्केप का आभास देते हैं | लेकिन उनके चित्र निरे लैंडस्केप नहीं हैं | उनके चित्रों में प्रकृति-उपकरण किसी यथातथ्य चित्रण के रूप में प्रकट नहीं हैं, बल्कि उसी रूप में वह कैनवस पर दिखते हैं, जिसमें वह उनके मन के आकाश को बदलते रहे हैं या जिस रूप में नीनू विज के मन का आकाश उनमें अपने को प्रक्षेपित करता रहा है | भीतरी-बाहरी 'दुनिया' और स्पेस के एक गहरे अंतर्संबंध को नीनू विज के चित्रों में बराबर से साफ़ देखा / पहचाना जा सकता है | इसीलिए 'एण्ड सो द स्टोरी गोज ....' शीर्षक मुझे बहुत मौजूं भी लगा और सटीक भी | इस शीर्षक के चलते, नीनू विज के पिछले काम जब मेरी स्मृति में आते गये तो सहसा आर्नल्ड हाऊजर की खिड़की वाली उक्ति याद आ गई | &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lPuyhsHPI/AAAAAAAAARY/tc2Dbg6pugg/s1600/neenu+1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lPuyhsHPI/AAAAAAAAARY/tc2Dbg6pugg/s320/neenu+1.jpg" width="236" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आर्नल्ड हाऊजर ने कलाकृति की तुलना जब दुनिया की ओर खुलने वाली खिड़की से करने की सोची होगी, तब उनका आशय यही रहा होगा कि देखने वाला चाहे तो सारा ध्यान खिड़की पर ही दे या बिल्कुल ही न दे | वह चाहे तो खिड़की के शीशे की गुणवत्ता, संरचना या रंग से बिना कोई मतलब रखे सीधे बाहर के दृश्य का अवलोकन करे | इस तुलना के मुताबिक, कलाकृति को अनुभवों का वाहक मात्र, खिड़की का पारदर्शी कांच या आँख का चश्मा कहा जा सकता है जिस पर पहनने वाला कोई ध्यान नहीं देता है और जो एक उद्देश्य का साधन मात्र है | इसके विपरीत, कोई चाहे तो बाहरी दृश्य को नजरंदाज करके अपना सारा ध्यान खिड़की के कांच और उसकी संरचना पर ही लगाये रह सकता है; मतलब कलाकृति को एक स्वतंत्र, अपारदर्शी रूपगत संरचना, अपने बाहर की किसी भी चीज से अलग थलग स्वयंसंपूर्ण सत्ता की तरह देख सकता है | निस्संदेह, कोई भी जब तक चाहे खिड़की के कांच पर ही टकटकी लगाये रख सकता है, लेकिन ध्यान देने की और याद रखने की बात यह है कि खिड़की बाहरी दुनिया को देखने के लिये बनी होती है |&lt;br /&gt;नीनू विज के चित्रों के सामने खड़े होते ही हम&amp;nbsp;अपने भीतर और बाहर 'देखने' के लिये प्रेरित होते है | नीनू विज के चित्रों में हर बड़ी-छोटी चीज का रचनात्मक इस्तेमाल होता हुआ दिखता है : जितना ध्यान उन्होंने किसी रंग की व्याप्ति पर दिया है, उतना ही उस छोटे से रंग क्षेत्र पर या रंगतों पर भी दिया है जो इस व्याप्ति के बीच - तेज 'बहाव' के बीच - झांक रहा है | शायद इसीलिए नीनू विज के चित्र लैंडस्केप का आभास देते हुए भी दरअसल जगहों, वस्तुओं, रूपों और मानसिक गतियों का एक निचोड़ हैं | रंगों में यह निचोड़, रंगभाषा के बारे में हमारी संवेदना में बहुत कुछ जोड़ता है | दरअसल यहीं आकर हम यह भी पहचान सकते हैं कि नीनू विज के चित्रों में हमारे ही रंगों के साथ हमारे मानसिक चाक्षुष बौद्विक संबंध को जैसे उजागर किया गया है; और उनके रंगबोध के स्तर पर अपने समय के साथ चलने वाले भी सिद्व हुए हैं - उन्होंने उनमें अर्थ भरे हैं और उनके साथ हमारे लिये एक संवाद की स्थिति पैदा की है |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lQRQULAGI/AAAAAAAAARg/nN32g-vO0P8/s1600/neenu+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lQRQULAGI/AAAAAAAAARg/nN32g-vO0P8/s320/neenu+2.jpg" width="319" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नीनू विज के अमूर्त रूपाकारों को देखते हुए मैं इस बात को लगातार रेखांकित करता हूँ कि कला के शुद्व रूपगत नियम सारतः खेल के नियमों से भिन्न नहीं होते | ये नियम जितने भी जटिल, सूक्ष्म और उम्दा हों खेल जीतने के अलावा उनका कोई स्वतंत्र महत्त्व नहीं होता | फुटबाल के खिलाड़ी के प्रयासों को अगर हम केवल हलचल के रूप में देखेंगे तो पहले वे दुर्बोध और कुछ देर बाद उबाऊ लगने लगेंगे | कुछ देर के लिये हो सकता है कि उनकी तेजी और चपलता से थोड़ा मजा आये - लेकिन जो इस सारी दौड़धूप, उछलकूद और धक्का-मुक्की के उद्देश्य को जानता है उस विशेषज्ञ दर्शक के आनंद के मुकाबले यह अत्यंत अर्थहीन होगा | कलाकार अपनी कृति के जरिये लोगों को सूचित करने, सहमत करने, प्रभावित करने का जो लक्ष्य लेकर चला है उस लक्ष्य को यदि हम नहीं जानते या नहीं जानना चाहते तो उसकी कला के बारे में हमारी समझ फुटबाल के उस जाहिल दर्शक से बहुत आगे नहीं बढ़ सकती जो खिलाड़ियों की गति की सुंदरता के ही आधार पर फुटबाल&amp;nbsp;को समझता है | कलाकृति संवाद होती है - यद्यपि यह बात पूरी तरह सही है कि इसके सफल संप्रेषण के लिये ऐसे बाहय रूप की जरूरत होती है जो एकदम प्रभावी, आकर्षक और निर्दौष हो; लेकिन यह भी उतना ही सही है कि यह रूप जो संवाद संप्रेषित करता है उसके परे इसका कोई महत्त्व नहीं होता | किसी भी कलाकृति का एक आंतरिक तर्क होता ही है और इसके विशिष्ट गुण इसके विविध स्तरों और विभिन्न मूल भावों के आंतरिक संरचनात्मक संबंधों में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते ही हैं |&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;यह आकस्मिक नहीं है कि केशव मलिक जैसे कला मर्मज्ञ ने कुछ ही वर्ष पहले इस तथ्य को रेखांकित किया था कि नीनू विज उन युवा चित्रकारों में हैं जिनके चित्रों में चित्रता गुण भरपूर है और चित्रभाषा की उपस्थिति, एक वास्तविक उपस्थिति लगती है - एक ऐसी उपस्थिति जो स्वयं को देखे जाने के लिये ठिठकाती तो है ही, साथ ही अपने होने को विश्लेषित करने के लिये हमें तरह-तरह से उकसाती और प्रेरित भी करती है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-1591248680166963627?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/1591248680166963627/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/1591248680166963627'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/1591248680166963627'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html' title='नीनू विज के चित्र लैंडस्केप का आभास देते हुए भी दरअसल जगहों, वस्तुओं, रूपों और मानसिक गतियों का एक निचोड़ हैं'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S8lPL5_A-9I/AAAAAAAAARQ/y8q0nFbuQQ0/s72-c/Invitation.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8740743163155294840</id><published>2010-04-06T20:19:00.000-07:00</published><updated>2010-04-07T17:06:43.835-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='YASHODHARA DALMIA'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='RAVI JAIN'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='FRANSIS NEWTON SOUZA'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='DHOOMIMAL ART GALLERY'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='IBRAHIM ALKAJI'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='LALIT KALA AKADEMI'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><title type='text'>मूर्तिभंजक चित्रकार फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा ने अपने जीवन में और अपने काम में हमेशा ही चीजों को व स्थितियों को तार्किक तरीके से समझने का प्रयास किया</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v5iuuXbII/AAAAAAAAAQo/ovlKjPgwblE/s1600/souza+fn.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v5iuuXbII/AAAAAAAAAQo/ovlKjPgwblE/s320/souza+fn.jpg" width="214" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;धूमीमल ऑर्ट गैलरी के सौजन्य से फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा के बहुत से काम एक साथ देखने का मौका हमें मिलने जा रहा है, तो यह सचमुच एक बड़े रोमांच की बात है | दिल्ली में धूमीमल ऑर्ट गैलरी के रवि जैन को सूज़ा के काम के एक बड़े संग्रहकर्ता के रूप में जाना-पहचाना जाता है | दिल्ली में, हालाँकि इब्राहिम अलक़ाज़ी के पास भी सूज़ा के चित्रों का अच्छा खासा संग्रह है | इब्राहिम अलक़ाज़ी के पास तो सूज़ा की बिल्कुल शुरुआती पेंटिंग्स भी हैं, जिन पर न्यूटन के नाम से हस्ताक्षर हैं | इन पेंटिंग्स को अलक़ाज़ी ने कुछ साल पहले - सूज़ा जब जीवित थे - अपने एक शो में प्रदर्शित भी किया था | साल 2002 के मार्च माह की 28 तारीख को हुए सूज़ा के निधन के बाद वढेरा ऑर्ट गैलरी ने हालाँकि 'ए ट्रिब्यूट टु फ्रांसिस न्यूटन&amp;nbsp; सूज़ा' शीर्षक से सूज़ा के चित्रों की एक बड़ी प्रदर्शनी की थी, लेकिन उसमें सूज़ा के पचास और साठ के दशक में किए गये काम ही ज्यादा थे; बाद के भी कुछ काम थे, पर उनकी संख्या कम थी | धूमीमल ऑर्ट गैलरी के सौजन्य से ललित कला अकादमी की दीर्घाओं में 9 अप्रैल से सूज़ा के चित्रों की जो प्रदर्शनी होने जा रही है, उसमें सूज़ा के साल 1940 से 1990 के बीच किए गये कामों में से चुने गये करीब दो सौ कामों को प्रदर्शित करने की तैयारी है | इस हिसाब से कह सकते हैं कि निधन के बाद सूज़ा के चित्रों की यह सबसे बड़ी प्रदर्शनी है | इस तरह इसे सूज़ा की सिंहावलोकन प्रदर्शनी के रूप में भी देखा जा सकता है | इस प्रदर्शनी को यशोधरा डालमिया ने क्यूरेट किया है | &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v6BWACiZI/AAAAAAAAAQw/-2U6hOThcNc/s1600/Souza+1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v6BWACiZI/AAAAAAAAAQw/-2U6hOThcNc/s320/Souza+1.jpg" width="225" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सूज़ा पहले भारतीय चित्रकार हैं जिन्हें पश्चिम के कला प्रेमियों, प्रशंसकों, प्रेक्षकों&amp;nbsp;व व्यापारियों ने मान्यता दी और एक कलाकार के रूप में जिनका लोहा माना | प्रसिद्व दार्शनिक व चिंतक एज़रा पाउंड ने घोषित किया था कि 'सूज़ा महान है और वह इस बात को जानता भी है |' सूज़ा 1949 में लंदन चले गये थे | हालाँकि वह वहाँ गये थे घूमने - फिरने के लिहाज से और म्यूजियम आदि देखने ताकि उनका ज्ञान और सौंदर्यशास्त्र की समझ बढ़ सके | लेकिन वहाँ पहुँच कर उनका पेंटिग करने में ऐसा मन लगा कि फिर उन्होंने वहीं बस जाने का फैसला कर लिया | उनकी पत्नी मारिया ने वहाँ नौकरी की और उन्होंने पेंटिंग | 1955 में उन्होंने लंदन में पहली प्रदर्शनी की | उस समय तक हालाँकि वह वहाँ खासे जाने - पहचाने हो गये थे | प्रदर्शनी के बाद तो वह वहाँ पूरी तरह स्थापित हो गये | महान कलाकार हेनरी मूर और ग्रैम सदरलैंड वहाँ उनके खास दोस्तों में थे | 1956 में सूज़ा स्टॉकहोम गये | वहाँ वह अकबर पदमसी और हैदर रज़ा के साथ मैडम कुटूरी से मिलने गये, जो पिकासो की मित्र थीं | वह लोग बातें कर ही रहे थे कि पिकासो वहाँ आ गये | इस बात को याद करते हुए सूज़ा ने एक बार कहा था कि 'वह बहुत ही रोमांचकारी क्षण था |'&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v6WrDrBEI/AAAAAAAAAQ4/wFffAiNLeTE/s1600/Souza+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v6WrDrBEI/AAAAAAAAAQ4/wFffAiNLeTE/s320/Souza+2.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सूज़ा का जन्म गोवा में हुआ था, लेकिन जल्दी ही उनकी माँ उन्हें लेकर मुंबई आ गई थीं | सूज़ा के जन्म के कुछ ही बाद उनके पिता का देहांत मात्र 24 साल की उम्र में ही हो गया था | सूज़ा की बड़ी बहन की भी मृत्यु डेढ़ - दो साल की उम्र में ही हो गई थी | बचपन में सूज़ा को भी चेचक हो गई थी, जिसके कारण उनकी माँ को उन्हें लेकर डर हुआ और नतीजतन वह उन्हें लेकर मुंबई आ गईं | मुंबई में उनकी माँ को किसी चर्च से कपड़े सिलने का काम मिला था, जो कि वह बहुत बारीकी से करती थीं | सिले हुए कपड़े को वह कशीदाकारी से सजाती&amp;nbsp;भी थीं | इस बात को याद करते हुए सूज़ा ने एक बार कहा था कि वह भी अपनी पेंटिंग्स को उसी तरह सजाने की कोशिश करते हैं | सूज़ा की माँ उन्हें संत बनाना चाहती थीं क्योंकि बचपन में उन्हें जब चेचक हुई थी तब उनकी माँ ने सेंट फ्रांसिस जेवियर के सामने उन्हें संत बनाने की प्रतिज्ञा की थी | लेकिन सूज़ा ने माँ की इस प्रतिज्ञा को पूरा करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली | दरअसल धर्म को लेकर सूज़ा में कभी कोई दिलचस्पी पैदा ही नहीं हो सकी, क्योंकि उन्होंने हमेशा ही चीजों को व स्थितियों को तार्किक तरीके से समझने का प्रयास किया |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v6op5YlhI/AAAAAAAAARA/YtFw0CmLPCo/s1600/Souza+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v6op5YlhI/AAAAAAAAARA/YtFw0CmLPCo/s320/Souza+3.jpg" width="214" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सूज़ा को चित्र बनाना तो बचपन से ही पसंद था और इसीलिए बड़े होकर उन्होंने कला की विधिवत शिक्षा लेने का फैसला किया | इसके लिये उन्होंने जे जे कॉलेज ऑफ ऑर्ट में दाखिला लिया, पर वह वहाँ अपना कोर्स पूरा नहीं कर सके | असल में, कॉलेज में लगे इंग्लैंड के झंडे यूनियन जैक को उतार कर गांधी जी का झंडा लहराने के काम में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ बढ़चढ़ कर भाग लिया था, जिसके चलते उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था | तब वह गोवा लौट गये थे और वहाँ लैंडस्केप पेंट करने लगे | गोवा में बनाई पेंटिंग्स की उन्होंने मुंबई में प्रदर्शनी की और पहली ही प्रदर्शनी में उनकी एक पेंटिग बड़ौदा म्यूजियम ने खरीदी थी | गोवा में उनका मारिया फिनरारो नाम की लड़की से परिचय हुआ | उन्हें बाद में पता चला कि उसने अपनी सारी तनख्वाह उनकी पेंटिंग्स खरीदने में खर्च कर दी है | मारिया से ही बाद में उनकी शादी हुई | सूज़ा ने कुछ लिखा - लिखाया भी है, लेकिन लिखना उनके लिये कभी भी पेंट करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं रहा | पेंट करना&amp;nbsp;उनका मन का काम रहा | इसके चक्कर में उन्होंने नौकरी नहीं की | जब साधन कम रहे, तब भी नहीं | साधन कम रहे, तब भी उन्होंने लेकिन पेंटिंग करना नहीं छोड़ा |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v7KAsqNRI/AAAAAAAAARI/3BZ7YHdFq30/s1600/Souza+4.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v7KAsqNRI/AAAAAAAAARI/3BZ7YHdFq30/s320/Souza+4.jpg" width="211" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सूज़ा ने प्रायः आकृतिमूलक काम ही किया है | उनका साफ़ कहना रहा कि उनके लिये आकृति ही सब कुछ है | इसलिए वह जब भी कोई पेंटिंग बनाते हैं तो वह किसी आकृति की ही होती है, जिसकी एक निश्चित रूपरेखा हो | उनका मानना और कहना रहा कि एक महान पेंटिंग वही है जिसमें आकृति एक निश्चित रूपरेखा में चित्रित की गई हो | दो आयामी चित्रों में आप त्रिआयामी चीजों को उतार सकते हैं और साथ ही उनमें रंग भर सकते हैं, पर इसके लिये यह जरूरी है कि पेंटिंग का एक निश्चित आधार हो | सूज़ा का व्यवहार खासा आक्रामक था और अपने समकालीन चित्रकारों के साथ उनकी खासी गर्मागर्मी रहती थी | उनका यह 'व्यवहार' उनके चित्रों में भी दिखता रहा है, और इसी 'व्यवहार' के कारण उनके चित्रों में 'बोल्डनेस' रही है - रूप के स्तर पर भी और विषय के स्तर पर भी | इसी के चलते उन पर यह आरोप भी लगा कि उनमें एक प्रकार का परावर्शन और डिस्टार्शन है | 'बोल्डनेस' के कारण ही उन्हें मूर्तिभंजक चित्रकार के रूप में भी देखा / पहचाना गया है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8740743163155294840?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8740743163155294840/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8740743163155294840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8740743163155294840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='मूर्तिभंजक चित्रकार फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा ने अपने जीवन में और अपने काम में हमेशा ही चीजों को व स्थितियों को तार्किक तरीके से समझने का प्रयास किया'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7v5iuuXbII/AAAAAAAAAQo/ovlKjPgwblE/s72-c/souza+fn.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-3493660034766258169</id><published>2010-03-31T05:30:00.000-07:00</published><updated>2010-04-03T19:05:29.625-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SIDHARTH'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='THE DECORATED COW'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='RELIGARE ARTS'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SEEMA BAWA'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><title type='text'>सिद्वार्थ ने 'डेकोरेटिव काऊ' के जरिये जीवन और समाज की विविधतापूर्ण परिघटनाओं को समग्रता में तथा संवेदना के स्तर पर अभिव्यक्त किया है</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7UqyW8NDnI/AAAAAAAAAQY/fH6xaCh4LtA/s1600/Sidarth+1_2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7UqyW8NDnI/AAAAAAAAAQY/fH6xaCh4LtA/s320/Sidarth+1_2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रेलिगेअर आर्ट्स&amp;nbsp;डॉट आई ने 'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों की एक बड़ी प्रदर्शनी आयोजित की है | सिद्वार्थ भारतीय समकालीन कला के चित्रकारों में एक अलग तरह की पहचान रखते हैं | समकालीनता को परंपरा के साथ जोड़ कर देखने और दिखाने का काम करने का प्रयास&amp;nbsp;यूं तो बहुत लोगों ने किया है, पर वास्तव में उसे कर सकने में जो थोड़े से लोग ही&amp;nbsp;सफल हो सके हैं, उनमें सिद्वार्थ भी एक &amp;nbsp; &amp;nbsp; हैं | सिद्वार्थ ने जैसे एक ज़िद की तरह अपने चित्रों को पूरने में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया है | बचपन के असर से दुनिया भर का चक्कर लगा लेने के बाद भी वह जैसे मुक्त नहीं हो पाए &amp;nbsp;&amp;nbsp; हैं | सिद्वार्थ ने अपनी माँ को काम करते देखते हुए&amp;nbsp;मिट्टियों के रंगों की, फूलों के रंगों&amp;nbsp;की, नीलडली व हिरमिची और रंग-बिरंगे पत्थरों को पीस/घोंट कर तैयार किए गये रंगों की जिस चमक को जाना/पहचाना था, वह&amp;nbsp;चमक&amp;nbsp;जैसे&amp;nbsp;आज भी&amp;nbsp;उनमें&amp;nbsp;बसी&amp;nbsp;हुई है&amp;nbsp;| उनकी&amp;nbsp;माँ&amp;nbsp;रंगों से&amp;nbsp;सजे&amp;nbsp;पेपरमैशी के&amp;nbsp;बर्तन&amp;nbsp;बनाती&amp;nbsp;थीं&amp;nbsp;| सिद्वार्थ&amp;nbsp;को&amp;nbsp;अपने&amp;nbsp;बचपन में&amp;nbsp;कारीगरी&amp;nbsp;और&amp;nbsp;रंगों का&amp;nbsp;कैसा&amp;nbsp;वातावरण मिला, इसे&amp;nbsp;दिनभर&amp;nbsp;के कामकाज से थके-मांदे घर&amp;nbsp;लौटे उनके&amp;nbsp;पिता&amp;nbsp;की शिकायतभरी&amp;nbsp;चुहल&amp;nbsp;से जाना जा सकता है जो वह अक्सर करते&amp;nbsp;थे&amp;nbsp;- 'ओ&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;रोटी-पानी&amp;nbsp;भी बना है घर में या फिर&amp;nbsp;बेल-बूटा, चित्र-कढ़ाई ही&amp;nbsp;है |' इसके साथ ही वह यह कहना&amp;nbsp;भी नहीं&amp;nbsp;चूकते&amp;nbsp;थे 'हैं&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;सुंदर पर&amp;nbsp;भूख&amp;nbsp;भी तो लगती है न |' गाँव&amp;nbsp;के स्कूल में जहाँ मास्टर&amp;nbsp;को यह तो पता था कि&amp;nbsp;चित्र बनाने&amp;nbsp;का काम&amp;nbsp;सुंदर दिखने वाले ब्रशों से और&amp;nbsp;चमकदार रंगों से सफेद&amp;nbsp;कागज&amp;nbsp;पर होता है, सिद्वार्थ को यह उलाहना&amp;nbsp;अक्सर सुनना पड़ता&amp;nbsp;था&amp;nbsp;- 'यह तू&amp;nbsp;कौन&amp;nbsp;मिट्टियों से चित्र बनाता &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; है |'&amp;nbsp;माता-पिता की साझी&amp;nbsp;मेहनत-मजदूरी पर पलते&amp;nbsp;चार&amp;nbsp;बेटे&amp;nbsp;व&amp;nbsp;दो&amp;nbsp;बेटियों के परिवार&amp;nbsp;के सदस्य&amp;nbsp;के रूप में सिद्वार्थ के लिये हो सकता है कि उस समय मिट्टियों से चित्र बनाना&amp;nbsp;मजबूरी भी रहा हो, लेकिन&amp;nbsp;मिट्टियों में उन्होंने&amp;nbsp;अपनी रचनात्मकता के जो स्त्रोत&amp;nbsp;देखे&amp;nbsp;/ पाए&amp;nbsp;थे, उन्हीं&amp;nbsp;मिट्टियों पर&amp;nbsp;भरोसा&amp;nbsp;बनाये&amp;nbsp;रखने&amp;nbsp;के चलते सिद्वार्थ&amp;nbsp;की&amp;nbsp;एक&amp;nbsp;भिन्न&amp;nbsp;पहचान बनी&amp;nbsp;है &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7NjybHvJAI/AAAAAAAAAQA/-1iKap2oS1c/s1600/Sidarth+9.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7NjybHvJAI/AAAAAAAAAQA/-1iKap2oS1c/s320/Sidarth+9.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;|&lt;br /&gt;'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से प्रदर्शित सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों ने उनकी भिन्न पहचान के रंग को वास्तव में और गाढ़ा बनाने/करने का ही काम किया है | गाय (काउ) तो सिर्फ बहाना है | उसे डेकोरेट करके सिद्वार्थ ने जीवन और समाज की विविधतापूर्ण परिघटनाओं - चाहें वह आर्थिक हों, सामाजिक हों, धार्मिक हों, स्वार्थी हों या मनमौजी हों - को समग्रता में अभिव्यक्त किया है; तथा संवेदना के स्तर पर गहरे अर्थों को पहचानने के लिये प्रेरित करने से लेकर उनसे&amp;nbsp;जुड़ने के लिये जैसे उकसाने का काम किया है | विषय-वस्तु के नजरिये से देखें, तो सिद्वार्थ ने प्रायः जानी-पहचानी स्थितियों को लेकर ही अपने चित्रों व मूर्तिशिल्पों को रचा है और एक बड़ा खतरा उठाया है | दरअसल, हमारे यहाँ समकालीन कला में जानी-पहचानी चीजों व स्थितियों पर चित्र रचना करने की कोई बहुत सार्थक परंपरा ही नहीं है | यह खासा खतरेभरा और चुनौतीभरा भी माना जाता है | जानी-पहचानी चीजों व स्थितियों पर आधारित चित्र रचना में दर्शक/प्रेक्षक (और ख़ुद कलाकार) के लिये भी यह खतरा तो रहता ही है कि उनकी नज़र चित्र के रचनात्मक 'तथ्यों' को पहचानने की बजाये चीजों व स्थितियों की 'आकार रेखाओं' को ही चित्र में ढूँढ़ने लग जाती हैं | सिद्वार्थ ने अपने चित्रों व मूर्तिशिल्पों में इस खतरे को पास भी नहीं फटकने दिया है तो यह उनका रचनात्मक कौशल तो है ही, साथ ही संवेदनात्मक यथार्थपरकता पर यह उनकी पकड़ का सुबूत भी है |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7fzzCEqZHI/AAAAAAAAAQg/Q6zHmJK2BgE/s1600/Sidarth+sankalp.