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Monday, May 31, 2010

अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है

अमी चरणसिंह तीन सीरीज़ में मुक्तिबोध की कविता 'मुझे क़दम-क़दम पर चौराहे मिलते हैं' को लेकर जो चित्र-रचना कर रहे हैं, उसके कुछेक चित्र अभी हाल ही में देखने को मिले तो मुझे बरबस ही कला-रूपों के अंतर्संबंधों पर महादेवी वर्मा की 'दीपशिखा' की भूमिका याद आ गई जिसमें उन्होंने लिखा था कि 'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता   है |' इस क्षमता के बावजूद, हालाँकि आधुनिक कविता और चित्रकला के बीच रिश्ता पिछले वर्षों में कमजोर पड़ता गया है | ऐसे में अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है | अमी चरणसिंह पिछले करीब तीन वर्ष से भारत के एक महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की उक्त कविता को विभिन्न रूपों में चित्रित कर रहे हैं | पहले उन्होंने पेपर पर दो-एक रंगों में एक्रिलिक से काम किया, फिर कई रंगों में काम किया और हाल ही में उन्होंने पेपर पर ऑयल से उक्त कविता को 'देखा' | अमी चरणसिंह ख़ुद भी कविताएँ लिखते हैं और उनकी कविताएँ पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं हैं |
अमी चरणसिंह ने चित्र-रचना और कविता लिखने का काम अपने जीवन में हालाँकि देर से शुरू किया - इतनी देर से कि उनके कॉलिज के साथियों को हैरान होकर उनसे पूछना पड़ा कि 'यह' सब कब हुआ ? कला की दुनिया में अमी चरणसिंह की सक्रियता कला समीक्षक के तौर पर शुरू हुई थी | हालाँकि इससे पहले, कॉलिज के दिनों में उन्होंने प्रसिद्व चित्रकार भाऊ समर्थ पर एक किताब का संपादन किया था | कला प्रदर्शनियों के साथ-साथ उन्होंने फिल्मों पर भी समीक्षात्मक रिपोर्ट्स लिखीं; और फिर वह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाने लगे | उन्होंने कला और कलाकारों पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाईं | यही सब करते हुए वह कब चित्र बनाने लगे, यह दूसरों को तो क्या शायद उन्हें भी पता नहीं चला | जब 'पता' चला तब उन्होंने चित्र-रचना के काम को गंभीरता से लेना शुरू किया | मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में अपने चित्रों को प्रदर्शित करने के साथ-साथ उन्होंने दिल्ली व मुंबई में भी अपने चित्रों को प्रदर्शित किया है | मुक्तिबोध की कविता पर अमी चरणसिंह ने जो चित्र बनाए हैं उनमें चित्रकला की जटिल शास्त्रीयता भी है, और इसीलिए यह उल्लेखनीय भी हैं | मुक्तिबोध की कविताओं पर फिल्में भी बन चुकीं हैं, जिन्हें प्रसिद्व फिल्म निर्माता मणि कौल ने संभव किया था | ज़ाहिर है कि मुक्तिबोध की कविताएँ दूसरे कला माध्यमों में काम करने वाले कलाकारों के लिये प्रेरणा और चुनौती की तरह रहीं हैं | अमी चरणसिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया और निभाया, तो यह कला के प्रति उनकी प्रतिबद्वता का सुबूत भी है | 
अमी चरणसिंह ने कला के प्रति अपनी प्रतिबद्वता का सुबूत प्रस्तुत करते हुए वास्तव में हिंदी की कला-चिंतन की उस समृद्व परंपरा को ही निभाने की कोशिश की है, जिसके तहत अनेक कवि-कथाकारों ने चित्रकला में भी अपनी सक्रियता रखी और दिखाई है | महादेवी वर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, जगदीश गुप्त, रामकुमार, लक्ष्मीकांत वर्मा, चंद्रकांत देवताले, विपिन अग्रवाल, विजेंद्र, नरेन्द्र जैन आदि कुछ नाम तुरंत याद आ रहे हैं - नाम और भी हैं तथा इस सूची को और बढाया जा सकता है | मकबूल फ़िदा हुसैन, गुलाम मोहम्मद शेख, जगदीश स्वामीनाथन, जय झरोटिया जैसे मशहूर चित्रकारों ने कविताएँ भी