Sunday, November 22, 2009

पिकासो की वर्षों पहले कही गई बात कि 'चित्र अपनी अनुश्रुति पर ही जीवित रहेगा, किसी और चीज पर नहीं' को मैंने अपने सामने सच होते हुए पाया


अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके घर लौट रहे लोगों से खचाखच भरे ट्रेन के डिब्बे में अपने दोस्तों को जब मैंने बातों ही बातों में यूं ही बताया कि आज मैंने पिकासो के चित्रों की प्रदर्शनी देखने का काम किया है, तो मैंने महसूस किया की मेरे दोस्तों ने मुझे कुछ खास तवज्जो देना शुरू कर दिया | अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके घर लौटने की जल्दी में ट्रेन में साथ बैठे उन दोस्तों को मैं चूंकि अच्छी तरह जानता हूँ; मैं जानता हूँ कि कला उनके लिये एक फालतू किस्म का काम है; मैं जानता हूँ कि उन्हें पिकासो तो क्या किसी भी कलाकार के बारे में या उनके काम के बारे में जानने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही होगी; मैं जानता हूँ कि कला में मेरी दिलचस्पी उनके लिये अक्सर मजाक का विषय रही है - लेकिन अब नज़ारा बदला हुआ था | मैंने पिकासो की पेंटिंग्स देखी हैं, मैं पिकासो के बारे में कुछ जानता हूँ, मुझे पहले से पता था कि पिकासो की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी दिल्ली में कहाँ लगी है और मैं आज आज खास तौर से उस प्रदर्शनी को देखने गया - इस कारण मैं ट्रेन के सफ़र के अपने उन दोस्तों के बीच खास बन गया था जिनके मन में मैंने कला के प्रति कभी कोई सम्मान या दिलचस्पी नहीं देखी थी |
अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके घर लौट रहे ट्रेन के मेरे उन दोस्तों को पिकासो के बारे में सिर्फ इतना ही पता था कि पिकासो एक बड़ा चित्रकार था, किसी ने कहा कि - है | पिकासो के बारे में इससे ज्यादा उन्हें कुछ नहीं पता था | अपनी जानकारी में उन्होंने पिकासो की कोई पेंटिंग नहीं देखी | कभी किसी अख़बार या पत्रिका में देखी हो तो उन्हें पता नहीं, याद नहीं | पिकासो की पेंटिंग्स देखने को लेकर उन्होंने कोई इच्छा या उत्सुकता भी नहीं प्रकट की | मैंने उन्हें बताया भी कि जिस प्रदर्शनी को मैं देख कर आ रहा हूँ, वह अभी पंद्रह दिन और लगी रहेगी; लेकिन किसी ने भी ऐसी इच्छा भी प्रकट नहीं की कि वह देखने जाने की कोशिश करेगा | इसके बावजूद, मैंने महसूस किया कि जैसे उन्हें इस बात पर गर्व था कि उनके साथ बैठे उनके एक दोस्त ने पिकासो की पेंटिंग्स देखी हैं और जो पिकासो के बारे में जानता है | उनका इस बात पर गर्व करना और मुझे खास तवज्जो देना मुझे हैरान कर रहा था | अपने दोस्तों का यह व्यवहार और उनका रवैया मुझे बराबर पहेली जैसा लग रहा था और मैं वास्तव में चकित था |