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7fzzCEqZHI/AAAAAAAAAQg/Q6zHmJK2BgE/s320/Sidarth+sankalp.jpg" width="196" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सिद्वार्थ की सक्रियता को देख/जान कर भी समझा जा सकता है कि उनके लिये जैसे कला और जीवन एक&amp;nbsp; दूसरे के पर्याय जैसे हैं | उन्होंने ख़ुद भी कहा है 'सदा से मुझे याद है कि चित्रों के साथ-साथ ही जिया हूँ | इसके बिना रहने का कोई अवसर हुआ ही नहीं |' सिद्वार्थ ने यूं&amp;nbsp;तो चंडीगढ़&amp;nbsp;कॉलिज&amp;nbsp;ऑफ&amp;nbsp;ऑर्ट&amp;nbsp;से डिप्लोमा&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;है, लेकिन कला&amp;nbsp;की मूल भावना&amp;nbsp;व बारीकियों&amp;nbsp;को पहचानने तथा पकड़ने&amp;nbsp;के हुनर को पाने के&amp;nbsp;लिये उन्होंने दूसरे&amp;nbsp;ठिकानों&amp;nbsp;पर ज्यादा&amp;nbsp;भरोसा किया | सिद्वार्थ ने घर-गाँव तो छोड़ा&amp;nbsp;था शोभा&amp;nbsp;सिंह&amp;nbsp;से पोट्रेट&amp;nbsp;सीखने&amp;nbsp;के लिये, पर फिर उन्होंने तिब्बतन&amp;nbsp;कला थानग्का सीखने का निश्चय&amp;nbsp;किया और इसके लिये धर्मशाला&amp;nbsp;स्थित&amp;nbsp;एक बौद्व&amp;nbsp;मठ&amp;nbsp;में उन्होंने छह साल&amp;nbsp;बिताये&amp;nbsp;| इसके अलावा, सिद्वार्थ ने मधुबनी&amp;nbsp;पेंटिंग भी सीखी&amp;nbsp;और कश्मीरी&amp;nbsp;पेपरमैश क्राफ्ट कला सीखने के लिये पुश्तैनी&amp;nbsp;शिल्पकारों&amp;nbsp;की शागिर्दी&amp;nbsp;भी &amp;nbsp;&amp;nbsp; की | स्वीडन में उन्होंने ग्लास&amp;nbsp;ब्लो&amp;nbsp;का प्रशिक्षण&amp;nbsp;भी प्राप्त&amp;nbsp;किया | कोई भी चकित हो सकता है और जानने का इच्छुक भी कि कला में सिद्वार्थ आखिर क्या-क्या जानना-सीखना और करना चाहते हैं ? उनकी सक्रियता किसी को भी हैरान कर सकती है | उन्होंने देश के विभिन्न शहरों के साथ-साथ ब्रिटेन, अमेरिका, स्वीडन आदि देशों में बाईस एकल प्रदर्शनियाँ की हैं तथा करीब सवा सौ समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | देश-विदेश में सिद्वार्थ को अपनी कला के प्रशंसक&amp;nbsp;तो मिले ही हैं, वह पुरुस्कृत और सम्मानित भी खूब हुए हैं | ब्रिटिश काउंसिल से अवार्ड पाने वाले गिने-चुने भारतीय चित्रकारों में सिद्वार्थ का नाम भी &amp;nbsp;&amp;nbsp; है | सिद्वार्थ ने सिर्फ पेंटिंग्स ही नहीं की है; उन्होंने मूर्तिशिल्प भी बनाये हैं तथा भारत की कला, यहाँ के शिल्प और यहाँ के मंदिरों पर पंद्रह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनाई हैं | ख़ुद उनके काम और उनकी कला पर भी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनी है | 'इन सर्च ऑफ कलर - ए पेंटर सिद्वार्थ' शीर्षक से उक्त फिल्म का निर्माण कला फिल्मों के मशहूर निर्माता के बिक्रम सिंह ने किया&amp;nbsp; है |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7NjfEvwzdI/AAAAAAAAAP4/zX4-VpK-aQw/s1600/Sidarth+22.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7NjfEvwzdI/AAAAAAAAAP4/zX4-VpK-aQw/s320/Sidarth+22.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रेलिगेअर कला दीर्घा में 'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से आयोजित सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों की प्रदर्शनी को देखते हुए मैं लगातार उस कहानी को याद करता रहा जो सिद्वार्थ ने करीब पांच साल पहले नागपुर में आयोजित हुए एक कला शिविर में 'संदर्भ और स्मृतियाँ' विषय पर दिये अपने&amp;nbsp;व्याख्यान में सुनाई थी : 'एक शिष्य गुरु के पास गया और कहने लगा गुरु जी मुझे चित्र कला सिखा दो | गुरु ने कहा पहले मूर्तिकला सीख कर आओ | शिष्य मूर्तिकला के गुरु के पास गया | कहने लगा - मुझे मूर्तिकला सिखा दो | गुरु ने कहा - सिखा देंगे, पहले नृत्य कला सीख कर आओ | वह नृत्यकला के गुरु के पास गया और उनसे कहा - गुरुजी मुझे नृत्यकला सिखा दो | गुरु ने कहा - सिखा देंगे राजन, पहले तुम संगीत कला सीख कर आओ | वह संगीत कला के गुरु के पास गया और उनसे कहा - गुरुजी मुझे संगीत सिखा दो | गुरु ने कहा - क्या तुम्हें शब्दों का ज्ञान&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; है ? शब्दों&amp;nbsp; की ध्वनियों को तुमने कभी ध्यान से सुना है ? तुम्हें अपनी मातृभाषा आती है ? ऐसा करो, ध्वनियों को सुनने तुम जंगल में चले जाओ | वहाँ बहते झरने को सुनो, जो सदियों से बह रहा है | बहुत सारी स्मृतियाँ लिये हुए आता है, जाता है, फिर वापस आता है | कल-कल नाद करते हुए बह रहा है, जाओ उसको सुनो, फिर आना |' 'डेकोरेटिव काऊ' देखते हुए और देख कर लौट आने के बाद भी मैं गायों से जुड़ी यादों व अनुभवों के घेरे से मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ | रेलिगेअर कला दीर्घा में 'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से आयोजित प्रदर्शनी में सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों को देखना मेरे लिये सचमुच में एक विलक्षण अनुभव रहा | किसी और गैलरी में उनके इन चित्रों व मूर्तिशिल्पों को शायद ही इतने प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता होता | इसका श्रेय सीमा बावा तथा दीर्घा के कर्ताधर्ताओं को भी है | सीमा बावा ने इस प्रदर्शनी को क्यूरेट किया है और वास्तव में उन्होंने अपना काम खासी दक्षता के साथ किया है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-3493660034766258169?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/3493660034766258169/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/3493660034766258169'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/3493660034766258169'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html' title='सिद्वार्थ ने &apos;डेकोरेटिव काऊ&apos; के जरिये जीवन और समाज की विविधतापूर्ण परिघटनाओं को समग्रता में तथा संवेदना के स्तर पर अभिव्यक्त किया है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S7UqyW8NDnI/AAAAAAAAAQY/fH6xaCh4LtA/s72-c/Sidarth+1_2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-3067491419318103510</id><published>2010-03-27T03:13:00.000-07:00</published><updated>2010-03-27T03:34:55.831-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SCULPTURE'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='PUNJAB LALIT KALA AKADEMI'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='CHANDIGARH'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='PARMINDER SINGH SANDHU'/><title type='text'>परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों में जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63YPT2RPgI/AAAAAAAAAOQ/LeYeGE_vyNs/s1600/P+%27Shakti-Stambh%27.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63YPT2RPgI/AAAAAAAAAOQ/LeYeGE_vyNs/s320/P+%27Shakti-Stambh%27.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों को लेकर मैं पिछले कुछ समय से लगातार&amp;nbsp;एक दिलचस्प अनुभव का साक्षी और सहभागी बना हुआ हूँ | पिछले कुछ समय में, जब भी मूर्तिशिल्प कला को लेकर किसी से कोई बात हुई और या मूर्तिशिल्प कला को लेकर हो रही बातचीत का मैं हिस्सा बना तो अधिकतर मौकों पर मैंने&amp;nbsp; दिल्ली के कलाकारों व कला प्रेक्षकों को परमिंदर के मूर्तिशिल्पों को लोगों को याद करते तथा रेखांकित करते हुए पाया है | परमिंदर एक युवा शिल्पकार हैं और अभी तक उनकी सक्रियता का केंद्र मौटे तौर पर चंडीगढ़ ही है | कहने को तो उन्होंने दीमापुर ( नागालैंड ), शांतिनिकेतन ( पश्चिम बंगाल ), नागपुर ( महाराष्ट्र ), उदयपुर ( राजस्थान ), मुरथल ( हरियाणा ), भोपाल ( मध्य प्रदेश ) और नई दिल्ली में किसी समूह प्रदर्शनी या किसी प्रतियोगिता या किसी कैम्प में शामिल होने के बहाने से अपने काम को प्रदर्शित किया है; लेकिन बड़े स्तर पर अपने काम को प्रदर्शित कर पाने का अवसर उन्हें अभी भी प्राप्त करना है | नई दिल्ली में पिछले वर्ष जून में उन्होंने चंडीगढ़ के बाहर अपने शिल्पों की पहली एकल प्रदर्शनी जरूर की थी | मैंने अपने जिस अनुभव का ज़िक्र किया है, वह शायद आठ महीने पहले हुई उसी प्रदर्शनी का असर है | मुहावरे का सहारा लेँ तो कह सकते हैं कि परमिंदर के मूर्तिशिल्पों का जादू लोगों के जैसे सिर चढ़ कर बोल रहा है | उक्त प्रदर्शनी को देख सकने का सौभाग्य मुझे भी मिला था और परमिंदर के मूर्तिशिल्पों के साथ-साथ परमिंदर की काम करने की जिजीविषा ने मुझे भी प्रभावित किया था | मैंने अपने जिस अनुभव का ज़िक्र किया है, उससे मुझे स्वाभाविक रूप से यह भी पता चला ही है कि परमिंदर के काम से एक मैं ही प्रभावित नहीं हुआ था, बल्कि और कई लोगों को भी परमिंदर के काम ने छुआ है | &amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63ZdUM3lkI/AAAAAAAAAOY/c4cM3UC2PzM/s1600/P+2+Blast.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63ZdUM3lkI/AAAAAAAAAOY/c4cM3UC2PzM/s320/P+2+Blast.jpg" width="212" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सबसे पहले तो, ललित कला में सबसे दुस्साध्य और कठिन माध्यम के रूप में पहचाने जाने वाले मूर्तिशिल्प कला में किसी युवा कलाकर का काम करना ही लोगों को चौंकाता है | स्वाभाविक रूप से इस माध्यम में वही कलाकार काम करना पसंद करते हैं जो कठिन परिश्रम करने को तैयार होते हैं, तथाकथित सफलता पाने की जल्दी में नहीं होते हैं और कलाकार के रूप में कला-बाजार की उपेक्षा का खतरा उठाने से घबराते नहीं हैं | अमृतसर जिले की तरन तारन तहसील के गाँव छुटाला में वर्ष 1977 के फरवरी माह की तेरह तारिख को जन्मे परमिंदर सिंह संधू के काम को देखने वालों ने तो लेकिन यह भी रेखांकित किया है कि उन्होंने मूर्तिकला जैसे अधिक मेहनत और समय की मांग करने वाले दृश्यगत भाषा-माध्यम को सिर्फ चुना ही नहीं, बल्कि पूरी तल्लीनता और शिद्दत&amp;nbsp;के साथ उसे निभाया भी है | &lt;br /&gt;परमिंदर की कलाकृतियों में मानवा-कारों के साथ-साथ बीज व सर्प रूपाकारों और अमूर्त तत्त्वों को साफ़&amp;nbsp; देखा / पहचाना जा सकता है | उनकी प्रायः सभी कृतियों में 'एरॉटिक' तत्त्वों का समावेश&amp;nbsp;है, लेकिन उनमें सौंदर्य की सूक्ष्मता तथा संयम दोनों को सहज ही महसूस किया जा सकता है | परमिंदर की कलाकृतियाँ माँसल ऐंद्रिकता से भरपूर हैं और जिनमें व्यक्त हुई परिष्कृत कला-चेतना की बारीकियाँ पहली बार में ही आकर्षित भी करती हैं और प्रभावित भी | परमिंदर के मूर्तिशिल्पों के रूपाकारों के सृजन&amp;nbsp;में ऐंद्रिकता की कोमलता व रेखाओं की उदात्त मितव्ययिता का समावेश है, जिससे इन रूपाकारों के स्पर्श-संवेदन और रहस्यमय गत्यात्मकता में विलक्षणता प्रकट होती है | परमिंदर ने विविधतापूर्ण रूपाकारों की जो रचना की है, उनमें व्यक्त होने वाले अप्रत्याशित मोड़, उठान, प्रक्षेपन, दरारें और ढलानें आदि - सभी तत्त्व अपनी सामूहिकता में जिस कलात्मक लय का सृजन करते हैं, उसके चलते कलाकृति की सौंदर्यात्मक एकात्मकता में और भी श्रीवृद्वि हो जाती है |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63a0ehsKmI/AAAAAAAAAOo/0w6qaFxL9MM/s1600/P+1+Birth.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63a0ehsKmI/AAAAAAAAAOo/0w6qaFxL9MM/s320/P+1+Birth.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;मूर्तिशिल्प सृजन की अपनी सशक्त भाषा को विकसित कर चुके परमिंदर के टैक्सचर की विशेषता है कलाकृतियों में शिलाओं की रूक्षता और स्निग्धता के परस्पर विपरीत गुणों के बीच विद्यमान सृजनात्मक तथा दृश्यमूलक समन्वय स्थापित करना | मूर्तिशिल्प के उत्तेजक और कहीं-कहीं चमत्कारिक से लगते उठाव-गिराव उनकी वर्णात्मक लय को दर्शक के लिये और अधिक आकर्षक बना देते हैं, क्योंकि उनमें जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है | खासी मेहनत और निरंतर संलग्नता के भरोसे अपनी प्रतिभा को व्यापक रूप देते हुए परमिंदर ने वास्तव में मूर्तिकला में पंजाब की भागीदारी व उपस्थिति को और गाढ़ा बनाने का ही काम किया है, तथा धनराज भगत, अमरनाथ सहगल, वेद नैयर, बलबीर सिंह कट्ट, हरभजन संधू, शिव सिंह, ए सी सागर, अमरीक सिंह, अवतार सिंह आदि प्रमुख शिल्पकारों की परंपरा को और समृद्व करते जाने के प्रति आश्वस्त करने का ही काम किया है | &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;परमिंदर सिंह संधू को पिछले ही वर्ष पंजाब ललित कला अकादमी ने सम्मानित किया है | पंजाब ललित कला अकादमी में सम्मानित होने का यह उनका दूसरा मौका था | इससे पहले, वर्ष 2004 में भी परमिंदर पंजाब ललित कला अकादमी के वार्षिक आयोजन में सम्मानित हो चुके थे | वर्ष 2008 में नागपुर में आयोजित हुई बाइसवीं अखिल भारतीय कला प्रतियोगिता में वह पुरुस्कृत हुए | उससे पिछले वर्ष, यानि वर्ष 2007 में चंडीगढ़ ललित कला अकादमी की वार्षिक कला प्रदर्शनी में परमिंदर का काम पुरुस्कृत हुआ था |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63czfstk5I/AAAAAAAAAPA/mrvVgwfyOlk/s1600/P+4+Dreamer+%28sideview%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63czfstk5I/AAAAAAAAAPA/mrvVgwfyOlk/s320/P+4+Dreamer+%28sideview%29.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उससे भी पहले, वर्ष 2006 में आईफैक्स की 78 वीं वार्षिक कला प्रदर्शनी में परमिंदर सिंह को सम्मानित करने के लिये चुना गया था और वह दिल्ली में संपन्न हुए एक भव्य कार्यक्रम में कई कलाकारों के बीच सम्मानित हुए थे | आईफैक्स में सम्मानित होने का भी परमिंदर का यह दूसरा अवसर था | इससे पहले हालाँकि वह दिल्ली में नहीं, बल्कि चंडीगढ़ में सम्मानित हुए थे | चंडीगढ़ में वर्ष 2002 में आयोजित हुई आईफैक्स की राज्यस्तरीय प्रदर्शनी में उन्हें सम्मानित करने के लिये चुना गया था | ज़ाहिर तौर पर, परमिंदर सिंह संधू के काम को संस्थाओं की ओर से भी और लोगों से भी व्यापक सराहना मिली है | वास्तव में यह सराहना ही उनकी प्रतिभा और रचनात्मक क्षमता की गवाह भी है और सुबूत भी |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-3067491419318103510?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/3067491419318103510/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/3067491419318103510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/3067491419318103510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों में जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S63YPT2RPgI/AAAAAAAAAOQ/LeYeGE_vyNs/s72-c/P+%27Shakti-Stambh%27.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-665362075739363704</id><published>2010-02-24T21:47:00.000-08:00</published><updated>2010-02-25T08:42:52.708-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ruchi goyal kaura'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mural'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='epicentre'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='paintings'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='contemporary art'/><title type='text'>रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स जीवन के शाश्वत संदर्भों की पड़ताल का मौका देती हैं</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMVlBcjxI/AAAAAAAAANk/MBMzwGkeoBg/s1600-h/RG+2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt; &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMQVDr9yI/AAAAAAAAANc/mCu-DNbqTbo/s1600-h/RG.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMQVDr9yI/AAAAAAAAANc/mCu-DNbqTbo/s320/RG.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स विस्मित तो करती ही हैं, पेंटिंग्स में विविधतापूर्ण रचना सामग्रियों के इस्तेमाल के सवाल की तरफ भी ध्यान खींचतीं हैं | उनकी कुछेक नई पेंटिंग्स म्यूरल का-सा आभास देती हैं, तो उनकी पिछली कुछेक पेंटिंग्स को 'बुना हुआ' पाया गया था | विविधतापूर्ण रचना सामग्रियों का इस्तेमाल करते हुए रुचि गोयल कौरा&amp;nbsp; ने चित्रों का अपना ही एक वास्तुशिल्प बनाया है, अपना ही एक स्ट्रक्चर - जो अनुभवों, स्मृतियों, भावों और मनःस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेता है | रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स में प्रकट हुईं रंग - रूप - रेखाएं, स्मृति और स्वप्न को आंतरिक अनुभव से जोड़ते हुए एक स्वप्नलोक-सा रचती&amp;nbsp;हैं | स्मृतियों को खंगालते रहने में और स्मृतियों की ओर लौटते-लौटते उनमें 'जा बसने' में रुचि की खास दिलचस्पी&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; है | इस बात का सुबूत यह तथ्य भी है कि दो वर्ष पहले - जब वह नॉटिंघम में थीं - उन्होंने 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' शीर्षक से एक ब्लॉग बनाया था और उसकी कई पोस्ट्स लिखी थीं | नॉटिंघम वह अपनी पढ़ाई के सिलसिले में गईं थीं | रुचि गोयल कौरा ने नॉटिंघम ट्रेंट यूनीवर्सिटी से टेक्सटाइल डिजाइन एण्ड इनोवेशन में मास्टर्स किया है | इससे पहले उन्होंने निफ्ट से फैशन डिजाइनिंग में डिप्लोमा किया था |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMVlBcjxI/AAAAAAAAANk/MBMzwGkeoBg/s1600-h/RG+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMVlBcjxI/AAAAAAAAANk/MBMzwGkeoBg/s320/RG+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स देखते हुए मुझे सहसा काफी पहले पढ़ी 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' की पोस्ट्स याद आ गईं | पेंटिंग्स को देखते हुए उन पोस्ट्स को याद करने के क्रम में मुझे लगा कि हमारे भीतर कहीं जैसे एक त्रास मौजूद रहता है - इतिहास और समय के प्रति त्रास | क्या हम मनुष्य के भीतर बहने वाली सृजन धारा को इतिहास के दावों और दबावों से मुक्त रख सकते हैं - या यह सिर्फ एक आदर्शवादी लालसा और स्वप्न है | मैं जैसे अपने आप से मुठभेड़ करता हूँ और रुचि की पेंटिंग्स के स्रोतों को 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' की पोस्टों में तलाशने की कोशिश करता हूँ और जल्दी ही अपनी इस कोशिश को निरर्थक पाता हूँ | अपनी कोशिश को इसलिए भी निरर्थक पाता हूँ क्योंकि मैं गौर करता हूँ कि खुद रुचि को ही 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है और उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिये अब पेंटिंग्स को चुन लिया है | अपनी सुविधा के लिये मैं मान लेता हूँ कि रुचि की पेंटिंग्स के स्रोत वहीं होंगे जहाँ 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' के लिये उन्हें प्रेरणा मिली होगी | इस सोच विचार में लेकिन यह सवाल आ खड़ा हुआ कि एक कलाकृति का अर्थ कैसे निकलता है ? क्या वह विज्ञान या समाजशास्त्र या गणित के सूत्रों या सिद्वान्तों से जो अर्थ निकलता है - उससे अलग है&amp;nbsp; ? किसी ने कहा है कि कोई भी कलाकृति या तो अपने में संपूर्ण रूप से अभेद्य होती है या हजारों अर्थ खोलती है | ऐसे में जब हम किसी कलाकृति को किसी एक खास अर्थ के साथ नत्थी कर देते हैं, उसी समय हम उसकी समग्र और संश्लिष्ट अर्थवत्ता को नष्ट कर देते हैं |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMVlBcjxI/AAAAAAAAANk/MBMzwGkeoBg/s1600-h/RG+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स को देखते हुए पहले तो उनके ब्लॉग 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' की याद आना और फिर उनकी पेंटिंग्स के स्रोतों को 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' में खोजने की कोशिश को निरर्थक पाना/मानना - मैंने निष्कर्ष यह निकाला कि कोई कलाकृति किसी एक खास अनुभव या घटना या आइडियोलॉजी या दर्शन से उत्प्रेरित तो हो सकती है - किंतु एक कलाकृति की सत्ता में उसका अर्थ उस अनुभव या घटना या आइडियोलॉजी या दर्शन के सन्देश या डॉगमा से कहीं अधिक व्यापक और संश्लिस्ट होता है | महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि एक चित्र के ऊपरी बिम्ब या प्रतीक क्या हैं - वह कहीं से भी लिये जा सकते हैं - महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कलाकृति की अर्थवत्ता उन संदर्भों का अतिक्रमण कर पाती है या नहीं - कर पाती है तो एक स्वायत्त इकाई बन जाती है और इस तरह समय के गुजरने के साथ यदि उसके प्रतीक और बिम्ब अप्रासंगिक या अर्थहीन भी हो जाते हैं - तो भी चित्र का कलात्मक अर्थ रत्ती-भर भी मलिन नहीं पड़ता | मुझे लगता है कि जिन दिनों रुचि 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' में दिलचस्पी ले रहीं थीं उन दिनों भी वह दरअसल कलाकारी ही कर रहीं थीं | 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' को उनकी एक कलाकृति के रूप में भी देखा जा सकता है | यहाँ यह भी याद किया जा सकता है कि उन्हीं दिनों उन्होंने बहुत ही प्रयोगधर्मी अपना एक विजीटिंग कार्ड भी बनाया था | &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMituyq2I/AAAAAAAAAN0/q0wdr7Rv8tY/s1600-h/Ruchi+Goyal.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMituyq2I/AAAAAAAAAN0/q0wdr7Rv8tY/s320/Ruchi+Goyal.