लिखीं | मुझे याद आया कि ऑल इंडिया फाइन ऑर्ट एण्ड क्रॉफ्ट सोसायटी (आइफैक्स) ने कई वर्ष पहले कविता लिखने वाले चित्रकारों के काव्यपाठ का कार्यक्रम आयोजित किया था | कवियों द्वारा चित्रकारों और या उनके चित्रों पर कविताएँ लिखने के तो असंख्य उदाहरण मिल जायेंगे | इसका उल्टा भी खूब हुआ है | चित्रकारों ने कविताओं को केनवस पर उतारने में भी काफी दिलचस्पी ली हैं | कालिदास की प्रसिद्व काव्य-कृति 'मेघदूत' चित्रकारों को शुरू से ही आकर्षित करती रही है | 'बिहारी सतसई' ने अनेक चित्रकारों को अपनी ओर आकर्षित किया | यहाँ यह याद करना भी प्रासंगिक होगा कि पिकासो से कवियों के कितने गहरे रिश्ते थे और नये काव्यान्दोलनों को जन्म देने में उसके अभिनव प्रयोगों की क्या भूमिका थी | गुलाम मोहम्मद शेख ने कविताएँ तो लिखी हीं, कबीर की कविताओं पर एक पूरी श्रृंखला भी बनाई थी | विवान सुन्दरम ने कई कविताओं पर पेंटिंग्स बनाई हैं | जय झरोटिया ने सौमित्र मोहन की 'लुकमान अली' कविता पर एक पूरी श्रृंखला बनाई थी | अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त करने के लिये शब्दों के अतिरिक्त रंगों और रेखाओं का सहारा लेने का उपक्रम सिर्फ हिंदी के लेखकों ने ही नहीं किया है, बल्कि अन्य भाषों के लेखकों के बीच भी इस तरह के उदाहरण मिल जायेंगे | यहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर को याद करना प्रासंगिक होगा | फ्रांसीसी कवि एपोलिनेयर और आंद्रे ब्रेतों ने तो अपने समय के प्रसिद्व अतियथार्थवादी (सुर्रियलिस्ट) कला-आंदोलन में खासी सक्रियता दिखाई थी |
कविता, भाषा और मानवीय अनुभवों की प्रतीकात्मक दुनिया है | चित्रकला इस प्रतीकात्मक दुनिया को चाक्षुषता से जोड़ कर दृश्य में रूपांतरित करते हुए प्रभावोत्पादक ढंग से अधिक स्पष्ट और सम्प्रेषणीय बना सकती है | कविता शब्दों का संसार अवश्य है; किंतु साहित्य में कविता ही ऐसी विधा है जिसमें शब्दों का अतिरिक्त अर्थ बहुत अधिक होता है | वह अनुभव, यथार्थ, स्मृति, कल्पना और स्वप्नों की सांकेतिक बुनावट के साथ ही द्वंद्व, तनाव, व्यंग्य और यातना की विस्फोटक दुनिया भी है | चित्र में उसे साधना स्वाभाविक रूप से एक बड़ी चुनौती है - तब तो और भी जबकि कवि-कर्म और चित्र-रचना दोनों ही व्यक्तिगत साधना की चीज़    हैं | भले ही - जैसा कि महादेवी वर्मा ने कहा है कि - 'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता है', लेकिन फिर भी उनमें एक के दूसरे पर प्रभाव तलाशने की कोशिश फिजूल की बात ही समझी जाती है | कवि-कर्म और चित्र-रचना एक दूसरे को प्रभावित और प्रेरित तो करते हैं तथा उनमें संबंध भी होता है; लेकिन कविता कविता का काम करती है, और चित्र चित्र का | दोनों का काम और प्रभाव अलग-अलग ही होगा | इसीलिए मुक्तिबोध की कविता पर बनाए गये अमी चरणसिंह के चित्रों को देखते हुए मैं उनमें मुक्तिबोध की कविता को नहीं अमी चरणसिंह की रचनात्मकता को समझने / पहचानने की कोशिश करता हूँ - ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान यूँ भी मुक्तिबोध के ही दिये गये पद हैं |
मध्यकाल के बाद और खासतौर से उत्तर मध्यकाल के बाद चित्रकला व कविता के बीच जो प्रभावपरक रिश्ता बना था वह आधुनिक परिवेश में किसी नवोत्थान के साथ आगे नहीं बढ़ सका और धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया | उक्त रिश्ता कमजोर जरूर पड़ गया है, पर पूरी तरह बिसरा नहीं है; और उस रिश्ते को नये रूप में खोजने / बनाने के प्रयास भी जारी दिखते ही हैं | ऐसे में, मुक्तिबोध की कविताओं पर अमी चरणसिंह का सीरीज़ में काम करना - मैं फिर दोहराना चाहूँगा कि - आश्वस्त करता  है |