मैं चकित था यह देख कर कि स्पेन के एक छोटे से गाँव मालागा में 1881 में जन्में पाब्लो पिकासो में ऐसा आखिर क्या था कि हजारों मील दूर भारत के एक छोटे शहर के, अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके थके-हारे घर लौट रहे लोग उनके नाम के आगे इस हद तक नतमस्तक थे कि मुझे खास समझ रहे थे क्योंकि मैं पिकासो के बारे में उनसे ज्यादा जानता हूँ | यह ठीक है कि हमारे समय के कलाकारों में पिकासो की एक विशिष्ट जगह है - एक ऐसी जगह जिसे उन्हें सख्त नापसंद करने वाला भी नहीं छीन सकता है | यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हमारे समय में कोई दूसरा पिकासो नहीं पैदा हो सकता | पिकासो जैसे जीवन और उसके मिथक और जादुई ताकत को पाना आसान नहीं है - बल्कि असंभव ही है | पिकासो ने हमेशा मनुष्य और उसके जीवन को अपने चित्रों में उकेरने का काम किया है | मातृत्व, नट, मदारी, गरीब, फुटपाथवासी, अंधे भिखारी आदि उनकी कला के विषय रहे | दुःख और वेदना को दृश्य-भाषा के माध्यम से कैसे उकेरा जा सकता है पिकासो से ज्यादा शायद ही कोई जानता होगा | मनुष्य जीवन की छोटी से छोटी सच्चाई को पहचानने; मनुष्य जीवन की गहरी समझ रखने तथा उसके प्रति अतुलनीय जुड़ाव व आस्था रखने और उसे प्रकट करने उस ही पिकासो को पिकासो बनाया है, और उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी | लेकिन इस बात से उन लोगों को भला क्या मतलब जो अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके थके-हारे घर लौटने की जल्दी में हैं और जो कला को एक फालतू का काम मानते और समझते हैं |
मैं वास्तव में हैरान था और मेरे लिये यह एक पहेली सी बन गई थी कि आखिर क्या चीज है जो उन्हें पिकासो के नाम के आगे नतमस्तक किये दे रही है | इस पहेली को हल करने में पिकासो ने ही मेरी मदद की |  मैंने कहीं पढ़ा है कि पिकासो ने एक बार कहा था : 'जितना रंग टिकता है उतना ही कागज भी, और अंततः दोनों साथ-साथ आयुग्रस्त होते हैं | और बाद में कोई चित्र तो देख नहीं पायेगा, सब चित्र की अनुश्रुति या दंतकथा ही सुनेंगे - वह अनुश्रुति या दंतकथा जो चित्र ने बनाई होगी | तब फिर, चित्र रहे या न रहे कोई फर्क नहीं पड़ता | आगे चलकर चित्र को 'रक्षित' करने की कोशिश की जायेगी; लेकिन चित्र अपनी अनुश्रुति पर ही जीवित रहेगा, किसी और चीज पर नहीं |' पिकासो संभवतः यही कह रहे थे कि अगर किन्हीं कलाकृतियों में प्राण फूंके गए होंगे तो वे कलाकृतियां समाप्त हो जाने पर भी हमारी स्मृति में मंडराती रहेंगी | अचंभा नहीं कि, पिकासो अपनी ही कृतियों को मान दे कर एक अनुश्रुति ( लीजेंड ) बना रहे थे | पिकासो ने एक बार यह भी कहा था : 'जरूरी बात यह है कि हमारे समय के कमजोर मनोबल के बीच उत्साह पैदा किया जाये | कितने लोगों ने सचमुच होमर को पढ़ा होगा ? लेकिन समूची दुनिया होमर की बात करती है | इस तरह से एक होमेरी अनुश्रुति बनती है | इस अर्थ में एक अनुश्रुति मूल्यवान उत्तेजना पैदा करती है | उत्साह ही वह चीज है जिसकी हमें और युवा पीढ़ी को, सबसे अधिक ज़रूरत है |
कितना सही थे पिकासो | कोई उनके चित्रों को कभी देख पाए या नहीं, कोई उन्हें या उनके चित्रों को जानें या नहीं, लेकिन उनके और उनकी कला के प्रति सम्मान और उत्साह व्यक्त करने के मामले में पीछे नहीं रहेगा | अपनी अपनी नौकरियों का एक और दिन पूरा करके थके-हारे घर लौटने की जल्दी में ट्रेन में बैठे अपने दोस्तों को पिकासो के नाम के आगे नतमस्तक देख कर मुझे पिकासो की कही हुई बात का जैसे जीता-जागता सुबूत मिल रहा था |

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