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रुचि गोयल कौरा की कलाकृतियों में संवेदना स्वयं अपनी ऊर्जा से पुष्ट होती दिखती हैं | ऐक्य की तलाश ही उनमें&amp;nbsp;जैसे एकमात्र लक्ष्य है | रुचि ने अपनी पेंटिंग्स को जो 'बुना हुआ' और म्युरल-सा रूप दिया है और विविधतापूर्ण रचनासामग्रियों का अपनी पेंटिंग्स में जो इस्तेमाल किया है - उसके चलते मनुष्य और भौतिक जगत की समानता, जड़ पदार्थों और भावनाओं का जो मेल तैयार होता नजर आता है वह सतह को मूल से जोड़ता-सा दिखता&amp;nbsp;है | विविधतापूर्ण रचनासामग्रियों के इस्तेमाल से लगता है कि रुचि जैसे बाह्य यथार्थ को संपूर्ण रूप से ठुकरा कर अपने चित्रों का रेफरेंस अपने भीतर या अपने अहम् में खोजने का प्रयास कर रहीं हैं : क्योंकि अपने से अधिक इस दुनिया में और कौन-सी चीज, नैतिकता, मूल्य या यथार्थ विश्वसनीय और प्रामाणिक हो सकता है | अहम् का एक विस्तृत और समग्र रूप है - जिसे हम सेल्फ या आत्मन कह सकते हैं और यह भौतिक जगत का विरोधी या प्रतिद्वंदी तत्त्व नहीं है : यह अपने सत्य में उस परम का ही अणु है, जो सामाजिक यथार्थ से कहीं ज्यादा व्यापक और सार्वभौम है - जिसमें समूची प्रकृति, समूचा जीव-संसार, समय और इतिहास की धारणाएं शामिल हैं | क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि रुचि ने इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित हुई अपनी पिछली एकल प्रदर्शनी को नाम ही 'अहम्' दिया था | रुचि का काम जीवन के शाश्वत संदर्भों की पड़ताल का मौका देता है और एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि कला में जब तक जीवन है, कोई प्रश्न पुराना नहीं पड़ता और कोई उत्तर अंतिम नहीं होता |&lt;br /&gt;रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स को 26 फरवरी से 3 मार्च के बीच गुड़गाँव की एपिसेंटर कला दीर्घा में 'बियोंड बाउनड्रीज' शीर्षक से शालिनी महाजन व संगीता मल्होत्रा द्वारा क्युरेट की गई समूह प्रदर्शनी में देखा जा सकता है | इस समूह प्रदर्शनी में उनके अलावा आशीष पाही, किशोर चावला, सायरा एच, संगीता मल्होत्रा, वंदना तनेजा, अर्चना भसीन, भावना रस्तोगी और &lt;a href="http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/08/surekha-sadanas-hand-of-destiny-blend.html"&gt;सुरेखा सदाना &lt;/a&gt;के काम को भी देखा जा&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सकेगा |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-665362075739363704?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/665362075739363704/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post_24.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/665362075739363704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/665362075739363704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post_24.html' title='रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स जीवन के शाश्वत संदर्भों की पड़ताल का मौका देती हैं'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4YMQVDr9yI/AAAAAAAAANc/mCu-DNbqTbo/s72-c/RG.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-4522290854214057447</id><published>2010-02-22T07:02:00.000-08:00</published><updated>2010-02-22T07:05:33.743-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian contemporary artist'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='peris'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='syed haider raza'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mukesh mishra'/><title type='text'>सैयद हैदर रजा की कला वस्तुगत स्तर पर समय-काल के परे है, और शैलीगत स्तर पर पूरी तौर से आधुनिक</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KZZSGXETI/AAAAAAAAAMs/CE4RPaaDIXs/s1600-h/Raza+Photo.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KZZSGXETI/AAAAAAAAAMs/CE4RPaaDIXs/s320/Raza+Photo.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारतीय अध्यात्म तथा दर्शन के अनेक गूढ़ रहस्यों के साथ-साथ जीवन की क्षणभंगुरता में आत्मिक आनंद की प्रतीति को कला का मर्म बना देने वाले सैयद हैदर रजा का आज जन्मदिन है | सैयद हैदर रजा आज अपने जीवन के अठ्ठासी वर्ष पूरे कर रहे हैं | स्थाई रूप से पेरिस स्थित अपने घर में रह रहे सैयद हैदर रजा आजकल भारत आये हुए हैं और आज दिल्ली में हैं | सैयद हैदर रजा ने वर्ष 1922 में आज ही के दिन मध्य प्रदेश के मांडला क्षेत्र के बाबरिया गाँव में ताहिरा बेगम की कोख से जन्म लिया था | उनके पिता सईद मोहम्मद&amp;nbsp; राजी उस समय डिप्टी फोरेस्ट रेंजर के पद पर थे | बारह वर्ष की उम्र तक वह गाँव में ही अपने माता-पिता के साथ रहे | तेरह वर्ष की उम्र में वह हाई स्कूल करने दमोह गये | हाई स्कूल करने के बाद वह नागपुर स्कूल ऑफ ऑर्ट गये, जहाँ वह 1939 से 1943 तक रहे | 1943 से 1947 तक उन्होंने मुंबई के जे जे स्कूल ऑफ ऑर्ट में&amp;nbsp; शिक्षा प्राप्त की | वर्ष 1946 में उन्होंने अपने चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी बोम्बे ऑर्ट सोसायटी की कला दीर्घा में की थी | वर्ष 1947 में उनके जीवन की दो प्रमुख घटनाएँ हुईं : पहले उन्होंने अपनी माँ के निधन का सामना किया और फिर फ्रांसिस न्यूटन सूजा के साथ मिलकर उन्होंने बोम्बे ऑर्टिस्ट ग्रुप का&amp;nbsp; गठन किया | वर्ष 1950 में फ्रांस सरकार की एक फेलोशिप के तहत वह तीन वर्ष के लिये पेरिस चले गये, जहाँ उन्होंने कला के विश्व-संसार से परिचय प्राप्त किया | कला के विश्व-संसार से परिचय प्राप्त करने के क्रम में हालत कुछ ऐसे बने कि रजा स्थाई रूप से पेरिस में ही बस गये | फ्रांस सरकार से उन्हें कला का सर्वोच्च सम्मान मिला | रजा पहले गैर फ्रांसीसी कलाकार हैं जिन्हें उक्त सम्मान मिला | पेरिस में लंबे समय तक रहने और वैश्विक कला जगत में अपनी प्रखर पहचान बना लेने&amp;nbsp; के बावजूद रजा का भारत से नाता नहीं टूटा | वह लगातार न सिर्फ भारत आते रहे&amp;nbsp; बल्कि यहाँ के कला जगत के साथ गहरे से जुड़े भी रहे हैं |&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KZhdE_liI/AAAAAAAAANE/9TMyxrPN_SQ/s1600-h/Raza+Art+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KZhdE_liI/AAAAAAAAANE/9TMyxrPN_SQ/s320/Raza+Art+3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रख्यात कलालोचक पॉल गोथिये ने उनका परिचय देते हुए वर्षों पहले लिखा था :&lt;br /&gt;'रजा एक भारतीय कलाकार हैं, जो अब पेरिस में जा बसे हैं |'&amp;nbsp; सैयद हैदर रजा के मन में फ्रांस सरकार की फेलोशिप मिलने से पहले ही फ्रांस के&amp;nbsp; प्रति एक उत्सुकता पैदा हो गई थी | रजा ने बताया है कि उन दिनों - उन दिनों&amp;nbsp; यानि बोम्बे ऑर्टिस्ट ग्रुप के गठन के दिनों में - एक किताब ने उनकी कल्पना को झिंझोड़ दिया था | इरविंग स्टोन की वह किताब थी - लस्ट फॉर लाइफ, जो दरअसल विन्सेंट वॉन गॉग की जीवनी है | रजा को यह तो पता ही था कि विन्सेंट वॉन गॉग एक ऊंचे दर्जे के कलाकार थे, जो फ्रांस में काम करते रहे और वहीं जिनका निधन हुआ था | उन्हीं दिनों - वर्ष 1949 में मुंबई में फ्रेंच कांसुलेट द्वारा आयोजित&amp;nbsp; जीवित फ्रेंच चित्रकारों के काम की बड़ी अनुकृतियों की एक प्रदर्शनी हुई | रजा&amp;nbsp; ने समझ लिया था कि कला के विस्तृत स्त्रोतों तक यदि पहुँच बनानी है तो उन्हें फ्रांस जाना ही होगा | पेरिस उन दिनों यूं भी समकालीन कला का एक स्पंदित केंद्र था |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KaGffuf5I/AAAAAAAAANM/jr9kT7Y5304/s1600-h/Raza+Art+1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KaGffuf5I/AAAAAAAAANM/jr9kT7Y5304/s320/Raza+Art+1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सैयद हैदर रजा ने पेरिस में समकालीन कला की दुनिया से परिचय ही प्राप्त नहीं किया, पेंटिंग को पहचानने का नजरिया भी पाया | उन्होंने स्वीकार किया है कि 1951 - 52 से पहले दरअसल पेंटिंग की असलियत को वह समझते ही नहीं थे | प्रकृति के, रंगों के, लैंडस्केपों के कुछ प्रभाव थे जिन्हें वह एक चित्रनिर्मिति (कंस्ट्रक्शन) में बदल दिया करते थे | उन्होंने कहा है कि यह तो बाद में ही जाना कि आप्टिकल रियलिटी (आँख-यथार्थ) अपने-आप में काफी नहीं है या कि वह पूरा यथार्थ नहीं है | जो चीज चित्र को चित्र बनाती है, वह केवल ऊपर से दीख पड़ने वाली चीज नहीं है | जब चित्र अपनी साँस ले, तभी वह चित्र है | रजा ने 1948 से 1951 तक बहुत काम किया | अपनी पूरी याद के साथ उन्होंने बताया है कि 1949 में उन्होंने करीब तीन सौ चित्र बनाये थे | उन दिनों वह केरल, मद्रास, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, श्रीनगर की कई जगहों तथा कई शहरों में गये थे | वहाँ के जो ढेरों प्रभाव थे और मन में जो ढेरों दृश्य घूमते थे, रजा उन्हें अपने चित्रों में ले आते थे | रजा ने कहा है कि पेरिस पहुँच कर उन्होंने जो देखा / समझा तो पाया कि अभी तक वह जो कर रहे हैं यदि वही करते रहे तो वह तो खो जायेंगे | उन्होंने इस बात को समझा कि उन्हें आप्टिकल रियलिटी से छुटकारा पाना होगा और अपने अंदर की बात ढूंढनी होगी | तब उन्होंने चित्र के आंतरिक जीवन (इनर लाइफ) को तलाशने, चित्र की संगीतात्मक संरचना को समझने, रंगों के साथ एक नया संबंध बनाने का काम शुरू किया; और चाक्षुक यथार्थ (विजुअल रियलिटी) के मर्म को वास्तव में पहचानने का प्रयास किया | रजा ने बहुत साफ शब्दों में स्वीकार किया&lt;br /&gt;है कि सचमुच पहली पेंटिंग उन्होंने पेरिस में 1952 में बनाई |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KaIbFBdyI/AAAAAAAAANU/5dWrsG217ZI/s1600-h/Raza+Art+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KaIbFBdyI/AAAAAAAAANU/5dWrsG217ZI/s320/Raza+Art+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रजा की कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति को संपन्न करने में फ्रांस की आबोहवा का निस्संदेह बहुत योगदान रहा है; लेकिन भारतीय स्त्रोत उनमें बहुत गहरे और अखंड रूप में मौजूद रहे हैं | पॉल गोथिए ने लिखा है कि इन दोनों संसारों के* *बीच उन्होंने अपनी कला का एक ऐसा पुल बांध लिया है जो न तो आधुनिक कला की विशिष्टताओं को नजरअंदाज करता है, और न ही अपनी जड़ों से कतई कटा हुआ है - उनकी कला वस्तुगत स्तर पर समय-काल के परे है, और शैलीगत स्तर पर पूरी तौर से आधुनिक | सैयद हैदर रजा के बनाये चित्र एक जीवंत सार्वभौमिक कला के भौतिक प्रतिरूप हैं | सैयद हैदर रजा के अठ्ठासीवें जन्मदिन के मौके पर इस बात को रेखांकित करना अच्छा भी लग रहा है और रजा पर व अपने बीच उनकी उपस्थिति पर गर्व भी हो रहा है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-4522290854214057447?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/4522290854214057447/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post_22.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4522290854214057447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4522290854214057447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post_22.html' title='सैयद हैदर रजा की कला वस्तुगत स्तर पर समय-काल के परे है, और शैलीगत स्तर पर पूरी तौर से आधुनिक'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S4KZZSGXETI/AAAAAAAAAMs/CE4RPaaDIXs/s72-c/Raza+Photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8425697867191439929</id><published>2010-02-11T05:28:00.000-08:00</published><updated>2010-02-11T05:51:19.525-08:00</updated><title type='text'>नंदा गुप्ता ने केनवस पर जो किया है, उसमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3QB5r_rriI/AAAAAAAAAMU/TvWhfX2TSiA/s1600-h/Nanda+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3QB5r_rriI/AAAAAAAAAMU/TvWhfX2TSiA/s320/Nanda+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नंदा गुप्ता के चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी 12 फरवरी से नई दिल्ली की गीता आर्ट गैलरी में शुरू हो रही है | इस प्रदर्शनी को 28 फरवरी तक देखा जा सकेगा | नंदा इससे पहले एक समूह प्रदर्शनी में अपने चित्रों को प्रदर्शित कर चुकी हैं, तथा कुछेक आर्ट गैलरीज के संग्रहों में उनका काम उपलब्ध है | इस कारण से कह / मान सकते हैं कि नंदा के काम से कला प्रेक्षकों का पहले से जो परिचय है, उनकी एकल प्रदर्शनी उस परिचय को और प्रगाढ़ बनाने का ही काम करेगी | नंदा के काम से जो लोग परिचित हैं और उनके काम को लगातार देखते रहे हैं उन्होंने, पीछे हुई समूह प्रदर्शनी में प्रदर्शित उनके काम को देख कर महसूस किया कि उनके काम में न सिर्फ विषय-वस्तु बदल रही है बल्कि वह समकालीन कला के मुहावरे को पकड़ने की कोशिश भी कर रहा है | इसीलिए नंदा के चित्रों की एकल प्रदर्शनी को लेकर उनके काम से परिचित लोगों के बीच खासी उत्सुकता है |&lt;br /&gt;नंदा गुप्ता ने अपनी कला-यात्रा लैंडस्केप चित्रों से की थी | उन्होंने मानवीय आकृतियों - खासकर चेहरों और चेहरों पर आते-जाते भावों को चित्रित करने में भी खासी दिलचस्पी ली थी | दरअसल प्रकृति ने उन्हें एक व्यक्ति के रूप में भी और एक चित्रकार के रूप में भी गहरे तक प्रभावित किया है; तथा प्रकृति की जादूगरी व उसकी रहस्यमयता ने उन्हें हैरान भी किया और सवालों में उलझाया भी | इस उलझन ने उन्हें अहसास कराया कि जैसे उनसे कुछ छूट रहा है | उलझन से बाहर निकलने और छूट रहे को पहचानने व उसे बनाये रखने तथा वापस पाने की कोशिश में नंदा आध्यात्म व साधना की शरण में गईं तो जैसे उन्होंने अपने आप को और ज्यादा प्रखरता से जानना व पहचानना शुरू किया | सोच में और जीवन में आ रहे इस बदलाव का असर उनकी पेंटिंग्स पर पड़ना स्वाभाविक ही था और वह पड़ा भी | लैंडस्केप, मानवीय आकृतियों व वास्तविक जीवन की वस्तुओं&amp;nbsp;को अपनी पेंटिंग्स का विषय बना रहीं नंदा ने अचानक से अमूर्त रूपाकारों की तरफ अपना कदम बढ़ा लिया | &lt;br /&gt;नंदा गुप्ता की कला-यात्रा को आगे बढ़ाने और एक सुनिश्चित&amp;nbsp;दिशा देने में कविता जायसवाल तथा सुनंदो बसु की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही | नंदा ने कला की औपचारिक शिक्षा का पहला पाठ कविता जायसवाल से सीखा, जिन्होंने उन्हें कला की बुनियादी बारीकियों से परिचित कराने के साथ-साथ प्रयोगों के लिये व केनवस पर खुलकर 'खेलने' के लिये प्रेरित किया | बाद में, नंदा ने जब सुनंदो बसु के 'स्कूल' में कला प्रशिक्षण पाना शुरू किया तो सुनंदो ने उन्हें केनवस पर किए जाने वाले 'खेल' को व्यवस्थित रूप देने की सीख दी | सुनंदो की उस बात की तो जैसे उन्होंने गांठ बांध ली कि उन्हें इतना काम करना है, काम में ऐसा ध्यान लगाना है कि वह सपने भी देखें तो पेंटिंग के ही देखें | इस का जो नतीजा निकला वह यह कि नंदा के काम की अपनी एक विशिष्ट शैली बन गई और उनकी पेंटिंग्स का मूल स्वभाव पहचाना जाने लगा |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3QCBoSZxxI/AAAAAAAAAMc/iQM_VE3NJuI/s1600-h/Nanda+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3QCBoSZxxI/AAAAAAAAAMc/iQM_VE3NJuI/s320/Nanda+3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नंदा गुप्ता के नये काम को देख कर लगता है कि उनकी कला में रंग जैसे अपनी एक निश्चित भूमिका बनाना चाहते हैं | उनके प्रायः प्रत्येक चित्र में एक रंग का ही प्रभुत्व मिलेगा, जिसके साथ और एक या दो रंग इस तरह प्रस्तुत किए गये हैं कि दोनों या तीनों आपस में पूरक न बन कर, एक दूसरे को और अधिक उभारें | नंदा&amp;nbsp;के चित्रों को अमूर्त दृश्यचित्र भी कह सकते हैं, क्योंकि उनमें जाने-पहचाने या परिचित लगने जैसे कोई आकार या आकृति नहीं हैं | चित्रों में एक विस्तार, फैलाव भी है जिसे विभिन्न रंगों से, या एक ही रंग की गहरी, घनी या हल्की वर्णच्छ्टा से विभाजित किया है | इस विभाजन में कहीं गहराई बनती है तो कहीं विस्तार आकार लेता है | केनवस पर नंदा ने जो किया है, उसमें हम एक 'अचरज' भी ढूंढ या पहचान सकते हैं | यह अचरज सहज अचरज है | कुछ उसी तरह का जो कुछ चीजें अपने में कई तरह के चित्र विचित्र आकार छिपाये होने के भ्रम से देती हैं; और जिनमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं | उनके चित्रों में लेकिन सिर्फ अचरज ही नहीं है | नंदा ने रंगों व रंग-छायाओं का जो एक सुमेल प्रस्तुत किया है, उसमें हम एक उड़ान, मिथक, विश्वास, स्वप्न और कल्पना के कई संदर्भ बनते भी देख सकते&amp;nbsp;हैं | &lt;br /&gt;नंदा गुप्ता ने जिस तेजी से अपनी कला का परिष्कार किया है, उससे कला के प्रति उनकी ललक का और सीखने की उनकी सामर्थ्य का सुबूत भी मिलता है | कला के प्रति अपनी ललक तथा सीखने की अपनी ज़िद को यदि वह लगातार बनाये रख सकीं, तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में उनके और उम्दा व परिष्कृत चित्रों को देखने का सुख व सौभाग्य मिलेगा |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8425697867191439929?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8425697867191439929/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8425697867191439929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8425697867191439929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html' title='नंदा गुप्ता ने केनवस पर जो किया है, उसमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3QB5r_rriI/AAAAAAAAAMU/TvWhfX2TSiA/s72-c/Nanda+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-5445501802894285895</id><published>2010-02-09T04:28:00.000-08:00</published><updated>2010-02-09T04:40:42.570-08:00</updated><title type='text'>कोलकाता को देखते हुए, बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव रहा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FTubmT63I/AAAAAAAAALk/320oQo1FQ4o/s1600-h/BB+kee+photo.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FTubmT63I/AAAAAAAAALk/320oQo1FQ4o/s320/BB+kee+photo.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;कोलकाता पहुंचा तो जरूरी कामों की फेहरिस्त में बिकास भट्टाचार्य का काम देखना भी दर्ज था, जिसे मैं किसी भी हालत में पूरा कर लेना चाहता था | बिकास भट्टाचार्य का काम यूं तो मैंने दिल्ली में कई बार देखा है, लेकिन एक बार किसी ने कहा था कि कोलकाता में घूमते / रहते हुए बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव होता है | कुछेक वर्ष पहले, यह सुन कर मैंने जैसे ठान लिया था कि जब भी कोलकाता जाऊँगा पहला काम बिकास भट्टाचार्य की पेंटिंग्स देखने का करूंगा | मैंने ठान तो लिया था लेकिन बात आई-गई सी हो गई थी, क्योंकि कोलकाता जाने का कोई मौका ही नहीं मिला | लेकिन लगता है कि जो ठाना था, वह गहरे घर कर गया था; क्योंकि रोटरी इंटरनेशनल के एक कार्यक्रम में कोलकाता जाने का प्रोग्राम जब सचमुच बना और कार्यक्रम के स्थानीय आयोजक ने पूछा कि कोलकाता में मैं कहाँ कहाँ जाना चाहूँगा, तो जैसे बेसाख्ता मेरे मुंह से यही निकला की मैं वहाँ बिकास भट्टाचार्य का काम जरूर देखना चाहूँगा | मैं यह सचमुच जानना / समझना चाहता था कि जिस किसी ने भी यह कहा था कि - कोलकाता में घूमते / रहते हुए या कहें कि कोलकाता को देखते हुए बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव होता है, वह यूं ही कहा था या उस कहे हुए के कोई खास मतलब भी थे |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बिकास भट्टाचार्य के काम और उनके चित्रकार बनने की कथा ने मुझे यूं भी खासा उद्वेलित किया है | उन्होंने अपनी कला को जिस तरह सामाजिक यथार्थ से जोड़ा और उनके आसपास की ज़िन्दगी व दिन-प्रतिदिन के अनुभव, संवेग, विचार उनके आत्म प्रत्यक्षीकृत हो उनके चित्रों में आकार ग्रहण करते रहे; और जो देश, काल व समाज के यथार्थ के साथ उसकी विसंगतियों व विद्रूपताओं को उजागर करने का जरिया बने - वह बिकास भट्टाचार्य के विजन तथा अपने विजन को केनवस पर ट्रांसफर करने की उनकी कलात्मक सामर्थ्य को प्रकट करती है | उन्होंने यह विजन और सामर्थ्य कहाँ से पाया - इसे जानने / समझने में उनके जीवन के शुरुआती दिनों के उनके संघर्ष की कथा काफी मदद करती है |&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FUGMMTGXI/AAAAAAAAAL8/ND9v0FAmBlE/s1600-h/BB+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FUGMMTGXI/AAAAAAAAAL8/ND9v0FAmBlE/s320/BB+3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;बिकास भट्टाचार्य का जन्म सीलन, गंदगी और अभावों से भरी एक मलिन बस्ती के एक बहुत ही साधारण से परिवार में हुआ था | उनके जन्म लेने के कुछ ही समय बाद उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया था | परिवार चलाने के लिये उनकी विधवा माँ को मजदूरी करनी पड़ी | उससे भी मुश्किल से ही गुजारा हो पाता | इसी कारण, बिकास को होश सँभालते-सँभालते ही मजदूरी करने के लिये मजबूर होना पड़ा | बिकास ने बचपन तो जैसे 'देखा' ही नहीं | गरीबी, अभाव, मजबूरी और संघर्ष के बीच ही बिकास ने न सिर्फ होश संभाला, बल्कि अपने जीवन की दिशा भी तय की; और यहीं उनमें कला के बीज पड़े / पनपे | पच्चीस वर्ष की उम्र में बिकास ने अपने चित्रों की जो पहली एकल प्रदर्शनी की, उसने कोलकाता के लोगों के बीच इस कारण से धूम मचाई थी क्योंकि उनके चित्रों में उपेक्षित व शनै-शनै मरते हुए कोलकाता की सच्चाई को उदघाटित किया गया था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बिकास भट्टाचार्य ने अपनी पहली ही प्रदर्शनी से कोलकाता के कला जगत में अपनी धाक जमा ली थी, जिसके बाद फिर उनके लिये राष्ट्रिय व अंतर्राष्ट्रीय ख्याति बहुत दूर नहीं रह गई थी | बिकास अभी तीस वर्ष के भी नहीं हुए थे कि उनकी पेंटिंग्स को पेरिस की द्विवार्षिकी में स्थान मिला | इकतीस वर्ष की उम्र में उन्हें ललित कला अकादमी का पुरस्कार मिला | देश-विदेश की अनेकों प्रतिष्ठित प्रदर्शनियों और आर्ट गैलरियों में उनके चित्रों को सम्मानपूर्ण तरीके से स्थान मिला और उन्हें ढेर सारा मान व प्रशंसा | इसके बावजूद बिकास इस सम्मान और प्रशंसा से नहीं, बल्कि अपने काम से पहचाने गये हैं | शहरी बंगाली मध्य वर्ग की मानसिकता को, उसके सामाजिक परिवेश को, उसकी विसंगति व विद्रूपता को जिस गहरी समझ व दोटूक ढंग से बिकास भट्टाचार्य ने केनवस पर चित्रित किया है - वह अपने आप में कला प्रेक्षकों के लिये एक अनोखा अनुभव रहा; और उनके इसी अनोखे अनुभव ने बिकास भट्टाचार्य को बड़ा कलाकार तो बनाया ही, उन्हें खास पहचान भी दी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FT8WssnSI/AAAAAAAAAL0/BUgg5fVznh4/s1600-h/BB+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FT8WssnSI/AAAAAAAAAL0/BUgg5fVznh4/s320/BB+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;बिकास भट्टाचार्य की इस पहचान ने पेंटिंग्स के उद्देश्यपरक होने की बात को स्वीकृति व मान दिलाने का काम भी किया | अन्यथा इस बात को हेय रूप में देखा / माना जाता था | अपने इस काम के जरिये बिकास ने समकालीन कला को एक नई भाषा और एक नया व्याकरण दिया | बिकास भट्टाचार्य का विश्वास चूंकि यथार्थवादी चित्रण में रहा है, इसी कारण से उनके बनाये चित्र प्रायः फोटो जैसे दिखते हैं; हालाँकि कथ्य के अनुरूप उन्होंने अक्सर चित्रों में की आकृतियों का विरूपीकरण भी किया है | उनका मानना और कहना रहा है - जिसे उन्होंने अपने चित्रों में अभिव्यक्त भी किया है - कि चित्र को दर्शक के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, न&amp;nbsp;कि उसे चित्रकार के विचारों को संप्रेषित करने का काम | बिकास भट्टाचार्य ने कोलकाता में अभाव, गरीबी व मजबूरी के शिकार लोगों के बीच अपना बचपन व किशोरावस्था बिताते हुए जीवन-जगत की जिस सच्चाई को पहचाना उसे ही कलात्मक संवेदना के साथ केनवस पर उकेरा | यही कारण रहा कि उनकी कला ने दर्शक के साथ विश्वास का रिश्ता बनाया | कोलकाता में घूमते / रहते हुए बिकास भट्टाचार्य के काम को देखते हुए इस रिश्ते की व्यापकता व गहराई की और-और परतें मैंने खुलती हुई पाईं तथा पहचानीं |&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-5445501802894285895?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/5445501802894285895/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/5445501802894285895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/5445501802894285895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='कोलकाता को देखते हुए, बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव रहा'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S3FTubmT63I/AAAAAAAAALk/320oQo1FQ4o/s72-c/BB+kee+photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8248814379274770237</id><published>2010-01-25T06:27:00.001-08:00</published><updated>2010-01-25T07:07:03.071-08:00</updated><title type='text'>कृष्ण खन्ना के काम का सिंहावलोकन</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S12rvZTzUuI/AAAAAAAAALc/f8R345h4_T8/s1600-h/Krishn+Khanna+Photo.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S12rvZTzUuI/AAAAAAAAALc/f8R345h4_T8/s320/Krishn+Khanna+Photo.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;सैफरन आर्ट द्वारा ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में इन दिनों कृष्ण खन्ना की रेट्रोस्पेक्टिव - सिंहावलोकन प्रदर्शनी आयोजित की जा रही है, जिसमें उनके पिछले पचास वर्षों में किए गये कामों में से एक सौ बीस कामों को प्रदर्शित किया गया है | प्रदर्शनी में एक विस्तृत कैटलॉग भी उपलब्ध है | प्रदर्शनी कृष्ण खन्ना के कुल कामकाज की एक व्यापक झलक पेश करती है | पिछले पचास वर्षों की अपनी रचना-यात्रा में कृष्ण खन्ना की कला ने कई मोड़ और पड़ाव देखे हैं | इसी का नतीजा है कि रचना-विधियों और चित्र-भाषा के मामले में हमें उनके काम में खासी विविधता देखने को मिलती है | कृष्ण खन्ना ने अपने आस-पास की 'दुनिया' से अपनी पेंटिंग्स के लिये विषय चुने | मुंबई में उन्होंने औद्योगिक मजदूरों की मुश्किलों व पीड़ाओं को करीब से देखा और उन्हें अपनी पेंटिंग्स में व्यक्त किया | श्रमिक स्त्री-पुरूषों की तकलीफों व मुश्किल ज़िन्दगी को कृष्ण खन्ना ने जिस संलग्नता व संवेदनशीलता से अपनी पेंटिंग्स में जगह दी, वैसा दूसरा उदाहरण शायद ही कोई मिलेगा |&lt;br /&gt;कृष्ण खन्ना यूँ तो फिगरेटिव पेंटर हैं - और अपनी कलात्मक ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में अमूर्तन पर उन्होंने कभी विश्वास नहीं किया - लेकिन रेखाओं की अनुपस्थिति के कारण तथा रंगों के फार्म की तरह इस्तेमाल होने के चलते उनकी कई पेंटिंग्स अमूर्त काम की श्रेणी में आ जाती हैं | इस तरह का प्रयोग कृष्ण खन्ना के साथ-साथ पचास से साठ के दशक में उभरे दूसरे कलाकारों जैसे रामकुमार, मकबूल फ़िदा हुसैन, केजी सुब्रह्मण्यम आदि की भी खासियत रही है | इनकी बहुत सी पेंटिंग्स 'दिखती' तो फिगरेटिव हैं, लेकिन अपने रंग पैटर्न के कारण वह आती अमूर्तन की श्रेणी में हैं | ऐसा संभवतः इस कारण हुआ होगा कि पेंट करते समय इन कलाकारों ने विषय की तुलना में पेंटिंग्स को लेकर ज्यादा चिंता की होगी | टैक्सचर, रंगों के टोन तथा फोर्स पर बल देने को लेकर सभी में अपने-अपने ढंग की विशेषता है, सबने अपने-अपने ढंग से इन तत्त्वों का प्रयोग किया | कई तरह की समानताएं होते हुए भी सभी की अपनी-अपनी स्टाइल बनी, उनके चित्रों में उनकी स्टाइल को अभिव्यक्त होते हुए देखा गया और उनकी स्टाइल ही फिर उनकी पहचान बनी | कृष्ण खन्ना की पेंटिंग्स में - जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है - रंग ही फार्म है जो अंतर्वस्तु के बहुत अनुकूल प्रयुक्त हुआ है | कृष्ण खन्ना देश के उन शीर्षस्थ कलाकारों में हैं जिन्होंने समकालीन भारतीय कला को न केवल समृद्ध किया, बल्कि तमाम युवा कलाकारों को प्रेरित व दिशा-निर्देशित भी किया | कृष्ण खन्ना प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के अत्यंत सक्रिय सदस्य रहे और अपनी सक्रियता के भरोसे ही उन्होंने ग्रुप की कलात्मक व वैचारिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाई थी | जे. स्वामीनाथन उनके अच्छे मित्र थे लेकिन इसके बावजूद उनके साथ के अपने वैचारिक मतभेदों को प्रकट करने में उन्होंने कभी हिचक नहीं दिखाई | स्वामीनाथन दरअसल समकालीन भारतीय कला को भारतीय सौंदर्यशास्त्र, उसमें भी खासतौर से जनजातीय कला से विकसित करने के पक्ष में थे, जबकि कृष्ण खन्ना समकालीन कला को पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र की बजाये अंतर्राष्ट्रीय बनाने के पक्ष में थे | स्वामीनाथन इतिहास को मृत मानते थे, जबकि कृष्ण खन्ना व्यक्ति की ऐतिहासिकता को न सिर्फ स्वीकार करते थे बल्कि उसे महत्त्वपूर्ण भी मानते रहे | अमूर्तता की हदों तक पहुँचते-पहुँचते हुए भी अपनी पेंटिंग्स में कृष्ण खन्ना ने कभी आकृतियों को विलीन नहीं होने दिया; उन्होंने कभी शून्य में जाने की जाने की कोशिश नहीं की | अपनी पेंटिंग्स में, व्यक्ति की ऐतिहासिकता और ऐहिकता को पहचानने की कोशिश करते हुए उसे, उन्होंने लगातार व्यक्त करने का काम ही &amp;nbsp; किया | यही वह 'जगह' है - जहाँ उनकी राह स्वामीनाथन की राह से अलग होती है | &lt;br /&gt;स्वामीनाथन और कृष्ण खन्ना के बीच के वैचारिक संघर्ष को दक्षिणपंथी व वामपंथी संघर्ष के रूप में भी देखा/पहचाना गया | हालाँकि कृष्ण खन्ना प्रचलित अर्थों में कभी भी वामपंथी नहीं रहे | स्वामीनाथन के साथ चले वैचारिक संघर्षों के बावजूद, कृष्ण खन्ना ने 'बैंड वाला' शीर्षक से सामाजिक यथार्थवादी विषयों पर जो &lt;br /&gt;चित्र-श्रृंखला तैयार की थी, उसका कैटलॉग उन्होंने स्वामीनाथन से ही लिखवाया और स्वामीनाथन ने ही उसे लिखा |&lt;br /&gt;कृष्ण खन्ना का जन्म 1925 में ल्यालपुर, पाकिस्तान का जो शहर अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है, में हुआ था |&amp;nbsp; जन्म के बाद लेकिन उनका परिवार लाहौर आ गया था, जहाँ वह पले/बढ़े | ग्रेजुएशन हालाँकि उन्होंने इंग्लैंड के इम्पीरियल सर्विस कॉलिज से 1940 में किया था | देश के विभाजन के बाद कृष्ण खन्ना का परिवार शिमला आ गया था | भारत में कृष्ण खन्ना ने ग्रिंडलेज़ बैंक में नौकरी प्राप्त की और उन्हें मुंबई में पोस्टिंग मिली | मुंबई में ग्रिंडलेज़ बैंक की नौकरी करते हुए ही कृष्ण खन्ना प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संपर्क में आये; और उसी संपर्क के साथ उन्होंने कला जगत में प्रवेश किया | कला से उनका परिचय हालाँकि लाहौर&amp;nbsp; में हो गया था, जहाँ उन्होंने मेयो कॉलिज ऑफ ऑर्ट में शाम की कक्षाओं में दाखिला लिया था | कला की औपचारिक शिक्षा के नाम पर उन्होंने यही कुछ किया था | मुंबई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संपर्क में आने के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; देखा | देश में नहीं, विदेशों में भी कृष्ण खन्ना ने न सिर्फ अपनी कला को प्रदर्शित किया, बल्कि तमाम प्रशंसा व पुरस्कार भी प्राप्त किए | देश में भी उनकी कला&amp;nbsp; को खास सम्मान मिला | 1996 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया | मजेदार संयोग है कि कृष्ण खन्ना की पहली पेंटिंग टाटा समूह के टाटा इंस्टीट्यूट के डॉक्टर होमी भाभा ने खरीदी थी, तो सैफरन आर्ट द्वारा आयोजित इस पुनरावलोकन प्रदर्शनी को संभव बनाने में भी टाटा समूह की टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड का सहयोग रहा &amp;nbsp; है |&lt;br /&gt;कृष्ण खन्ना के काम की सिंहावलोकन प्रदर्शनी को देखना अपने आप में एक खास अनुभव है | समकालीन कला में दिलचस्पी रखने वालों को यह प्रदर्शनी अवश्य ही देखना चाहिए | ललित कला अकादमी की दीर्घाओं में इस प्रदर्शनी को पांच फरवरी तक देखा जा सकता है |&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8248814379274770237?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8248814379274770237/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8248814379274770237'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8248814379274770237'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='कृष्ण खन्ना के काम का सिंहावलोकन'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/S12rvZTzUuI/AAAAAAAAALc/f8R345h4_T8/s72-c/Krishn+Khanna+Photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8356552047743353198</id><published>2009-12-27T22:25:00.000-08:00</published><updated>2009-12-27T22:49:43.627-08:00</updated><title type='text'>अकबर पदमसी के चित्रों का भारतीय समकालीन कला के संदर्भ में एक विशेष महत्त्व है</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhOZ1Z2UPI/AAAAAAAAAKc/_qe-4QxfoqM/s1600-h/Akbar+P.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhOZ1Z2UPI/AAAAAAAAAKc/_qe-4QxfoqM/s320/Akbar+P.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;अकबर पदमसी की नई पेंटिंग्स अगले माह मुंबई की पुंदोले आर्ट गैलरी में प्रदर्शित होंगी | इसी दौरान 'वर्क इन लेंग्वेज' शीर्षक किताब का विमोचन भी होगा, जिसमें अकबर पदमसी की कामकाज का व्यापक मूल्यांकन व विश्लेषण किया गया है | 1928 में जन्में अकबर पदमसी एक अत्यंत सक्रिय कलाकार हैं और कला के बाज़ार में भी लगातार अपनी धाक बनाये हुए हैं | पिछले दिनों ही उनकी पेंटिंग्स अंतर्राष्ट्रीय कला बाज़ार में ऊंची कीमतों पर बिकी हैं | अपने काम, अपनी सक्रियता और कला बाज़ार की हलचलों के केंद्र में रहने के कारण अकबर पदमसी कला प्रेक्षकों के बीच निरंतर चर्चा में रहते हैं; और उनका नया या पुराना काम देखने को मिलता रहता है | अकबर ने अपने जीवन के बहुत से वर्ष पेरिस में बिताएं हैं | यह तथ्य उनकी कृतियों को देखते हुए जैसे हर बार ध्यान में रखने लायक है | क्योंकि कला क्षेत्र में जिसे 'पेरिस स्कूल' कह कर पुकारा / पहचाना जाता है, उसकी चित्र-भाषा से एक संबंध अकबर की कृतियों का जुड़ता है | अकबर पदमसी के आरंभिक आकृतिमूलक काम हों या बाद के लैंडस्केप हों - दोनों में ही हम जो चित्रभाषा देखते हैं वह आधुनिक यूरोपीय चित्रभाषा की उपलब्धियों से दूर तक जुड़ी हुई हैं | गौर करने की बात यह है कि यह चित्रभाषा अकबर की कृतियों में अनायास नहीं चली आई थी - और वह सतही नहीं है | उसे अकबर पदमसी ने अपने चित्रफलक पर 'अर्जित' भी किया है |&lt;br /&gt;अर्जित करने की इस प्रक्रिया में दो बातें हुईं : अकबर की चित्रभाषा तत्कालीन पेरिस-कलादृश्य के अधीन निरंतर एक मँजाव ढूंढती रहीं और इस बात का प्रयत्न भी करती रहीं कि वह उनके अपने 'स्वभाव' को भी बरकरार रखे | अपने लिये आदर्श मानी गई चित्रभाषा में किस हद तक उनका स्वभाव विलीन हुआ, इसका तो अनुमान ही लगाया जा सकता है, लेकिन इस में संदेह नहीं कि अकबर पदमसी ने उस काल में कई सधी हुई कृतियों की रचना की | रसोई के कुछ उपकरणों को लेकर किया गया उनका 'अचल जीवन' ऐसी ही एक कृति है, जिसमें उपकरणों पर आरोपित दमकते रंगों और पृष्ठभूमि के रंगों के एक अंतर्निर्भर संबंध से निर्जीव वस्तुओं&amp;nbsp;ने अपने 'मौन' को एक विश्वसनीय रंगभाषा में तोड़ा | उनके शुरू के आकृतिमूलक काम में भी जैसे एक सधी हुई देह लय (आकारिक रेखाओं) और टेक्सरयुक्त सघन रंगों में पहले हम एक स्तब्धता के निकट पहुँचते हैं, और फिर धीरे धीरे यह स्तब्धता टूटने लगती है | &lt;br /&gt;अकबर पदमसी के अमूर्त से लैंडस्केप में - जिनमें अधिकतर में अर्द्वचंद्राकार और रंग चाकू से लगाये गये विविध लेकिन मद्विमवर्णी थक्के ही हैं - भी हम एक विश्रांति और इसी विश्रांति से धीरे धीरे प्रकट होती एक सुगबुगाहट देखते हैं | इस तरह से कहना&amp;nbsp;भले ही चित्रों को शाब्दिक अर्थ में लेना लगे - हम देखते हैं कि उनकी कला का मुख्य स्वभाव विश्रांति और चुप्पी का ही है - ऐसी विश्रांति और चुप्पी जो अपनी शर्तों पर ही अपने को क्रमशः तोड़ेगी : तोड़ेगी, लेकिन एक निश्चित सीमा तक ही | अकबर पदमसी के स्याह सफेद रेखांकनों के चेहरों में एक ओर जलीय सी उपस्थिति है - दूसरी ओर एक आकारिक दृढ़ता भी | स्याह सफेद के अनुपात बहुत सधे हुए हैं | जाहिर है कि इनके पीछे सधे हाथों का एक लंबा अनुभव है, वरना इन रेखांकनों में चित्रभाषा और मर्म - दोनों के ही सरलीकरण कम नहीं हैं | चीनी-जापानी जलीय अंकन के कुछ प्रभाव भी उनके काम में दिखते हैं | उनके चित्रों में व्यक्त होता सा दिखता कथ्य - उनके बिंबों की भंगिमा - अक्सर चित्रभाषा की एक कठिन अनुशासनी सर्वोपरिता में अपने को विलीन और अभिव्यक्त करती है | अकबर पदमसी ने अपने कई चित्रों में चटख रंगों का प्रयोग भी किया है जो भारतीय रंग स्वभाव के अधिक निकट है | अकबर पदमसी के चित्रों का रचनाकाल करीब करीब छह दशकों तक फैला हुआ है, इसलिए भारतीय समकालीन कला के संदर्भ में उनके काम का एक विशेष महत्त्व है | उनके काम को देखना-समझना जैसे एक बड़े दौर को देखने-समझने की तरह है|&lt;br /&gt;अकबर पदमसी के कुछेक चित्रों को आप यहाँ भी देख सकते हैं :&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUVdrcF4I/AAAAAAAAAKs/InoXGfieOLM/s1600-h/Akbar+1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUVdrcF4I/AAAAAAAAAKs/InoXGfieOLM/s320/Akbar+1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUWx5YaTI/AAAAAAAAAK0/KLXYNGRcEm8/s1600-h/Akbar+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUWx5YaTI/AAAAAAAAAK0/KLXYNGRcEm8/s320/Akbar+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUZfc7NAI/AAAAAAAAAK8/4Vp7bgbeguc/s1600-h/Akbar+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUZfc7NAI/AAAAAAAAAK8/4Vp7bgbeguc/s320/Akbar+3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUcWhcFlI/AAAAAAAAALE/EooPgV6zHaE/s1600-h/Akbar+4.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUcWhcFlI/AAAAAAAAALE/EooPgV6zHaE/s320/Akbar+4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt; &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUdl79LVI/AAAAAAAAALM/PrgYwPFO2HA/s1600-h/Akbar+5.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUdl79LVI/AAAAAAAAALM/PrgYwPFO2HA/s320/Akbar+5.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUgoS4DpI/AAAAAAAAALU/Uu3b70T89xc/s1600-h/Akbar+6.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhUgoS4DpI/AAAAAAAAALU/Uu3b70T89xc/s320/Akbar+6.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8356552047743353198?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8356552047743353198/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/12/blog-post_27.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8356552047743353198'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8356552047743353198'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/12/blog-post_27.html' title='अकबर पदमसी के चित्रों का भारतीय समकालीन कला के संदर्भ में एक विशेष महत्त्व है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SzhOZ1Z2UPI/AAAAAAAAAKc/_qe-4QxfoqM/s72-c/Akbar+P.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-6595735471315234309</id><published>2009-12-06T06:14:00.001-08:00</published><updated>2009-12-12T17:17:41.290-08:00</updated><title type='text'>शालू जैन को 'अंतरंग अकादमी सम्मान'</title><content type='html'>अंतरंग अकादमी ने चित्रकला के लिये वर्ष 2009 के 'अंतरंग अकादमी सम्मान' के लिये शालू जैन का चयन किया है | यह घोषणा करते हुए अकादमी की प्रबंध कार्यकारिणी के अध्यक्ष डॉक्टर लक्ष्मीमल्ल व्यास ने बताया कि सम्मान के लिये योग्य युवा प्रतिभा का चयन करने खातिर युवा सर्जनात्मकता का आकलन करने की प्रक्रिया में, नए प्रयोगों और सूक्ष्म दृष्टि से अपने काम में एक नयापन और विविधता लाने में शालू जैन की निरंतर सक्रियता और सक्षमता को रेखांकित करते हुए तीन सदस्यों की कमेटी ने एकमत से यह फैसला किया है | सम्मान के लिये योग्यता को लेकर उन्होंने कहा कि अकादमी की प्रबंध कार्यकारिणी के सदस्यों ने देखने और समझने की कोशिश की कि कौन से पत्थर तैरने वाले और पार पहुँचने वाले हैं | साथ ही यह भी सोचा गया कि यह सम्मान ऐसा न हो जो पहुंचे हुए लोगों की पहुँच की प्राप्ति स्वीकार करता हो | डॉक्टर लक्ष्मीमल्ल व्यास ने बताया कि कमेटी के सदस्यों को तथा उन्हें यह बात तो बाद में पता चली कि शालू जैन ने कला का संस्कार और परिष्कार बड़ौत नाम के उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में प्राप्त किया है | इस जानकारी को डॉक्टर लक्ष्मीमल्ल व्यास ने शालू जैन के चयन के फैसले के संदर्भ में उल्लेखनीय माना | उनका कहना रहा कि शालू जैन की कला के &lt;br /&gt;स्त्रोत बड़ौत जैसी छोटी जगह में हैं, यह एक कलाकार के रूप में उनके लिये महत्त्व की बात है या नहीं, यह तो वे जानें; अपने फैसले के संदर्भ में यह हमारे लिये अवश्य ही महत्त्व की है | डॉक्टर लक्ष्मीमल्ल व्यास ने बताया कि दिसंबर के अंतिम सप्ताह में लखनऊ में होने वाले अकादमी के वार्षिक कला उत्सव में शालू जैन का सम्मान किया जायेगा | &lt;br /&gt;शालू जैन ने पिछले छह - सात वर्षों में विभिन्न जगहों पर अलग - अलग संस्थाओं द्वारा आयोजित समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | पिछले तीन वर्षों के दौरान दो बार - पहली बार नई दिल्ली के प्रेस क्लब में तथा दूसरी बार लोकायत मुल्कराज आनंद सेंटर में उन्होंने अपनी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनियां भी की हैं | बीते दिनों की उनकी कला - सक्रियता को यहाँ याद करने की प्रासंगिकता इसलिए है क्योंकि उनकी यही सक्रियता स्वयं में इस बात का एक प्रमाण है कि चित्रकला से उनका गहरा लगाव है; और इस लगाव के चलते ही शालू जैन ने युवा चित्रकारों में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है | शालू जैन के चित्रों में चित्रता-गुण भरपूर हैं और चित्रभाषा की उपस्थिति, एक वास्तविक उपस्थिति लगती है - एक ऐसी उपस्थिति जो देखते ही बनती है और जो अपने विश्लेषण के लिये हमें तरह तरह से उकसाती भी है | उनके चित्र बार-बार देखे गये से प्रतीत होते हैं; इसके बावजूद हम उन्हें दोबारा देखने के लिये प्रेरित होते हैं, और फिर पाते हैं कि जैसे उन्हें पहली बार देख रहे हों |&lt;br /&gt;शालू जैन के चित्रों में प्रकृति के और प्रकृति-स्थितियों के कायांतरित आकार हैं, हमारी आँखों के सामने जैसे नाटकीय घटनाएँ घट रही होती हैं; रूपाकार ऊर्जावान गतियों से सजीव होने लगते हैं - कुछ इस तरह जैसे पहले ऐसे दृश्य कभी देखे न हों, हालाँकि हम उनसे अच्छी तरह परिचित होते हैं | यह शालू के काम की विलक्षण अभिव्यक्ति है, उनकी स्वप्नसृष्टि की अभिव्यक्ति | उनकी चेतना की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति जैसे लगते हैं उनकी पेंटिंग्स में के परिदृश्य | एक चित्र की रचनाप्रक्रिया के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि एक दिन वह अपने घर की छत पर थीं कि गरजते बादलों को उन्होंने कुछ इस तरह उमड़ते-घुमड़ते हुए देखा, कि तुरंत एक पेंटिंग पर काम करने के लिये वह प्रेरित हुईं | बादलों का उमड़ना-घुमड़ना उन्होंने हालाँकि पहले भी कई-कई बार देखा है, लेकिन उस दिन यदि उनमें उस परिदृश्य को पेंट करने की 'इच्छा' पैदा हुई, तो यह 'चेतना की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति' जैसा मामला ही है, जिसमें 'स्वप्नसृष्टि की अभिव्यक्ति' के तत्त्वों को भी देखा/पहचाना जा सकता है | उक्त घटना उन्होंने बताई तो पता चला; वह नहीं भी बतातीं, तो उनकी पेंटिंग्स तो यह 'बता' ही रही थीं | उनकी पेंटिंग्स में धरातल तथा पुंज (मास) का एक सादा-सा ज्यामितीय संतुलन बनता दिखता है, जो कलाकार के मन में पनपने वाली सुघट्य भावनाओं का परिचय देता है | अपनी पेंटिंग्स में के आकारों को शालू ने कहीं कहीं छायाकृति (सिलुएट) की तरह भी प्रस्तुत किया है |&lt;br /&gt;शालू जैन पिछले काफी समय से प्रकृति के कई उपकरणों को लेकर ही काम कर रही हैं और इन उपकरणों की एक 'समानता' के बावजूद हर बार उनके काम में हमें एक और गहराई दीख पड़ती है | एक्रिलिक रंगों से बने उनके चित्र प्रकृति के दृश्यजगत का ही मानों एक निचोड़ हैं | उनके चित्रों में जैसे उनका दृश्यमान ही परिवर्तित हो गया है - प्रकृति उपकरण किसी कोण विशेष से ही न देखे जाकर, एक आत्मसात आंतरिक और बाह्य स्पेस (और रंगों) के रूप में देखे गए हैं | उनके चित्र-देश ने उन तमाम हलचलों, गतियों, संकेतों और मर्मों को अपने में बुन और समाहित कर लिया है जो ऋतुएं और मानस, एक अंतर्संबंध में घटित करते हैं; और जिनमें स्मृतियाँ रहती हैं, रंग-अनुभव रहते हैं, प्रकाश और छायाएं रहती हैं, शारीरिक-ऐंद्रिक उद्वेग रहते हैं, और जो कुल मिलाकर एक आत्मिक अनुभव में बदल जाते हैं | इस तरह प्रकृति उपकरण शालू जैन की कला में अभिन्न रूप से जुड़ गए हैं | इस तरह की 'अभिन्नता' किसी कलाकार में एक दुहराव में भी बदल सकती थी; लेकिन शालू जैन के यहाँ वह दुहराव में न बदल कर हर बार एक नए विस्मय में बदल जाती है | हम हर बार अनुभव करते हैं कि हम ने जो पहले देखा था, वह इससे मिलता जुलता तो था, लेकिन ठीक ऐसा ही नहीं था | लेकिन ठीक वैसा न लगने में 'ही' उन की कला की सार्थकता नहीं है - वह तो इसी बात में है कि वह हर बार अपने को सार्थक करती&amp;nbsp; है |&lt;br /&gt;'अंतरंग अकादमी सम्मान' के लिये शालू जैन का चुना जाना वास्तव में उनकी कला की इसी सार्थकता का सम्मान है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई दिल्ली के लोकायत मुल्कराज आनंद सेंटर में 'इन द लेप ऑफ नेचर' शीर्षक से कुछ समय पहले आयोजित हुई शालू जैन की एकल प्रदर्शनी में प्रदर्शित कुछ चित्र आप  यहाँ देख सकते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyQ_4OcRB4I/AAAAAAAAAJE/ztoYIpjkrt8/s1600-h/SJ+1%285%29.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyQ_4OcRB4I/AAAAAAAAAJE/ztoYIpjkrt8/s320/SJ+1%285%29.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRACY2dXbI/AAAAAAAAAJM/Tx8rj0b9InE/s1600-h/SJ+2%282%29.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRACY2dXbI/AAAAAAAAAJM/Tx8rj0b9InE/s320/SJ+2%282%29.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRALhyH71I/AAAAAAAAAJU/uiUnaGKLAsk/s1600-h/SJ+3%282%29.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRALhyH71I/AAAAAAAAAJU/uiUnaGKLAsk/s320/SJ+3%282%29.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRAVCZ6rsI/AAAAAAAAAJc/wbGdGRjRV28/s1600-h/SJ+4%283%29.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRAVCZ6rsI/AAAAAAAAAJc/wbGdGRjRV28/s320/SJ+4%283%29.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRAbW8RTsI/AAAAAAAAAJk/A8MLN8IoP6k/s1600-h/SJ+5%282%29.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyRAbW8RTsI/AAAAAAAAAJk/A8MLN8IoP6k/s320/SJ+5%282%29.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-6595735471315234309?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/6595735471315234309/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6595735471315234309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6595735471315234309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='शालू जैन को &apos;अंतरंग अकादमी सम्मान&apos;'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SyQ_4OcRB4I/AAAAAAAAAJE/ztoYIpjkrt8/s72-c/SJ+1%285%29.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-2877837309556139887</id><published>2009-11-22T22:11:00.001-08:00</published><updated>2009-11-23T06:16:09.634-08:00</updated><title type='text'>पिकासो की वर्षों पहले कही गई बात कि 'चित्र अपनी अनुश्रुति पर ही जीवित रहेगा, किसी और चीज पर नहीं' को मैंने अपने सामने सच होते हुए पाया</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SwqZE2YbNMI/AAAAAAAAAI4/OTUcczIbp7A/s1600/Pablo_picasso_1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SwqZE2YbNMI/AAAAAAAAAI4/OTUcczIbp7A/s320/Pablo_picasso_1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके घर लौट रहे लोगों से खचाखच भरे ट्रेन के डिब्बे में अपने दोस्तों को जब मैंने बातों ही बातों में यूं ही बताया कि आज मैंने पिकासो के चित्रों की प्रदर्शनी देखने का काम किया है, तो मैंने महसूस किया की मेरे दोस्तों ने मुझे कुछ खास तवज्जो देना शुरू कर दिया | अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके घर लौटने की जल्दी&amp;nbsp;में ट्रेन में साथ बैठे उन दोस्तों को मैं चूंकि अच्छी तरह जानता हूँ; मैं जानता हूँ कि कला उनके लिये एक फालतू किस्म का काम है; मैं जानता हूँ कि उन्हें पिकासो तो क्या किसी भी कलाकार के बारे में या उनके काम के बारे में जानने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही होगी; मैं जानता हूँ कि कला में मेरी दिलचस्पी उनके लिये अक्सर मजाक का विषय रही है - लेकिन अब नज़ारा बदला हुआ था | मैंने पिकासो की पेंटिंग्स देखी हैं, मैं पिकासो के बारे में कुछ जानता हूँ, मुझे पहले से पता था कि पिकासो की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी दिल्ली में कहाँ लगी है और मैं आज आज खास तौर से उस प्रदर्शनी को देखने गया - इस कारण मैं ट्रेन के सफ़र के अपने उन दोस्तों के बीच खास बन गया था जिनके मन में मैंने कला के प्रति कभी कोई सम्मान या दिलचस्पी नहीं देखी थी |&lt;br /&gt;अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके घर लौट रहे ट्रेन के मेरे उन दोस्तों को पिकासो के बारे में सिर्फ इतना ही पता था कि पिकासो एक बड़ा चित्रकार था, किसी ने कहा कि - है | पिकासो के बारे में इससे ज्यादा उन्हें कुछ नहीं पता था | अपनी जानकारी में उन्होंने पिकासो की कोई पेंटिंग नहीं देखी | कभी किसी अख़बार या पत्रिका में देखी हो तो उन्हें पता नहीं, याद नहीं | पिकासो की पेंटिंग्स देखने को लेकर उन्होंने कोई इच्छा या उत्सुकता भी नहीं प्रकट की | मैंने उन्हें बताया भी कि जिस प्रदर्शनी को मैं देख कर आ रहा हूँ, वह अभी पंद्रह दिन और लगी रहेगी; लेकिन किसी ने भी ऐसी इच्छा भी प्रकट नहीं की कि वह देखने जाने की कोशिश करेगा | इसके बावजूद, मैंने महसूस किया कि जैसे उन्हें इस बात पर गर्व था कि उनके साथ बैठे उनके एक दोस्त ने पिकासो की पेंटिंग्स देखी हैं और जो पिकासो के बारे में जानता है | उनका इस बात पर गर्व करना और मुझे खास तवज्जो देना मुझे हैरान कर रहा था | अपने दोस्तों का यह व्यवहार और उनका रवैया मुझे बराबर पहेली जैसा लग रहा था और मैं वास्तव में चकित था |&lt;br /&gt;मैं चकित था यह देख कर कि स्पेन के एक छोटे से गाँव मालागा में 1881 में जन्में पाब्लो पिकासो में ऐसा आखिर क्या था कि हजारों मील दूर भारत के एक छोटे शहर के, अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके थके-हारे घर लौट रहे लोग उनके नाम के आगे इस हद तक नतमस्तक थे कि मुझे खास समझ रहे थे क्योंकि मैं पिकासो के बारे में उनसे ज्यादा जानता हूँ | यह ठीक है कि हमारे समय के कलाकारों में पिकासो की एक विशिष्ट जगह है - एक ऐसी जगह जिसे उन्हें सख्त नापसंद करने वाला भी नहीं छीन सकता है | यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हमारे समय में कोई दूसरा पिकासो नहीं पैदा हो सकता | पिकासो जैसे जीवन और उसके मिथक और जादुई ताकत को पाना आसान नहीं है - बल्कि असंभव ही है | पिकासो ने हमेशा मनुष्य और उसके जीवन को अपने चित्रों में उकेरने का काम किया है | मातृत्व, नट, मदारी, गरीब, फुटपाथवासी, अंधे भिखारी आदि उनकी कला के विषय रहे | दुःख और वेदना को दृश्य-भाषा के माध्यम से कैसे उकेरा जा सकता है पिकासो से ज्यादा शायद ही कोई जानता होगा | मनुष्य जीवन की छोटी से छोटी सच्चाई को पहचानने; मनुष्य जीवन की गहरी समझ रखने तथा उसके प्रति अतुलनीय जुड़ाव व आस्था रखने और उसे प्रकट करने उस ही पिकासो को पिकासो बनाया है, और उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी | लेकिन इस बात से उन लोगों को भला क्या मतलब जो अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके थके-हारे घर लौटने की जल्दी में हैं और जो कला को एक फालतू का काम मानते और समझते हैं |&lt;br /&gt;मैं वास्तव में हैरान था और मेरे लिये यह एक पहेली सी बन गई थी कि आखिर क्या चीज है जो उन्हें पिकासो के नाम के आगे नतमस्तक किये दे रही है | इस पहेली को हल करने में पिकासो ने ही मेरी मदद की |&amp;nbsp; मैंने कहीं पढ़ा है कि पिकासो ने एक बार कहा था : 'जितना रंग टिकता है उतना ही कागज भी, और&amp;nbsp;अंततः दोनों साथ-साथ आयुग्रस्त होते हैं | और बाद में कोई चित्र तो देख नहीं पायेगा, सब चित्र की अनुश्रुति या दंतकथा ही सुनेंगे - वह अनुश्रुति या दंतकथा जो चित्र ने बनाई होगी | तब फिर, चित्र रहे या न रहे कोई फर्क नहीं पड़ता | आगे चलकर चित्र को&amp;nbsp;'रक्षित' करने की कोशिश&amp;nbsp;की जायेगी;&amp;nbsp;लेकिन&amp;nbsp;चित्र अपनी&amp;nbsp;अनुश्रुति पर ही जीवित&amp;nbsp;रहेगा, किसी&amp;nbsp;और चीज&amp;nbsp;पर नहीं |' पिकासो संभवतः यही&amp;nbsp;कह&amp;nbsp;रहे थे&amp;nbsp;कि&amp;nbsp;अगर&amp;nbsp;किन्हीं&amp;nbsp;कलाकृतियों &lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;में प्राण&amp;nbsp;फूंके&amp;nbsp;गए&amp;nbsp;होंगे&amp;nbsp;तो वे&amp;nbsp;कलाकृतियां&amp;nbsp;समाप्त&amp;nbsp;हो जाने पर भी हमारी&amp;nbsp;स्मृति&amp;nbsp;में मंडराती&amp;nbsp;रहेंगी&amp;nbsp;| अचंभा नहीं कि, पिकासो अपनी ही कृतियों को मान दे कर एक अनुश्रुति ( लीजेंड&amp;nbsp;) बना&amp;nbsp;रहे थे | पिकासो ने एक बार यह भी कहा था : 'जरूरी&amp;nbsp;बात&amp;nbsp;यह है कि हमारे समय के&amp;nbsp;कमजोर&amp;nbsp;मनोबल के बीच&amp;nbsp;उत्साह&amp;nbsp;पैदा&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;जाये&amp;nbsp;| कितने&amp;nbsp;लोगों&amp;nbsp;ने सचमुच&amp;nbsp;होमर&amp;nbsp;को पढ़ा&amp;nbsp;होगा&amp;nbsp;? लेकिन समूची&amp;nbsp;दुनिया&amp;nbsp;होमर की बात करती&amp;nbsp;है | इस तरह से&amp;nbsp;एक होमेरी&amp;nbsp;अनुश्रुति बनती&amp;nbsp;है&amp;nbsp;| इस अर्थ में एक अनुश्रुति मूल्यवान&amp;nbsp;उत्तेजना&amp;nbsp;पैदा करती है | उत्साह ही वह चीज है जिसकी&amp;nbsp;हमें&amp;nbsp;और युवा&amp;nbsp;पीढ़ी को, सबसे&amp;nbsp;अधिक&amp;nbsp;ज़रूरत है |&lt;br /&gt;कितना&amp;nbsp;सही&amp;nbsp;थे पिकासो | कोई उनके&amp;nbsp;चित्रों को कभी&amp;nbsp;देख पाए&amp;nbsp;या नहीं, कोई उन्हें या उनके चित्रों को जानें या नहीं, लेकिन उनके और उनकी&amp;nbsp;कला&amp;nbsp;के प्रति&amp;nbsp;सम्मान&amp;nbsp;और उत्साह व्यक्त&amp;nbsp;करने के मामले&amp;nbsp;में पीछे&amp;nbsp;नहीं रहेगा | अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके थके-हारे घर लौटने की जल्दी में ट्रेन में बैठे अपने दोस्तों को पिकासो के नाम के आगे नतमस्तक देख कर मुझे पिकासो की कही हुई बात का जैसे जीता-जागता सुबूत मिल रहा था |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-2877837309556139887?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/2877837309556139887/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/2877837309556139887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/2877837309556139887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='पिकासो की वर्षों पहले कही गई बात कि &apos;चित्र अपनी अनुश्रुति पर ही जीवित रहेगा, किसी और चीज पर नहीं&apos; को मैंने अपने सामने सच होते हुए पाया'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SwqZE2YbNMI/AAAAAAAAAI4/OTUcczIbp7A/s72-c/Pablo_picasso_1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-5265499434619539313</id><published>2009-11-11T05:25:00.000-08:00</published><updated>2009-11-11T08:24:13.755-08:00</updated><title type='text'>अक्षय आमेरिया का रचना-संसार एक नैतिक अन्वेषण है</title><content type='html'>अक्षय आमेरिया की कुछेक कलाकृतियों को महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'बहुवचन' के पृष्टों पर छपा देखा तो मुझे वर्षों पहले नई दिल्ली की त्रिवेणी कला दीर्घा में आयोजित हुई उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी की याद हो आई | अब जब मैंने खोज खबर ली तो पाया कि यह वर्ष 2000 की बात थी | अक्षय के चित्रों में प्रकट होने वाले काव्यात्मक बोध के कारण उनके चित्रों की जो छाप मेरे मन पर पड़ी थी, मैंने पाया कि वह जस की तस बनी हुई है | मुझे भी इसका पता हालाँकि तब चला जब मैं 'बहुवचन' के पृष्टों को पीछे की तरफ से पलट रहा था और उसमें छपे चित्रों को देखते ही मैंने जैसे अपने आप से कहा कि यह तो अक्षय आमेरिया के चित्र हैं, और फिर मैंने अपने आप से कही गई बात को सच पाया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्षय आमेरिया के काम को तो मैंने देखा ही है, उन्हें काम करते हुए देखने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ है | आइफैक्स द्वारा आयोजित एक कैम्प में भाग लेने अक्षय दिल्ली आये थे, तब कुछ समय उनके साथ बिताने का अवसर मुझे मिला था | अक्षय बात भी करते जा रहे थे और कागज पर रचने का काम भी करते जा रहे थे | बात को और काम को एकसाथ साधने की उनकी क्षमता ने उस समय भी मुझे चकित किया था, और आज भी उस दृश्य को याद करता हूँ तो चकित होता हूँ | 'बहुवचन' में अक्षय की कलाकृतियों के जो चित्र छपे हैं वह पिछले दिनों मुंबई की जहाँगीर आर्ट गैलरी में 'इनरस्केप्स' शीर्षक से प्रदर्शित हुए हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अक्षय आमेरिया ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपने चित्रों के सामने पहली बार खड़े हो रहे दर्शकों को विस्मित और अपने चित्रों से पहले से परिचित दर्शकों को लगातार आश्वस्त बनाए रखा है, अपने 'विषयों' को लेकर भी और तकनीक को लेकर भी | अपने कौशल के साथ अक्षय हमें एक ऐसे स्पेस में ले जाते हैं, जहाँ प्रत्येक रेखा और बिंदु आविष्ट है, अपनी स्वयं की ज़िन्दगी प्राप्त कर रहा है - लगातार परिवर्तित होता हुआ | वैयक्तिक रूप से प्रत्येक चित्र एक स्वायत्त और स्वतंत्र कलाकृति के रूप में डटा रहता&amp;nbsp; है | यूं ही देखें तो अक्षय की कृतियाँ रूप और बुनावट में समृद्व दिखती हैं, और अगर ध्यान से निरीक्षण करें, तो वह एक ऐसी दुनिया निर्मित करती दिखती हैं जो दृश्य संदर्भों के विविध तत्त्वों को समाहित किए हुए हैं; तथापि कृति की सहजता और गतिकता के कारण, इस समूची प्रक्रिया में कुछ भी नाटकीय ढंग से आयोजित नहीं प्रतीत होता | अक्षय के चित्रों में एक भव्य संरचना और एक प्रतिध्वनित लय प्राप्त होती है जो एक निश्चित और दृढ़ तत्त्व लिए हुए होती है और वह अंतर्विरोध तथा आनंदप्रद तनाव का भाव पैदा करती है | इस अर्थ में अक्षय आमेरिया का रचना-संसार एक नैतिक अन्वेषण है - किन्हीं स्थूल अर्थों में नहीं बल्कि आध्यात्मिक और संवेदनात्मक अर्थों में - क्योंकि अन्ततः 'इनरस्केप' का बोध ही समस्त प्रकार की नैतिकता का बुनियादी स्त्रोत है | अखंडित, निर्वैयक्तिक और पारदर्शी चेतना के लिए कलाकार के संघर्ष को अक्षय के चित्रों में देखा / पहचाना जा सकता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्षय आमेरिया के कुछेक चित्रों को आप भी यहाँ देख सकते हैं |&amp;nbsp; &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5ZVmCX0I/AAAAAAAAAHw/-l3Osmxk_Wg/s1600-h/AB-NA+0809.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5ZVmCX0I/AAAAAAAAAHw/-l3Osmxk_Wg/s320/AB-NA+0809.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5a9maAwI/AAAAAAAAAH4/NAr3srGKR7A/s1600-h/INNERSCAPES+16+.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5a9maAwI/AAAAAAAAAH4/NAr3srGKR7A/s320/INNERSCAPES+16+.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SvrkeFU1aOI/AAAAAAAAAIQ/og4BTu-PcEc/s1600-h/innerscape17.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SvrkfB-FT5I/AAAAAAAAAIY/pFoSy3gPgzQ/s1600-h/innrscap15.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SvrkfB-FT5I/AAAAAAAAAIY/pFoSy3gPgzQ/s320/innrscap15.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5hXKiAkI/AAAAAAAAAIA/1y78xRAP8Os/s1600-h/INNERSCAPES+18+.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SvrkeFU1aOI/AAAAAAAAAIQ/og4BTu-PcEc/s1600/innerscape17.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SvrkeFU1aOI/AAAAAAAAAIQ/og4BTu-PcEc/s1600/innerscape17.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SvrkeFU1aOI/AAAAAAAAAIQ/og4BTu-PcEc/s320/innerscape17.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5hXKiAkI/AAAAAAAAAIA/1y78xRAP8Os/s1600/INNERSCAPES+18+.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Svq5hXKiAkI/AAAAAAAAAIA/1y78xRAP8Os/s320/INNERSCAPES+18+.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-5265499434619539313?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/5265499434619539313/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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आधुनिकता' पर व्यक्त किये गए उनके विचार मुझे सहज ही याद आये, जिनमें उन्होंने कहा था कि आधुनिक कलाकार हमेशा और आगे जाने की कोशिश करता रहता है | वह तभी तक आधुनिक रह पाता है जब तक हर नए काम में नया जन्म ले | शास्त्रीयता में बंधा कलाकार विचारधाराओं और सांस्कृतिक इतिहास की मान्यताओं के स्वीकार में रहता हैं | उसे अपने माध्यम और उसे बरतने की प्रक्रिया की परंपरा के भीतर रहकर ही लयात्मक का स्वरूप खोजना पड़ता है | नंद कत्याल का कहना था कि रचनात्मक कलाकार पुरानी कृतियों को याद करता है और अपनी यादों को जाँचता परखता है | स्थापित विचारधाराओं, उनके प्रस्तुतीकरण और शैलियों की मान्यता पर वह सवालिया निशान लगाता है | सांस्कृतिक इतिहास के दबाव में पैदा हुई ग्रंथियों और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने की पुरजोर कोशिश करना उसकी प्रकृति है |&lt;br /&gt;नंद कत्याल का कहना था कि जो कुछ अव्यक्त है और अभिव्यक्ति से परे है, उसे लगातार प्रेरित करता रहता है ताकि नए की रचना हो सके | यह नया ही प्रेम और स्नेह का विकास है; हालाँकि कलाकार को अपने प्रेम की रूपंकरता और स्वरूप के बारे में खुद पूरी जानकारी नहीं होती - और वह अपने कैनवस पर इसी की खोज में डूबा रह जाता है | यही वह मुकाम है जहाँ कुछ घटने लगता है, घटनाचक्र का अपना तर्क रूप लेने लगता है | किसी मान्यता प्राप्त विचारधारा की बंदिशों से आजाद होकर ही ऐसा होता है और अनुभूत तब साकार होने लगता है | कभी - कभी कुछ घट जाता है जहाँ अपार संतोष एवं आनंद आकार ले लेता है |&lt;br /&gt;नंद कत्याल का मानना और कहना था कि अनुभूतियों के साकार होने की कोई सीमायें नहीं होतीं | परिचित, अपरिचित या काल्पनिक के दिगम्बरी अनुभव पर कलाकार का कोई बस नहीं है और सब कुछ उसी के जरिये कैनवस पर घटित होता जाता है - शायद यही आधुनिक है | उत्तर आधुनिकता हमेशा आधुनिकता में ही मौजूद रहती है | रचनात्मकता की जद्दोजहद में डूबा हुआ कलाकार अपने निजी स्वभाव को खोजता रहता है और निजत्व की पहचान करते ही मूक हो जाता है | अव्यक्त किसी कदर व्यक्त हो जाता है | नंद कत्याल का निष्कर्ष था कि इस कशमकश में आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के सन्दर्भ बिल्कुल ही बेमानी हैं | &lt;br /&gt;नंद कत्याल के इन विचारों को याद करते हुए आर्ट हैरिटेज कला दीर्घा में प्रदर्शित उनके नए चित्रों को देखना मेरे लिए एक खासा दिलचस्प अनुभव रहा |&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-4625777831147351439?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/4625777831147351439/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_30.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4625777831147351439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4625777831147351439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_30.html' title='नंद कत्याल ने अपने नए चित्रों में जैसे अपनी स्मृतियों को जाँचा परखा है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SusVhuOimNI/AAAAAAAAAHo/YifRUWzcrfg/s72-c/Nand+Katyal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8735841968173120859</id><published>2009-10-24T23:36:00.000-07:00</published><updated>2009-10-25T01:38:54.570-07:00</updated><title type='text'>सैफ़रन आर्ट की वेबसाईट में शामिल होने वाले सबसे कम उम्र के चित्रकार अर्पित बिलोरिया के चित्रों की सहजता में गहरे भाव - बोध का आभास होता है</title><content type='html'>अहमदाबाद के अर्पित बिलोरिया के काम को व्यापक जाँच परख से गुजरने के बाद अंततः सैफ़रन आर्ट की सूची में शामिल होने की स्वीकृति मिल गई है | सैफ़रन आर्ट की वेबसाईट पर आने के कारण अर्पित बिलोरिया का काम अब अंतर्राष्ट्रीय कला प्रेक्षकों तथा कला प्रेमियों के लिए भी देख पाना संभव हो सकेगा | भारतीय कला में दिलचस्पी रखने वाले अंतर्राष्ट्रीय कला प्रेक्षकों व कला प्रेमियों के बीच सैफ़रन आर्ट की अच्छी पहचान व प्रतिष्ठा है | सैफ़रन आर्ट ने पिछले करीब एक दशक की अपनी सक्रियता में भारतीय कलाकारों के काम को अंतर्राष्ट्रीय कला जगत में परिचित कराने, उन्हें प्रतिष्ठा दिलाने तथा उन्हें बिकवाने का उल्लेखनीय योगदान दिया है | दरअसल, इसी योगदान के कारण सैफ़रन आर्ट को भारतीय पहचान की एक ग्लोबल आर्ट कंपनी के रूप में देखा/पहचाना जाता है | यही वजह है कि सैफ़रन आर्ट की कलाकारों की सूची में शामिल होने का हर भारतीय कलाकार सपना देखता / रखता है | इसी सपने को देखते/रखते हुए अर्पित बिलोरिया ने करीब एक वर्ष पहले सैफ़रन आर्ट की कलाकारों की सूची में शामिल होने के लिए आवेदन किया था | सैफ़रन आर्ट की फैसला करने वाली टीम के लोगों ने पिछले एक वर्ष में तीन-चार बार अर्पित से बात की और न सिर्फ उनके नए पुराने काम को सिलसिलेवार तरीके से देखा - परखा, बल्कि उनसे बात करके कला को लेकर तथा काम करने के उनके तरीके को लेकर उनके विचारों को भी जाना - समझा; और व्यापक जाँच - परख के बाद एक&amp;nbsp; कलाकार के रूप में उन्हें कलाकारों की अपनी सूची में शामिल करने के योग्य पाया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैफ़रन आर्ट ने हाल - फ़िलहाल के वर्षों में जिन कलाकारों को चुना है, उनमें अर्पित बिलोरिया अहमदाबाद के अकेले कलाकार हैं | इस आधार पर कहा जा सकता है कि अर्पित बिलोरिया के जरिये अहमदाबाद ने बहुत समय बाद सैफ़रन आर्ट में जगह प्राप्त की है | सैफ़रन आर्ट में कलाकारों की सूची को देखने पर हम यह भी पाते हैं कि वहाँ अर्पित बिलोरिया सबसे कम उम्र के चित्रकार हैं | यह तथ्य युवा चित्रकारों में अर्पित बिलोरिया की एक अलग पहचान का सुबूत भी देता है और उसे रेखांकित भी करता है | 1980 में जन्में अर्पित ने अहमदाबाद के सी एन कॉलिज ऑफ फाइन आर्ट्स से कला की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है | अर्पित एक अत्यंत सक्रिय और प्रयोगशील कलाकार हैं | उनकी सक्रियता और प्रयोगशीलता का ही सुबूत है कि पिछले तीन - चार वर्षों में उन्होंने अहमदाबाद और बड़ौदा के साथ - साथ दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, पटना, जयपुर, वाराणसी, उदयपुर, भोपाल, कालीकट जैसे देश के प्रमुख कला केन्द्रों में अपने काम को प्रदर्शित तो किया ही है; अपनी सक्रियता को विविधता भी दी है | अर्पित ने अपनी कला यात्रा स्कल्पटर के रूप में शुरू की थी, लेकिन फिर जल्दी ही वह पेंटर हो गए | उन्होंने इंस्टालेशन भी किया | इसी वर्ष मई - जून में थाने कला भवन में उन्होंने शाम पहपालकर व देविबा वाला के साथ मिलकर थर्मोकोल, नायलोन स्ट्रिंग्स तथा प्रोजेक्टर्स जैसी चीजों से जो एक इंस्टालेशन तैयार किया था, उसकी कला जगत में खासी धूम रही थी | देविबा वाला के साथ उन्होंने अहमदाबाद में वर्वे नाम के एक कला - ग्रुप की स्थापना की है|&lt;br /&gt;अर्पित ने अपने चित्रों में काले रंग का प्रयोग तमस तत्त्व के रूप में किया है | अपने केनवस उन्होंने बिल्कुल सफ़ेद और खाली छोड़े हैं, लगता है कि जैसे उन्होंने भावनाओं व विचारों की आवाजाही के लिए जगह बनाई है और काले रंग के विभिन्न शेड्स के बहुत थोड़े से / सीमित से उपयोग से उन भावनाओं व विचारों को प्रेरित करने का जैसे 'मौका' दिया है | काले रंग के प्रयोग को इसीलिए हमनें तमस तत्त्व के रूप में देखा / पहचाना है| यही तत्त्व उनके चित्रों को एक दार्शनिक भावभूमि देता है | अर्पित के चित्रों में व्यक्त होने वाली दार्शनिकता विचार - बहुल न होकर अनुभूति - जन्य तथा संवेदनात्मक है; और उनके चित्रों की अनुभूति व संवेदना इतनी गहरी है कि उसे सहजता से समझ पाना कठिन भी होता है | उनके चित्रों में व्यक्त होने वाली अनुभूति व संवेदना 'जो है' और 'जो नहीं है' के बीच आवाजाही - सी करती दिखती है | उनके चित्रों में हालाँकि सहजता दिखाई पड़ती है लेकिन उस सहजता में गहरे भाव - बोध का&amp;nbsp;आभास होता है | सहज और सामान्य से 'दिखने' वाले अर्पित के चित्रों में सूक्ष्मतम संवेदनाओं की वृहद अभिव्यंजना दिखाई पड़ती है |&lt;br /&gt;अर्पित बिलोरिया के कुछेक चित्रों को आप यहाँ भी देख सकते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPy9QmpIXI/AAAAAAAAAHA/_BGL-7bcsGs/s1600-h/eye+to+eye.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPy9QmpIXI/AAAAAAAAAHA/_BGL-7bcsGs/s320/eye+to+eye.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPzXwWuBTI/AAAAAAAAAHQ/DKa_bP60ykM/s1600-h/untitled.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPzXwWuBTI/AAAAAAAAAHQ/DKa_bP60ykM/s320/untitled.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPzLlUzkGI/AAAAAAAAAHI/te2YRxsQFtc/s1600-h/abyss.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPzLlUzkGI/AAAAAAAAAHI/te2YRxsQFtc/s320/abyss.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPzaZKyinI/AAAAAAAAAHY/f53yx9D4eeg/s1600-h/untitled%2815%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPzaZKyinI/AAAAAAAAAHY/f53yx9D4eeg/s320/untitled%2815%29.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPyxyQarAI/AAAAAAAAAG4/40Iya8KUQaE/s1600-h/sunrise.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPyxyQarAI/AAAAAAAAAG4/40Iya8KUQaE/s320/sunrise.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8735841968173120859?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8735841968173120859/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_24.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8735841968173120859'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8735841968173120859'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_24.html' title='सैफ़रन आर्ट की वेबसाईट में शामिल होने वाले सबसे कम उम्र के चित्रकार अर्पित बिलोरिया के चित्रों की सहजता में गहरे भाव - बोध का आभास होता है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SuPy9QmpIXI/AAAAAAAAAHA/_BGL-7bcsGs/s72-c/eye+to+eye.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-4559816140996589105</id><published>2009-10-19T08:46:00.000-07:00</published><updated>2009-10-19T08:46:57.234-07:00</updated><title type='text'>प्रेमेन्द्र सिंह गौड़ ने अपने चित्रों में वस्तुओं को अपने अंतर्मन की किन्हीं सजीव भाव-सत्ताओं की छायाओं की तरह पकड़ा है</title><content type='html'>इंदौर के प्रेमेन्द्र सिंह गौड़ के अभी हाल में नई दिल्ली की त्रिवेणी कला दीर्घा में प्रदर्शित चित्रों को देखकर जो पहला अनुभव होता है वह यह कि आकृतिमूलक चित्रकार न होते हुए भी प्रेमेन्द्र अमूर्तन के चित्रकार नहीं हैं | यह अनुभव प्रेमेन्द्र की चित्र-रचना की मूल बनावट और उसके स्वभाव को समझने में एक महत्त्वपूर्ण शुरुआत भी साबित हो सकती है | प्रेमेन्द्र अभी अमूर्तन की उस सीढ़ी पर हैं जहाँ वह उन्हें एक नए अनुभव-संसार में प्रवेश करने और उस अनुभव-संसार को रचना-संसार में रूपांतरित करने को प्रेरित करती है | ऐसा लगता है कि जैसे प्रेमेन्द्र कुछ 'ठोस' कहना चाहते हैं | हालाँकि उनके चित्र 'उस कुछ' के कहने की बनिस्बत 'उस कुछ' की खोज के दस्तावेज ज्यादा मालूम पड़ते हैं | उनके चित्रों के पीछे कार्यरत एक बेहद उग्र बेचैनी का आभास मिलता है; उनके गहरे रंग अपने भीतर कोई हुई शांत आग छिपाये लगते हैं; उनकी रेखाकृतियाँ बार-बार जैसे एक ही विलम्बित लय के तीव्र खंडों को लपेटकर रखती हुई प्रतीत होती हैं | लेकिन इस आग और उग्र बेचैनी के बावजूद कहीं कोई एक सीमा-रेखा है जो प्रेमेन्द्र को उनकी अनुभूति में निहित अराजकता के संसार से बचाये रखती है | उनके चित्रों की सफाई; रंग-स्पर्श से झलकने वाली कोमलता, आत्मीयता और अंतरंगता; आकृतियों का सहज लयात्मक संतुलन उनकी कला के गंभीर आत्म-संयम का ही संकेत देते हैं |&lt;br /&gt;मध्य प्रदेश के शाजापुर में 1978 में जन्में प्रेमेन्द्र ने इंदौर के इंस्टिट्यूट ऑफ फाइन आर्ट से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया है | पिछले एक दशक से वह इंदौर, उज्जैन, जबलपुर के साथ-साथ दिल्ली व मुंबई में समूह प्रदर्शनियों में भाग लेते रहे हैं | दिल्ली व मुंबई में उन्होंने अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनियां भी की हैं | दिल्ली व मुंबई में प्रदर्शित हुए उनके चित्रों को दूसरे देशों के कला प्रशंसकों व प्रेक्षकों ने भी देखा तथा सराहा | इसी सराहना के चलते प्रेमेन्द्र के चित्र जापान, अमेरिका व जर्मनी के निजी संग्रहालयों तक पहुचें हैं | त्रिवेणी कला दीर्घा में हाल ही में हुई उनके चित्रों की प्रदर्शनी, नई दिल्ली में उनकी दूसरी तथा कुल मिलकर तीसरी एकल प्रदर्शनी थी |&lt;br /&gt;प्रेमेन्द्र अपने चित्रों में 'बाहर' की ओर नहीं, बल्कि 'भीतर' की ओर देखते हैं | उनके चित्रों में दीख पड़ने वाले रंग-रूपाकारों का सरोकार किसी बाह्य दृश्य-सत्ता से उतना नहीं जितना उनके अंतर्मन में जन्म ले रहे रूपाकारों से प्रेरित जान पड़ता है | अपने चित्रों में उन्होंने वस्तुओं को वस्तुओं की तरह नहीं पकड़ा है, बल्कि अपने अंतर्मन की किन्हीं सजीव भाव-सत्ताओं की छायाओं की तरह पकड़ा है | इस प्रयास में प्रेमेन्द्र किसी मानवीय या सामाजिक सच्चाई को यथार्थ की शक्ल नहीं देते, बल्कि उस मानवीय या सामाजिक सच्चाई को अन्वेषित करने में अपनी उत्कट लालसा का गति-चित्र पेश करते हैं | इसी से उनके चित्रों में एक प्रकार का गत्वर प्रवाह मिलता है | उनके रंग स्थिर कैनवस पर चिपके हुए नहीं लगते, बल्कि इधर-उधर बेचैन या खुश-खुश डोलते से नज़र आते हैं; उनकी रंग-रेखाओं व रंग-रूपाकारों का कैनवस के 'स्पेस' पर विभाजन एक संतुलन की सृष्टि भर नहीं करता, बल्कि एक संतुलित फ्रेम में किसी गतिशील अनुभव केंद्र की ओर खिसकता- बढ़ता लगता है |&lt;br /&gt;प्रेमेन्द्र ने अपने चित्रों की प्रदर्शिनी को 'प्रकृति की छाया' शीर्षक दिया है | इससे भी समझा जा सकता है कि प्रेमेन्द्र के कलाकार का मूल और उनकी विशिष्टता यही है कि वे पहले तो जीवन व समाज के भौतिक और स्थूल पक्ष को चुनते हैं, और फिर उसे अमूर्त रूपाकारों में पाना चाहते हैं | प्रेमेन्द्र की रचनात्मक ऊर्जा उनके कला-व्यक्तित्व के इस संघर्ष से ही उत्पन्न होती है | उनके चित्रों में पाई जाने वाली गतिशीलता का यही राज है जो अक्सर उनके चित्रों को एक पारदर्शिता प्रदान करती है : कैनवस पर रंग की सतहें गहरी हो उठती हैं और गहराई सतह पर चमकने लगती है | उनमें स्थिरता और प्रवाह एक साथ है | इस मूल द्वंद्व की चेतना जहाँ उनके चित्रों में तेजी से उभरती है वहाँ वे अत्यंत सजीव लगते हैं; जहाँ ऐसा नहीं होता वहाँ द्वंद्व से थकित चेतना का अवसाद एक भावुकता में बदल जाता है और प्रेमेन्द्र अनायास 'लिरिकल' हो उठते हैं | प्रेमेन्द्र का यह द्वंद्व अभी उतार पर नहीं है, और शायद इसी कारण उनके साथ इस बात का खतरा फ़िलहाल नहीं दिखता है कि वे अपने आपको दुहराने लगेंगे | &lt;br /&gt;प्रेमेन्द्र के कुछेक चित्र आप यहाँ भी देख सकते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJFSgrXqI/AAAAAAAAAGA/WkJwavotOFQ/s1600-h/4369-2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJFSgrXqI/AAAAAAAAAGA/WkJwavotOFQ/s320/4369-2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJQPSPEAI/AAAAAAAAAGI/HNYFJwglePo/s1600-h/IMG_4364+copy-p.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJQPSPEAI/AAAAAAAAAGI/HNYFJwglePo/s320/IMG_4364+copy-p.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJRCWP5pI/AAAAAAAAAGQ/77ugwKmDj6o/s1600-h/IMG_4365+copy1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJRCWP5pI/AAAAAAAAAGQ/77ugwKmDj6o/s320/IMG_4365+copy1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJSRwO-8I/AAAAAAAAAGY/xo_y8nPDVlM/s1600-h/IMG_4370+copy5.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJSRwO-8I/AAAAAAAAAGY/xo_y8nPDVlM/s320/IMG_4370+copy5.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJXfVOK-I/AAAAAAAAAGg/CSGOPpiLkEk/s1600-h/IMG_4373+copy-p.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJXfVOK-I/AAAAAAAAAGg/CSGOPpiLkEk/s320/IMG_4373+copy-p.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-4559816140996589105?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/4559816140996589105/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_19.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4559816140996589105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4559816140996589105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post_19.html' title='प्रेमेन्द्र सिंह गौड़ ने अपने चित्रों में वस्तुओं को अपने अंतर्मन की किन्हीं सजीव भाव-सत्ताओं की छायाओं की तरह पकड़ा है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StyJFSgrXqI/AAAAAAAAAGA/WkJwavotOFQ/s72-c/4369-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-6935640969035932656</id><published>2009-10-14T07:26:00.000-07:00</published><updated>2009-10-14T08:01:15.072-07:00</updated><title type='text'>जल सोचता है, अनुभव करता है और अभिव्यक्त भी करता है</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: left;"&gt;गोवा-मुंबई की हाल की यात्रा में समुद्रों में जल का जो इंद्रधनुषी रूप देखने को मिला, उससे एकबार फिर यह समझ में आया कि जल को क्यों ऋषियों ने 'आपो ज्योति रसोsमृतम्' यानि ज्योति, रस और अमृत कहा था; और जल क्यों स्वभाव की निर्मलता और पारदर्शिता के उपमान के साथ-साथ स्वच्छंदता और विद्रोह के प्रतीक के रूप में भी देखा/पहचाना गया है; और क्यों जल के पवित्र रूप - उसमें निहित आध्यात्मिकता, प्रेम, सौन्दर्य, क्रीड़ा और सहजता को दुनिया की विभिन्न कलाओं में सृजनात्मक अभिव्यक्ति मिली है | जापान के शोधकर्ता डॉक्टर मसारू ईमोटो की खोज के बारे में पिछले दिनों जब पढ़ा था कि जल में प्राण, मन व मस्तिष्क है; वह सोचता है, संवेगित होता है और अभिव्यक्त भी करता है तो सहसा विश्वास नहीं हुआ था | गोवा-मुंबई में लेकिन डॉक्टर मसारू ईमोटो की बात समझ में भी आई और सच भी लगी | समुद्र इससे पहले हालांकि कन्याकुमारी और चेन्नई में भी देखे हैं, और 'जल ही जीवन है' से पहले भी सहमत रहा हूँ - लेकिन गोवा-मुंबई में जल और जीवन के रिश्ते की व्यापकता को पहली बार समझा&amp;nbsp;&amp;nbsp; है |&amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;वैदिक वांग्मय में, उपनिषदों में और भारतीय दर्शन की शाखाओं में जल को सृष्टि के एक महत्वपूर्ण पदार्थ के रूप में सर्वत्र वर्णित और परिभाषित किया गया है | वैदिक वांग्मय में सृष्टि विज्ञान&amp;nbsp; का विवेचन करते हुए जल को सृष्टि के उदगम अर्थात विसृष्टि की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण उपादान के रूप में बताया गया है जबकि सृष्टि के बाद पंचभूतों में से एक भूत के रूप में उसका जो स्थान है उसका विवेचन सांख्य, न्याय, वैशेषिक आदि सभी दर्शनों में विस्तार से हुआ है | जहाँ गोपथ ब्राह्मण ने उसका सृष्टि के उपादान के रूप में वर्णन करते हुए उसे भृगु और अंगिरा&amp;nbsp;के संघात के रूप में आदिम&amp;nbsp;तत्त्व की तरह विवेचित&amp;nbsp;किया है, वहीं&amp;nbsp;दर्शनों ने उसे केवल&amp;nbsp;द्रव्य&amp;nbsp;या पदार्थ&amp;nbsp;माना है |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;सांख्य आदि दर्शनों ने सृष्टि के उदगम की जो प्रक्रिया बताई है, उसके अनुसार अव्याकृत कारण ब्रह्म से प्रकृति उदभूत हुई फिर महत्त्व, फिर अहंकार, फिर पंचतन्मात्रा और फिर पंचभूत व इन्द्रिय | पंचभूतों में जो जल है वह द्रव्य है | जबकि आदिसृष्टि के रूप में जिस जल का उल्लेख किया गया है वह सूक्ष्म तत्त्व है जिसमें सुनहरा अंडा या कॉस्मिक ऐग पैदा होता है | उस अंडे को हिरण्यगर्भ भी कहा गया है | चूंकि सारी सृष्टि उस अंडे से पैदा हुई है अतः उसी में पंचभूतों की उत्पत्ति भी आ जाती है | इससे पूर्व जो प्रथम अप् तत्त्व था, जिसमें ब्रह्मा ने बीज बोया वह सूक्ष्म तत्त्व के रूप में पहली सृष्टि कहा ही जा सकता है | यही रहस्य है जल को अवेग सृष्टि कहने का तथा समस्त जगत के जलमय होने का |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;तैत्तरीय उपनिषद में ऋषि ने जब जल को ही अन्न कहा, तो निश्चित रूप से उसके मन में केवल तत्त्व-चिंतन ही था | जल को एक व्यापक भूमिका देकर वह कहता है - आपो वा अन्नम्&amp;nbsp; |&amp;nbsp; ज्योतिरन्नादम्&amp;nbsp; |&amp;nbsp; अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्&amp;nbsp; |&amp;nbsp; ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिता |&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ( यानि&amp;nbsp;जल ही अन्न है, ज्योति आनंद है | जल में ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योति में&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जल | ) गीता में यज्ञ से पर्जन्य और पर्जन्य से अन्न का उल्लेख है | इस प्रकार जल ही वह तत्त्व है जो धुलोक से पाताल तक व्याप्त है और अन्य तत्त्वों के शोषक रूप को प्रशमित करता है |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;स्पष्ट है कि जल सिर्फ पानी नहीं है | वह रस है | सृष्टि में जो भी सौन्दर्य है, कान्ति है, दीप्ति है - वह इसी रसमयता के कारण है | स्थूल जल से शरीर का पोषण होता है और रस से आत्मा का | मनुष्य की कान्ति, पुष्प के पराग, वृक्ष की छाल में रस ही विधमान है | इस रस का सूखना मृत्यु की ओर बढ़ना है | इसीलिए शास्त्रों में रसमयता पर बल दिया गया है | जो रसमय होगा, वही जलमय होगा | भारतीय मनीषियों ने इसीलिए कहा है कि किसी को जल से वंचित नहीं करना चाहिए -&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; तृषितोमोहमायाती मोहात्प्राणं विमुच्यती |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अतः सर्वास्ववस्थासु न व्कचिद्वारिवारयेत् ||&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;जल अर्थात रस से वंचित करना अधर्म है | मानव का कर्तव्य केवल जल के स्थूल रूप से वंचित न करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है | सूक्ष्म रूप में किसी को रस से वंचित न करना ही अंतिम लक्ष्य है | जब रहीम 'बिन पानी सब सून' कहते हैं तो उनका आशय किसी के तिरस्कार व अपमान के निषेध से भी है | पानी न देना और किसी का पानी उतर लेना - दोनों ही मानवता के विरूद्व है क्योंकि सब की सत्ता जल में है | ब्रह्म रस रूप जल में, तेजमय सूर्य मरीचि में, पृथ्वी पातालव्यापी आप् पर प्रतिष्ठित है | सारे प्राणी भूव्यापी मर में प्रतिष्ठित हैं | इसीलिए कहा गया है -&amp;nbsp; सर्वमापोमयं जगत् |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;शायद यही कारण हो कि जल के अनंत रूपों ने मानव मन को अजाने काल से ही मोहित किया हुआ है | कलाकार तो जल के विविधतापूर्ण रूपों के साथ कुछ ज्यादा ही संलिप्त रहे हैं | अजंता की गुफाओं के भित्ति-चित्रों के चितेरे हों या जैन, मुग़ल, राजपूत और पहाड़ी शैली के चित्रकार हों और या समकालीन कला के प्रयोगधर्मी कलाकार हों - सभी ने जल के अलग-अलग रूपों को अपनी-अपनी तूलिकाओं से सृजित किया है, क्योंकि वही तो सृष्टि का एकमात्र 'आदि-तत्त्व' है | गोवा में समुद्र के किनारे घूमते और उन किनारों पर बसी 'दुनिया' को देखते/समझते हुए इस सच्चाई से एकबार फिर सामना हुआ | गोवा-मुंबई में विश्वास हुआ कि जल जैसे सोचता भी है, अनुभव भी करता है और अभिव्यक्त भी करता है | जल के सोचने, अनुभव व अभिव्यक्त करने की कुछ बानगियां मैंने अपने कैमरे में भी कैद की हैं, जिनमें से कुछ यहां आप भी देख सकते हैं |&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXiRNXYUHI/AAAAAAAAAFI/ikOoAA40bfM/s1600-h/IMG_2692.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXiRNXYUHI/AAAAAAAAAFI/ikOoAA40bfM/s320/IMG_2692.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXigHX_PrI/AAAAAAAAAFQ/9WANs6wErdY/s1600-h/IMG_2698.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXigHX_PrI/AAAAAAAAAFQ/9WANs6wErdY/s320/IMG_2698.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXkCGPho8I/AAAAAAAAAFw/xifWSSeeO7U/s1600-h/IMG_2695.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXkCGPho8I/AAAAAAAAAFw/xifWSSeeO7U/s320/IMG_2695.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXj2K8wAxI/AAAAAAAAAFo/Ko5Q2SoecUw/s1600-h/IMG_2638.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXj2K8wAxI/AAAAAAAAAFo/Ko5Q2SoecUw/s320/IMG_2638.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXkNOOGgLI/AAAAAAAAAF4/4PegSzVcUV0/s1600-h/IMG_2703.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXkNOOGgLI/AAAAAAAAAF4/4PegSzVcUV0/s320/IMG_2703.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXjipOWqvI/AAAAAAAAAFY/T90MEFvs9Ks/s1600-h/IMG_2606.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXjipOWqvI/AAAAAAAAAFY/T90MEFvs9Ks/s320/IMG_2606.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXjr-Fw1tI/AAAAAAAAAFg/A4cPAt9LPmA/s1600-h/IMG_2631.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXjr-Fw1tI/AAAAAAAAAFg/A4cPAt9LPmA/s320/IMG_2631.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-6935640969035932656?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/6935640969035932656/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6935640969035932656'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/6935640969035932656'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='जल सोचता है, अनुभव करता है और अभिव्यक्त भी करता है'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/StXiRNXYUHI/AAAAAAAAAFI/ikOoAA40bfM/s72-c/IMG_2692.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-4107758489757997403</id><published>2009-09-25T07:26:00.000-07:00</published><updated>2009-10-14T07:20:24.341-07:00</updated><title type='text'>सुनियता की कला की आध्यात्मिकता</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SrzS0KsHJ-I/AAAAAAAAAFA/M1rGw_zVOhI/s1600-h/BIMB-PRATIBIMB+-+PRALABDH.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="198" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SrzS0KsHJ-I/AAAAAAAAAFA/M1rGw_zVOhI/s200/BIMB-PRATIBIMB+-+PRALABDH.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;नई दिल्ली की आईफैक्स कलादीर्घा में हाल ही में प्रदर्शित सुनियता खन्ना की पेंटिंग्स ने कला और आध्यात्म के संबंध को खासे सृजनात्मक रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया है, बल्कि एक नई मिथक-चेतना से हमें परिचित भी कराया है | आध्यात्मिक मिथकों का मौलिक व नए-नए विन्यास से युक्त जो रचना-कर्म सुनियता की पेंटिंग्स में दिखता है, उसमें काल-बोध के साथ वस्तु-बोध की विशिष्टता या अनोखापन सहज रूप में आकर्षित भी करता है और प्रभावित भी | 'बिम्ब - प्रतिबिम्ब' शीर्षक के तहत प्रदर्शित पेंटिंग्स न केवल अपनी अंतर्वस्तु में महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि फॉर्म में भी उल्लेखनीय हैं | सुनियता ने अपनी चित्रकृतियों में जीवन के द्वैत को बखूबी दर्शाया है | जीवन के द्वंद्वात्मक स्वरूप को चित्रित करती सुनियता की बनाई पेंटिंग्स उनकी सृजनात्मक क्षमता की साक्षी भी हैं | प्रदर्शित पेंटिंग्स में रूपकालंकारिक छवियों को बहुत सूक्ष्मता के साथ विषयानुरूप चित्रित किया गया है | उनकी पेंटिंग्स का चरित्र रूपकालंकारिक भी है और 'रेटारिकल' भी | सुनियता की पेंटिंग्स के प्रायः समूचे आकार अत्यंत कलात्मक भव्यता से चित्रित हुए हैं और एक स्वप्नलोक व एक रहस्यमयता का परिदृश्य-सा बनाते हैं, पर जो वास्तव में मन की एकाग्रता व गहराई से उपजते हैं और एक दर्शक के रूप में हम पर भी वह कुछ उसी तरह का प्रभाव छोड़ते हैं | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे समय में जबकि बाज़ार ने कला को लगभग कब्ज़ा लिया है, सुनियता की पेंटिंग्स की यह प्रदर्शनी सूक्ष्म सौन्दर्य और आत्मिक विचारों के नजरिये से उम्मीद की एक रोशनी की तरह लगी है | जीवन की भौतिक अवधारणा और जीवन की आध्यात्मिक अवधारणा के बीच मुख्य अंतर एक ही होता है : वह है विश्व-दृष्टि का अंतर | इस विश्व-दृष्टि ने कला पर भी व्यापक प्रभाव डाला है, और इसी प्रभाव के कारण कला को आत्म में स्थित आत्म की अभिव्यक्ति के रूप में देखने की प्रेरणा मिली है | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि उन्नीसवीं सदी के उत्तर्रार्ध में रूसी चित्रकार वेसीली केंदिस्की ने आध्यात्म विषय पर म्यूनिख में एक किताब 'ऑन द स्प्रिचुअल इन आर्ट' प्रकाशित की थी, जो कला और आध्यात्म के संबंध के सन्दर्भ में बहुत महत्वपूर्ण &lt;br /&gt;सिद्ध हुई थी | समकालीन कला में आध्यात्म ने एक विषय के रूप में लोगों का ध्यान उस बड़ी प्रदर्शनी के आरम्भ होने के साथ खींचना शुरू किया था जिसे लॉस एंजिल्स के काउंटी म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट में 1986 - 87 और बाद में शिकागो व हयूग में प्रदर्शित किया गया था | उस अवसर पर 'द स्प्रिचुअल आर्ट एब्सट्रैक्ट पेंटिंग 1890 - 1987' शीर्षक से एक महत्वपूर्ण केटलॉग का प्रकाशन भी किया गया था | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आध्यात्म को जीवन की अंतर्यात्रा के मार्ग के रूप में देखा गया है, जिसे आत्म उन्नयन के लिए आवश्यक माना गया है | कला की सार्थकता चूंकि पूर्णता में होती है और यही 'पूर्णता' की जिज्ञासा या खोज या उसे छूने की कोशिश कला का आध्यात्म है | सुनियता की पेंटिंग्स में हम कला के इसी आध्यात्म को अभिव्यक्त होते देख सकते हैं | उनकी चित्रकृतियाँ अपनी कला भाषा और अंतर्वस्तु से पवित्रता का बोध कराती हैं - तो इसका कारण शायद यही होगा कि सुनियता ने इन्हें बहुत आध्यात्मिक भाव से चित्रित किया है | इसी से हम अनुमान लगा सकते हैं कि सुनियता की कला चेतना का आध्यात्मिकीकरण एक लम्बी प्रक्रिया का परिणाम है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-4107758489757997403?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/4107758489757997403/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_25.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4107758489757997403'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4107758489757997403'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_25.html' title='सुनियता की कला की आध्यात्मिकता'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SrzS0KsHJ-I/AAAAAAAAAFA/M1rGw_zVOhI/s72-c/BIMB-PRATIBIMB+-+PRALABDH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8183624546994099183</id><published>2009-09-18T20:50:00.000-07:00</published><updated>2009-09-25T08:59:47.799-07:00</updated><title type='text'>बच्चों की चित्रकला</title><content type='html'>देवी प्रसाद की लिखी एक अनोखी पुस्तक 'शिक्षा का वाहन कला' मुझे अभी हाल ही में अचानक हाथ लगी | शिक्षाविद व कलाविद के रूप में ख्याति प्राप्त देवी प्रसाद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के स्कूल शान्तिनिकेतन के स्नातक थे | सेवाग्राम की आनंद-निकेतन शाला में कला विशेषज्ञ के रूप में काम करते हुए बालकों के साथ हुए अपने अनुभवों के आधार पर देवी प्रसाद ने करीब पचास वर्ष पहले यह पुस्तक तैयार की थी | यह पुस्तक बच्चों की कला को लेकर पैदा होने वाले सवालों का बड़े ही तर्कपूर्ण, व्यावहारिक तथा दिलचस्प तरीके से जवाब देती है | उल्लेखनीय है कि बच्चों के बनाये चित्रों को लेकर आमतौर पर काफी सारी गलतफहमियां हम बड़े पाल लेते हैं | जहाँ एक ओर बच्चों द्वारा बनाये चित्रों को हम काफी हल्के तौर पर लेते हैं वहीं दूसरी ओर बाल चित्रकला को लेकर हमारी काफी सारी जिज्ञासाएं भी होती हैं | इस पुस्तक में सवाल और जवाब के रूप में बात कही गई है | पुस्तक में दिए गए सवाल और उनके जवाब हमारी जिज्ञासाओं को सचमुच दिलचस्प तरीके से पूरा करते हैं | कुछ विशेष सवाल और उनके जवाब आप भी देखिए :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; :बच्चों के चित्रों का अभिप्राय बहुत दफे मुझे समझ में नहीं आता है, तो क्या वह बच्चों से पूछ लेना ठीक है ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : हाँ, बच्चे ने जो चित्र बनाया है अक्सर वह उसका मौखिक वर्णन करना भी पसंद करता है | मैंने अक्सर पाया है कि अपने चित्र पर या उससे संबद्ध किसी विषय पर साथ-साथ लेख लिखना कुछ बच्चों को खूब अच्छा लगता है, इसलिए चित्र का अभिप्राय पूछ लेने में कोई नुकसान नहीं है | लेकिन यह पूछा इस तरह जाना चहिए कि बच्चा जवाब न देना चाहे तो उसके लिए बचने का मौका होना चाहिए | क्योंकि उसे जो कहना था उसने चित्र में कह ही दिया है, इसके बाद भी उसे कुछ कहना है तो उसे कह सकेगा | हमें उसकी भाषा और उसका मन समझना चाहिए | इस संबंध में जितना हमारा अनुभव बढ़ेगा, उतना ही हम बिना पूछे बच्चों के चित्रों के अभिप्राय स्वयं समझने में समर्थ होंगे | मनोवैज्ञानिक तो बच्चों के चित्रों से केवल चित्रों का अभिप्राय ही नहीं, उनके मन की गहराई की बातें भी समझने का प्रयास करते हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : बच्चों ने रंगों का गलत उपयोग किया हो, तो उन्हें सुधारना चाहिए क्या ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : गलत माने क्या ? क्या अपने कपड़ों पर लगा लिया, या जमीन पर बिखेर दिया या एक-दूसरे के मुहं पर या कपड़ों पर लगा दिया | अगर ऐसा हो, तो जरूर बच्चों को इसके बारे में प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए | किंतु अगर चित्र के अंदर उसने अपने ढंग से रंगों का उपयोग किया है, तो उसे आप गलत कैसे कह सकते हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : एक बच्चा चित्र बनाता है, जिसका कोई अर्थ नहीं दिखता | तो क्या उससे पूछना नहीं चाहिए कि क्यों भाई, क्या सोच के चित्र बनाया है ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : पूछने में कोई हर्ज नहीं है | अच्छा ही है | इससे उसका चिंतन विकसित हो सकता है | किंतु यह ऐसे नहीं पूछा जाना चाहिए कि उसे लगे जैसे उसे डपटा जा रहा है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : बच्चे अगर गलत रंग का इस्तेमाल करते हैं, जैसे पेड़ को बैंगनी या लाल बनाते हैं तो क्या उसे ठीक करने के लिए नहीं कहना चाहिए ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : प्रकृति का पेड़ अलग होता है और कलाकार के मन का पेड़ अलग | और फिर बच्चों का तो बिल्कुल ही अलग | इसमें आनंद ही लिया जाना चाहिए | यह उनकी कवि-कल्पना होती है | उसे कौन सुधार सकता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : बच्चा अगर पूछे कि वह क्या बनाये, उसे चित्र बनाने का कोई विषय न सूझ रहा हो तो क्या करना चाहिए ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब &lt;/b&gt;: उसे कोई कहानी सुना कर, कुछ प्रत्यक्ष अनुभव करा कर विषय तय करने के लिए प्रेरित करना चाहिए | विषय भी सुझाया जा सकता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : महान कलाकारों की कृतियों से सीखने और उनके अनुभवों से लाभ उठाने का मौका बच्चों को किस तरह देना चाहिए ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : आमतौर पर सयानों का प्रभाव बच्चों की कला पर पड़े, तो उनकी स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है | महान कलाकारों की कृतियों से सीखने के लिए और उनके अनुभव से लाभ उठाने के लिए बहुत समय है | दस-बारह वर्ष के बाद बच्चा जब सयानों के जगत में प्रवेश करता है तब अगर उसे यह अनुभव मिले, तभी वह स्वाभाविक माना जाएगा | हाँ, कला-बोध की दृष्टि से ये कृतियाँ बच्चों को देखने को मिलती रहें, तो कोई नुकसान नहीं है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो आलंकारिक पैटर्न बनाना ही पसंद करते हैं | क्या उन्हें ऐसा करने देना चाहिए ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : पैटर्न ही केवल बनाते रहें, यह ठीक नहीं है | उन्हें चित्र बनाने के लिए भी उत्साहित करना चाहिए | यूं ऐसे कुछ अपवाद हो सकते हैं, जबकि बच्चा हमेशा नए-नए पैटर्न बनाने वाला हो | ऐसी हालत में उसी प्रवृत्ति का विकास करना अच्छा होगा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सवाल&lt;/b&gt; : किस उम्र तक बच्चों को अपने ही मन से चित्र बनाने देना चाहिए ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जवाब&lt;/b&gt; : इसका कोई नियम नहीं बनाया जा सकता | कुछ बच्चों के लिए तो बिना सुझाव के काम कर पाना कभी भी संभव नहीं होता और उन्हें हमेशा ही सलाह की जरूरत होती है | लेकिन कई बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो अपनी मर्जी से काम करते-करते आगे बढ़ जाते हैं |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8183624546994099183?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8183624546994099183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8183624546994099183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8183624546994099183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html' title='बच्चों की चित्रकला'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-4664556945813252982</id><published>2009-09-12T10:16:00.000-07:00</published><updated>2009-09-25T07:38:01.554-07:00</updated><title type='text'>अपने आर्ट टीचर रहे जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी को भारती शर्मा का देखने आना उर्फ़ स्मृतियों में लौटना</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxuOx-YevI/AAAAAAAAADw/rCJGhRzlB7w/s1600-h/IMG_2598.JPG" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380796855013112562" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxuOx-YevI/AAAAAAAAADw/rCJGhRzlB7w/s320/IMG_2598.JPG" style="cursor: pointer; float: left; height: 240px; margin: 0pt 10px 10px 0pt; width: 320px;" /&gt;&lt;/a&gt;आईफैक्स कला दीर्घा आज उस समय एक अनोखी घटना की गवाह बनी, जब भारती शर्मा करीब अड़तीस-उन्तालिस वर्ष पूर्व कानपुर के राजकीय आर्डनेंस फैक्ट्री इंटर कालेज में अपने आर्ट टीचर रहे जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी देखने पंचकुला से सीधे यहाँ पहुँची |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1971 में हाई स्कूल पास करने तक, एक छात्र के रूप में भारती की कला गतिविधियाँ जगन सिंह सैनी की देखरेख में ही परवान चढ़ी थीं | एक छात्र के रूप में भारती काफी होशियार थीं और अपनी प्रतिभा के भरोसे पांचवीं कक्षा से ही स्कालरशिप प्राप्त कर रहीं थीं तथा हाई स्कूल में उन्होंने नेशनल स्कालरशिप के लिए भी क्वालीफाई किया | पढ़ाई में होशियार बच्चे आमतौर पर कला आदि में दिलचस्पी नहीं लेते, लेकिन भारती की ड्राइंग में भी खासी रूचि थी और इसीलिए वह स्कूल के आर्ट टीचर जगन सिंह सैनी की पसंद के बच्चों में भी जानी/पहचानी जाती थीं | हाई स्कूल पास करने के बाद चूंकि आर्ट उनकी पढ़ाई का विषय नहीं रह गया था, और फिर पिता के रिटायर होने के कारण उन्होंने कानपुर भी छोड़ दिया था; लिहाजा भारती का जगन सिंह सैनी से फिर कोई संपर्क नहीं रह गया था |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिजिक्स में एमएससी करने, एमटेक अधूरा छोड़ने और शादी के बाद नाइजीरिया में करीब पंद्रह वर्ष रहने के बाद पंचकुला में आ बसने तक भारती की आर्ट में दिलचस्पी लगातार बनी ही रही | चंडीगढ़ के आर्मी पब्लिक स्कूल में फिजिक्स व मैथ्स पढ़ाते हुए भी भारती ने आर्ट में अपने आप को लगातार सक्रिय बनाए रखा और एक चित्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाई | एक चित्रकार के रूप में भारती शर्मा ने जो कुछ भी किया और अपना जो मुकाम बनाया, उसके प्रेरणाश्रोत के रूप में उन्होंने हमेशा जगन सिंह सैनी को याद तो किया लेकिन जगन सिंह सैनी का कोई अतापता उन्हें नहीं मिल सका |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगन सिंह सैनी कानपुर के राजकीय आर्डनेंस फैक्ट्री इंटर कालेज से रिटायर होने के बाद सहारनपुर आ बसे | वह यहीं के रहने वाले हैं | सहारनपुर के गाँव मुबारकपुर में उनका जन्म हुआ था | आर्ट टीचर के रूप में जगन सिंह सैनी ने बच्चों को प्रेरित और प्रशिक्षित तो किया ही, एक कलाकार के रूप में वह खुद भी लगातार सक्रिय रहे| रिटायर होने के बाद उन्होंने लखनऊ की राज्य ललित कला अकादमी, मुज़फ्फरनगर के डीएवी कालेज, दिल्ली की ललित कला अकादमी व आईफैक्स की दीर्घाओं में अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनियां कीं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईफैक्स में दो वर्ष पहले हुई जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी के बाद भारती शर्मा को उनके बारे में जानकारी मिली | उसके बाद से भारती लगातार जगन सिंह सैनी से फोन पर संपर्क में रहीं | 8 सितंबर से आईफैक्स में शुरू हुई जगन सिंह सैनी की प्रदर्शनी का निमंत्रण जाहिर है कि उन्हें मिला ही | इस प्रदर्शनी में आने को लेकर भारती इतनी उत्सुक व उत्साहित थीं कि इस अवसर को उन्होंने एक उत्सव की तरह मनाया और अपनी दोनों बहनों को भी इस बारे में बताया | इस बताने में उनके बीच अपने स्कूली दिनों की यादें ताजा हुईं | जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी देखने आना, भारती शर्मा के लिए - और उनकी बहनों के लिए भी - अपनी स्मृतियों में लौटने जैसा मामला रहा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी उत्सव में हम वास्तव में अपनी स्मृतियों को ही तो जीते हैं | स्मृति ही वह गतिशील सर्जनात्मक तत्त्व है जो काल, इतिहास, भाषा, साहित्य और कला के नए परिदृश्य रचती चलती है | आधुनिक जीवन की प्रवृत्तियां स्मृति के परिदृश्य को लगातार छोटा करती जा रही हैं | जिस वर्तमान में हम जीते हैं - जिस में हमें जीने दिया जाता है, जीने को बाध्य किया जाता है - उस की व्यस्तता लगातार इतनी बढ़ती जाती है कि हमें न स्मरण के लिए अधिक समय मिलता है और न हमारी चेतना ही उधर प्रवृत्त हो पाती है | लेकिन फिर भी स्मृतियाँ अक्सर हमारे दिलो-दिमाग पर दस्तक देती रहती हैं और कभी-कभी हम उन्हें उत्सव के रूप में जीते भी हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आर्ट टीचर रहे जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी को देखने आने को भारती शर्मा ने जिस उत्साह और उत्सवी भावना के साथ अंजाम दिया, उसे देख कर एक गतिशील सर्जनात्मक तत्त्व के रूप में स्मृति की सामर्थ्य को मैंने एक बार फिर पहचाना | इसीलिए आईफैक्स कला दीर्घा में जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी में भारती शर्मा की उपस्थिति को मैंने एक अनोखी घटना के रूप में देखा/पहचाना है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-4664556945813252982?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/4664556945813252982/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4664556945813252982'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4664556945813252982'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_12.html' title='अपने आर्ट टीचर रहे जगन सिंह सैनी के चित्रों की प्रदर्शनी को भारती शर्मा का देखने आना उर्फ़ स्मृतियों में लौटना'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxuOx-YevI/AAAAAAAAADw/rCJGhRzlB7w/s72-c/IMG_2598.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-4642251457188234014</id><published>2009-09-10T00:52:00.000-07:00</published><updated>2009-09-12T10:13:48.948-07:00</updated><title type='text'>रेनुका सोंधी का काम बुर्लेंड गैलरीज के माध्यम से पहली बार अंतर्राष्ट्रीय कला प्रेक्षकों के सामने होगा</title><content type='html'>रेनुका सोंधी की तीन पेंटिंग्स को बुर्लेंड गैलरीज ने 16 से 18 सितंबर के बीच लंदन में आयोजित हो रही अपनी एक प्रमुख प्रदर्शनी के लिये चुना है | एक चित्रकार के रूप में रेनुका सोंधी के लिये इस वर्ष की यह दूसरी प्रमुख उपलब्धि है | इसी वर्ष के शुरू में ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसायटी ने अपनी वार्षिक प्रदर्शनी में उनके एक काम को चुना था |&lt;br /&gt;अपनी कला के परिचितों व प्रशंसकों को चकित करते हुए रेनुका ने ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसायटी की वार्षिक प्रदर्शनी के लिये अपना बनाया एक स्कल्पचर दिया था | केनवस पर आयल व एक्रिलिक में काम करती रहीं रेनुका के लिये &lt;span dragover="true"&gt;स्कल्पचर&lt;/span&gt; करना एक नया अनुभव था | इसके &lt;span dragover="true"&gt;बावजूद&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;स्कल्पचर&lt;/span&gt; को ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड &lt;span dragover="true"&gt;क्राफ्ट्स&lt;/span&gt; सोसायटी की वार्षिक प्रदर्शनी के लिये काम का चुनाव &lt;span dragover="true"&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;वालों&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;पसंद&lt;/span&gt; किया | 142 स्कल्पचर प्रदर्शनी के &lt;span dragover="true"&gt;लिये&lt;/span&gt; आये, जिनमें से 36 को प्रदर्शित करने के लिये चुना गया | &lt;span dragover="true"&gt;इन&lt;/span&gt; 36 &lt;span dragover="true"&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;एक&lt;/span&gt; रेनुका का फाइबर में बनाया गया '&lt;span dragover="true"&gt;डिफरेंट&lt;/span&gt; फेज़' शीर्षक स्कल्पचर भी था|&lt;br /&gt;रेनुका सोंधी ने अपनी निरंतर &lt;span dragover="true"&gt;स&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;क्रियता&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;से&lt;/span&gt; कला जगत में अपने काम को &lt;span dragover="true"&gt;प्रतिष्ठित&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;किया&lt;/span&gt; है | पिछले वर्ष उन्होंने हिमाद्री भट्टाचार्य व अनीता कृषाली के साथ एक समूह प्रदर्शनी की थी | उसके &lt;span dragover="true"&gt;पह&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;ले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; वर्ष त्रिवेणी कला दीर्घा में तथा उससे भी पहले वर्ष पूर्वा संस्कृति केंद्र में रेनुका सोंधी ने अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनी की थी | दिल्ली और दिल्ली से बाहर आयोजित हुईं कुछेक समूह प्रदर्शनियों में भी उनका काम प्रदर्शित हुआ है; तथा एक चित्रकार के रूप में विभिन्न संस्थाओं की तरफ से वह पुरस्कृत व सम्मानित हो चुकी हैं | बुर्लेंड गैलरीज की लंदन में होने वाली प्रदर्शनी में उनके चित्रों की मौजूदगी एक चित्रकार के रूप में उनकी पहुंच व पहचान को और व्यापक बनाने का काम ही करेगी |&lt;br /&gt;बुर्लेंड गैलरीज की स्थापना ब्रिटेन में रह रहे नवीन साहनी ने ब्रिटिश नागरिक फिलिप पवसन के साथ मिलकर की  है, जिसका उद्देश्य भारत के प्रतिभाशाली युवा चित्रकारों के काम &lt;span dragover="true"&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;यूरोपियो&lt;/span&gt; देशों के साथ-साथ अमेरिका तथा मध्य एशियाई देशों में प्रदर्शित करना तथा बेचना है | इस उद्देश्य को &lt;span dragover="true"&gt;प्र&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;ाप्त&lt;/span&gt; करने &lt;span dragover="true"&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;लिये&lt;/span&gt; बुर्लेंड गैलरीज ने ब्रिटेन के कुछेक बिजनेस समूहों के साथ  व्यापारिक किस्म के समझौते किये हुए हैं | &lt;span dragover="true"&gt;बुर&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;्लेंड&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; गैलरीज भारत में प्रतिभाशाली युवा चित्रकारों की पहचान करती है, और उनके काम को विदेशी कला प्रेक्षकों व खरीदारों के समक्ष प्रस्तुत करती है |&lt;br /&gt;बुर्लेंड गैलरीज के जरिये भारत के कई युवा चित्रकारों ने कला की अंतर्राष्ट्रीय दुनिया में नाम और दाम दोनों कमाएं हैं | कई युवा चित्रकार हैं जिन्होंने बुर्लेंड गैलरीज के जरिये पहली बार अपने काम को प्रदर्शित कर पाया है |&lt;br /&gt;रेनुका सोंधी का काम बुर्लेंड गैलरीज के माध्यम से पहली बार अंतर्राष्ट्रीय कला प्रेक्षकों के सामने होगा | बुर्लेंड गैलरीज की 16 से 18 सितंबर के बीच लंदन में आयोजित हो रही प्रदर्शनी में &lt;span dragover="true"&gt;रेनुका&lt;/span&gt; सोंधी की जो तीन पेंटिंग्स लगेंगी उन्हें आप यहाँ भी &lt;span dragover="true"&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;सकते&lt;/span&gt; हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi2f0uokYI/AAAAAAAAACk/5wNBe6XT3xU/s1600-h/DSC01609.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 313px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi2f0uokYI/AAAAAAAAACk/5wNBe6XT3xU/s320/DSC01609.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379750412740497794" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The balancing 2008&lt;br /&gt;12"x12"&lt;br /&gt;acrylic &amp;amp; oil&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi3VmVEyZI/AAAAAAAAACs/x9qLg5UF6dg/s1600-h/DSC01611.JPG"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 315px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi3VmVEyZI/AAAAAAAAACs/x9qLg5UF6dg/s320/DSC01611.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379751336588134802" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The surprise 2008&lt;br /&gt;12"x12"&lt;br /&gt;acrylic &amp;amp; oil&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi4AaB-d7I/AAAAAAAAAC0/aFSKYvI9Vy0/s1600-h/DSC01614.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 319px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi4AaB-d7I/AAAAAAAAAC0/aFSKYvI9Vy0/s320/DSC01614.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379752072021178290" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The vision 2008&lt;br /&gt;12"x12"&lt;br /&gt;acrylic &amp;amp; oil&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-4642251457188234014?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/4642251457188234014/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4642251457188234014'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/4642251457188234014'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html' title='रेनुका सोंधी का काम बुर्लेंड गैलरीज के माध्यम से पहली बार अंतर्राष्ट्रीय कला प्रेक्षकों के सामने होगा'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sqi2f0uokYI/AAAAAAAAACk/5wNBe6XT3xU/s72-c/DSC01609.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-8618371378850327676</id><published>2009-09-02T17:17:00.000-07:00</published><updated>2009-09-04T05:44:23.097-07:00</updated><title type='text'>आनंद नारायण अपनी छठी एकल प्रदर्शनी देखने के लिए बुला रहे हैं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8M8CBQhyI/AAAAAAAAAB0/5XUR-fedUnw/s1600-h/invitee.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 206px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8M8CBQhyI/AAAAAAAAAB0/5XUR-fedUnw/s320/invitee.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377030705577494306" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आनंद नारायण के लैंडस्केप की प्रदर्शनी नई दिल्ली की त्रिवेणी कला दीर्घा में 9 सितम्बर से शुरू हो रही है | इस प्रदर्शिनी में प्रस्तुत चित्रों को 18 सितम्बर तक देखा जा सकेगा | आनंद नारायण के चित्रों की यह छठी एकल प्रदर्शनी है | ऐसे समय में जबकी लैंडस्केप कला को &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;भुला&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span dragover="true"&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;दिया&lt;/span&gt; गया है, आनंद नारायण की लैंडस्केप पर काम करते रहने की जिद चकित करती है | उल्लेखनीय है कि &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;आधुनिक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; कला आंदोलन की शुरूआत या फिर कहें कि पचास व साठ के दशक तक भी कई प्रमुख &lt;span dragover="true"&gt;कलाकारों&lt;/span&gt; की &lt;span dragover="true"&gt;दिल&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;चस्पी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;होने&lt;/span&gt; से, लैंडस्केप का कला-जगत में खासा जोर था | बाद के वर्षों में उक्त &lt;span dragover="true"&gt;जोर&lt;/span&gt; लेकिन कमजोर &lt;span dragover="true"&gt;हो&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;ता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; गया | मौजूदा &lt;span dragover="true"&gt;क&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;ला&lt;/span&gt; परिदृश्य की ओर देखें तो हम पायेंगे कि बहुत &lt;span dragover="true"&gt;कम&lt;/span&gt; चित्रकार ही हैं जो &lt;span dragover="true"&gt;लैंडस्केप&lt;/span&gt; को सार्थक अभिव्यक्ति का माध्यम मानते हैं | इसके बहुत से कारण होंगे; लेकिन यह कहने का मन &lt;span dragover="true"&gt;जरूर&lt;/span&gt; होता है कि &lt;span dragover="true"&gt;एक&lt;/span&gt; समय खासे प्रभावी रहे इस चित्र-रूप की कुछ अनदेखी सी ही हो रही है | गौर करने की बात यह है कि बाज़ार &lt;span dragover="true"&gt;क&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;े&lt;/span&gt; लिए तो &lt;span dragover="true"&gt;लैंडस्केप&lt;/span&gt; आज भी खूब बन रहे हैं, लेकिन मैं यहाँ उन लैंडस्केप की बात कर रहा हूँ जिनमें कमोबेश एक &lt;span dragover="true"&gt;रचनात्&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;मकता&lt;/span&gt; भी रहती है, और जिनके स्त्रोत केवल किताबों- केलेंडरों में नहीं होते | इस लिहाज से लैंडस्केप के प्रति आनंद नारायण की लगातार बनी रहने वाली प्रतिबद्दता आश्वस्त करती है |  &lt;span dragover="true"&gt;आनंद&lt;/span&gt; नारायण &lt;span dragover="true"&gt;के&lt;/span&gt; लैंडस्केप देखते हुए यह तथ्य एक रोमांच &lt;span dragover="true"&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;देता&lt;/span&gt; है कि उनकी कला यात्रा का आरंभ &lt;span dragover="true"&gt;उत्तर&lt;/span&gt; प्रदेश के एक अत्यंत &lt;span dragover="true"&gt;पीछे&lt;/span&gt; रह गए जिले बाराबंकी से हुआ था | उनके काम को देख कर लगता है कि लखनऊ और दिल्ली ने उनकी कला को परिष्कृत भले ही किया हो, लेकिन एक चित्रकार के &lt;span dragover="true"&gt;रूप&lt;/span&gt; में 'खाद-पानी' वह अभी भी वहीं से जुटाते हैं | लखनऊ के कॉलिज ऑफ आर्ट &lt;span dragover="true"&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;बीएफए&lt;/span&gt; करने के बाद आनंद दिल्ली आ गए और यहाँ के जामिया मिलिया &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;इस्लाम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;िया&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;से&lt;/span&gt; उन्होंने एमएफए किया | उत्तर प्रदेश की राज्य ललित कला अकादमी ने 1995 में &lt;span dragover="true"&gt;अ&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;पनी&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;बीसवीं&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;वार्षिक&lt;/span&gt; प्रदर्शनी में जब दस &lt;span dragover="true"&gt;कला&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;कारों&lt;/span&gt; को पुरस्कारों के लिए चुना, तो उन दस कलाकारों में आनंद नारायण का नाम  भी था | आनंद नारायण कैमलिन आर्ट फाउंडेशन से भी पुरस्कृत हो चुके हैं तथा राष्ट्रीय ललित कला अकादमी से उन्होंने रिसर्च ग्रांट भी प्राप्त की है | लैंडस्केप में आनंद का मुख्य &lt;span dragover="true"&gt;रुझान&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;रंग&lt;/span&gt;-संपुजन का है : किन्हीं लैंडस्केप में रंगों और उन रंगों के प्रकाश को जैसे वह चुन लेते हैं और &lt;span dragover="true"&gt;फिर&lt;/span&gt; उसे अपनी तरह से एक आकार देते हैं | भरी हुई धूप की तरह कुछेक लैंडस्केप में खुरचनें हैं जो &lt;span dragover="true"&gt;मानो&lt;/span&gt; धारियों या लकीरों की एक पर्याय सरीखी हैं | &lt;span dragover="true"&gt;लेकिन&lt;/span&gt; यह इनका एक चाक्षुक विवरण ही हुआ | दरअसल, &lt;span dragover="true"&gt;आन&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;ंद&lt;/span&gt; के रंग संपुजनों, खुरचनों और रंग-प्रकाश में कुछ ऐंद्रिक-मानसिक व्याप्तियाँ भी हैं &lt;span dragover="true"&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;उन्हें&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;मात्र&lt;/span&gt; अलंकरणयुक्त आकर्षक लैंडस्केपों से कुछ ऊपर उठा देती है | वैसे अलंकरण का खतरा उनके यहाँ &lt;span dragover="true"&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;ब&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;िल्कुल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; समाप्त नहीं हो गया और एक अतिरिक्त मधुरता भी दीख जा सकती है - लेकिन तब जो चीज उन्हें &lt;span dragover="true"&gt;लैंडस्केप&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;बनाती&lt;/span&gt; है - वह यही कि यह अलंकरणप्रियता और मधुरता खोज रहित नहीं  है | आनंद ने किन्हीं मुहावरों के भीतर &lt;span dragover="true"&gt;अ&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;पने&lt;/span&gt; को &lt;span dragover="true"&gt;बंद&lt;/span&gt; नहीं कर लिया है और इसी से यह उम्मीद भी बंधती है कि वह लैंडस्केप के रूप &lt;span dragover="true"&gt;प्रकार&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;को&lt;/span&gt; न सही बेहद &lt;span dragover="true"&gt;खोजी&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;दृष्टि&lt;/span&gt; से लेकिन एक &lt;span dragover="true"&gt;टटोलती&lt;/span&gt; टोहती दृष्टी से तो देख ही रहे हैं | यह खासे संतोष की ही बात है कि इसीलिये आनंद प्रदर्शनी-दर-&lt;span dragover="true"&gt;प्रदर्शनी&lt;/span&gt; अपने को दोहराते हुए नहीं लगते और न ही इतना रुके हुए कि अगली प्रदर्शनी के लिए &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;उत्सुकता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; ही न रहे | उम्मीद की जानी चाहिए कि आनंद नारायण की अगली प्रदर्शनी उक्त संतोष व &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;व&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;िश्वास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; को बनाये रखेगी | आनंद नारायण के चार नए लैंडस्केप &lt;span dragover="true"&gt;क&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;े&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;चित्र&lt;/span&gt; आप यहाँ भी देख सकते है | किंतु इन्हें कला दीर्धा में  देखेंगे तो बात ही &lt;span&gt; कुछ&lt;/span&gt; और होगी |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8RjRCAmsI/AAAAAAAAACc/ksOuvKZ5l-M/s1600-h/DSC_2684.JPG"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 174px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8RjRCAmsI/AAAAAAAAACc/ksOuvKZ5l-M/s320/DSC_2684.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377035777668586178" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8QUZ0vfXI/AAAAAAAAACM/nQCtROrR-jk/s1600-h/01-09-09_1852.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 318px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8QUZ0vfXI/AAAAAAAAACM/nQCtROrR-jk/s320/01-09-09_1852.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377034422819192178" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8P3iMFP0I/AAAAAAAAACE/H7X5wfvfsWc/s1600-h/31-08-09_2231.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 319px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8P3iMFP0I/AAAAAAAAACE/H7X5wfvfsWc/s320/31-08-09_2231.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377033926848364354" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8Q_Y7UDgI/AAAAAAAAACU/L5gUpRNVbMU/s1600-h/DSC_2681.JPG"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 279px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8Q_Y7UDgI/AAAAAAAAACU/L5gUpRNVbMU/s320/DSC_2681.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377035161312693762" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7543983570940434728-8618371378850327676?l=mukesh-mishra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/feeds/8618371378850327676/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8618371378850327676'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7543983570940434728/posts/default/8618371378850327676'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='आनंद नारायण अपनी छठी एकल प्रदर्शनी देखने के लिए बुला रहे हैं'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Sp8M8CBQhyI/AAAAAAAAAB0/5XUR-fedUnw/s72-c/invitee.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7543983570940434728.post-400871130504517723</id><published>2009-08-28T12:09:00.000-07:00</published><updated>2009-08-31T08:48:43.927-07:00</updated><title type='text'>Finesse Art presents a group art exhibition "New Beginnings"</title><content type='html'>गुड़गाँव की ऐपिसेंटर कला दीर्घा में अर्चना भसीन, अनूप श्रीवास्तव, भावना रस्तोगी,  कीर्ति सरकार, ललित जैन, मनीषा खन्ना, मीनू मेहरोत्रा, नंदिनी वर्मा, निधि अग्रवाल,  पारुल एरन, प्रशांत सरकार, संगीता मल्होत्रा, सायरा एच, सारंग सिंगला, सीमा जिंदल,  शालिनी गुप्ता, स्वाति गोडबोले, तमन्ना सी, वंदना तनेजा और सुरेखा सदाना के चित्रों  की समूह प्रदर्शनी २८ &lt;span dragover="true"&gt;अगस्त&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;से&lt;/span&gt; शुरू हुई है | यहाँ प्रदर्शित चित्रों को दो सितम्बर  तक देखा &lt;span dragover="true"&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;सकेगा&lt;/span&gt; | यहाँ प्रदर्शित चित्रों में अभिव्यक्त हुई &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;कल्पनाशीलता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; और  सृजनात्मकता आकर्षित भी करती है &lt;span dragover="true"&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;ग&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;हरे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; तक प्रभावित भी | सुरेखा सदाना के काम को  मैं &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;पहले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;भी&lt;/span&gt; देख चुका हूँ, लेकिन बाकी चित्रकारों के काम को मैंने पहली बार ही देखा  है इसलिए उन पर विस्तार से कुछ &lt;span dragover="true"&gt;कह&lt;/span&gt; पाना संभव नहीं होगा और ऐसा करना जल्दबाजी भी  होगी | यहाँ प्रदर्शित काम ने लेकिन इतना असर जरूर किया है कि इन चित्रकारों के और  और कामों को लेकर उत्सुकता पैदा हुई है | और काम देखने का यदि कभी मौका मिला तो  मुझे विश्वास है कि कला के विविधतापूर्ण आयामों से मेरा परिचय और सघन ही होगा | इस  समूह &lt;span dragover="true"&gt;चित्र&lt;/span&gt; प्रदर्शनी में सुरेखा सदाना की नई पेंटिंग्स ने उनकी &lt;span dragover="true"&gt;प्रयोगशीलता&lt;/span&gt; और  कल्पना व यथार्थ के बीच संयोजन की &lt;span dragover="true"&gt;&lt;span dragover="true"&gt;उन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dragover="true"&gt;की&lt;/span&gt; सामर्थ्य के प्रति मुझे और आश्वस्त किया है  | दिलचस्प &lt;span dragover="true"&gt;संयोग&lt;/span&gt; है कि अपनी पत्रिका "प्रसंग" के आगामी &lt;span dragover="true"&gt;अंक&lt;/span&gt; &lt;span dragover="true"&gt;में&lt;/span&gt; सुरेखा सदाना की कला  पर मैंने दो लेख लिखे/छापे हैं | उक्त &lt;span dragover="true"&gt;दोनों&lt;/span&gt; लेखों को यहाँ लगाया जा रहा है | यहाँ  लगाई &lt;span dragover="true"&gt;गईं&lt;/span&gt; फोटो सुरेखा सदाना की नई पेंटिंग्स की फोटो हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp-eUF7hAI/AAAAAAAAABk/Zps_ELLj8Vo/s1600-h/Offering+%2824x48+inches%29+oil+on+canvas.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp-eUF7hAI/AAAAAAAAABk/Zps_ELLj8Vo/s320/Offering+%2824x48+inches%29+oil+on+canvas.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375748164474864642" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;offering&lt;br /&gt;24x48 inches&lt;br /&gt;oil on canvas&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp9lKn_CQI/AAAAAAAAABU/qTPQSr6SxPo/s1600-h/Attainment+%2824x48+inches%29+oil+on+canvas.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 317px; height: 209px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp9lKn_CQI/AAAAAAAAABU/qTPQSr6SxPo/s320/Attainment+%2824x48+inches%29+oil+on+canvas.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375747182680803586" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;attainment&lt;br /&gt;24x48 inches&lt;br /&gt;oil on canvas&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp-BMzxyFI/AAAAAAAAABc/da_d0C8VZ10/s1600-h/Infinite+%2824x48%29+oil+on+canvas.JPG"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 205px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp-BMzxyFI/AAAAAAAAABc/da_d0C8VZ10/s320/Infinite+%2824x48%29+oil+on+canvas.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375747664303474770" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;infinite&lt;br /&gt;24x48 inches&lt;br /&gt;oil on canvas&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp-x9LGoLI/AAAAAAAAABs/EGDkUe1be-g/s1600-h/Benediction+%2836x48+inches%29+oil+on+canvas.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; 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/&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spg4vEi7GGI/AAAAAAAAAA0/T208L3rb0ak/s1600-h/prasang2.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 261px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spg4vEi7GGI/AAAAAAAAAA0/T208L3rb0ak/s320/prasang2.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375108536591915106" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spg5ZlcB-lI/AAAAAAAAAA8/YZIN97j_MM4/s1600-h/prasang3.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 253px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spg5ZlcB-lI/AAAAAAAAAA8/YZIN97j_MM4/s320/prasang3.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375109266975881810" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spg6CPhckbI/AAAAAAAAABE/DxjrwCl1LSE/s1600-h/prasang4.jpg"&gt;&lt;img dragover="true" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 251px; height: 320px;" 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rel='alternate' type='text/html' href='http://mukesh-mishra.blogspot.com/2009/08/surekha-sadanas-hand-of-destiny-blend.html' title='Finesse Art presents a group art exhibition &quot;New Beginnings&quot;'/><author><name>MUKESH MISHRA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11974012187975083599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/SqxtZPpw7oI/AAAAAAAAADI/O11tBAU9jiM/S220/IMG_2600.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_A-NUUgD3LhQ/Spp-eUF7hAI/AAAAAAAAABk/Zps_ELLj8Vo/s72-c/Offering+%2824x48+inches%29+oil+on+canvas.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
