Sunday, October 10, 2010

ऋतु चोपड़ा की पेंटिंग्स अभिव्यक्ति के स्तर पर कहीं कहीं इंस्टालेशन का-सा आभास देती हैं

ऋतु चोपड़ा की पेंटिंग्स की 'कहे कबीर' शीर्षक से नई दिल्ली की अपर्णा कौर एकेडमी ऑफ फाइन ऑर्ट्स एण्ड लिटरेचर की कला दीर्घा में 20 अक्टूबर से आयोजित हो रही एकल प्रदर्शनी ने एक फिर कबीर की प्रासंगिकता की जड़ों के गहरे तक धंसे / जमे होने को प्रकट किया है | उल्लेखनीय है कि कबीर की रचनाएँ काव्यत्व और कथ्य की दृष्टि से तो चुनौतीपूर्ण रही ही हैं, उनकी रचनाओं को किसी भी अन्य माध्यम में ट्रांसलेट करना तो और भी अधिक चुनौतीभरा रहा है | इसके बावजूद, विभिन्न माध्यमों के प्रख्यात लोगों ने कबीर की रचनाओं को अपने-अपने तरीके से देखने / परखने और संयोजित करने के प्रयास किए हैं | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि रवींद्रनाथ टैगोर, लिंडा हेस, निनेल गफुरोवा, अली सरदार जाफ़री आदि ने कबीर के पदों को चुन चुन कर अपनी-अपनी भाषाओं में अनुदित किया है और कुमार गंधर्व जैसे महान गायक ने अपने तड़प भरे, आहाल्दक और प्राण उड़ेलने वाले स्वर में उन्हें गाया है | इसका कारण कबीर के संतत्व की विरलता की बजाए उनके कवित्व की विरलता में खोजा / पाया गया है | कबीर की इसी सृजन-शक्ति ने उन्हें वर्तमान में भी प्रासंगिक बनाए रखने में सर्वाधिक भूमिका निभाई है |
युवा चित्रकार ऋतु चोपड़ा द्वारा उनकी रचनाओं के संदर्भों पर आधारित पेंटिंग्स बनाना और प्रदर्शित करना उनकी प्रासंगिकता के बने रहने का ही एक उदाहरण है | वास्तव में कबीर के कवित्व ने ही उनके दर्शन को सर्वाधिक लोक-व्याप्ति और लोक-दृष्टि दी, जिसके चलते वह आज भी प्रासंगिक और चुनौती बने हुए हैं | अलौकिक, अमूर्त वस्तु को लौकिक, मूर्त वस्तु में बदलने की अप्रतिम क्षमता कबीर में थी और कविता के लिए यह सबसे अधिक आवश्यक भी है, क्योंकि स्वयं कविता लौकिक या ऐहिक वस्तु है | ऐहिक होकर ही वह ऐसी 'आँख' बनती है जो अपनी मर्मबेधिता से आर-पार देखती है और अपने छोटे से पटल पार वे सारे दृश्य अंकित करती है जो पाठक की आँख में परावर्तित होते हैं | पारदर्शिता आखिर कहते किसे हैं - जो प्रकाश के पीछे छिपे अँधेरे को या अँधेरे के पीछे छिपे प्रकाश को देख या दिखा सकती है | कबीर की रचनाओं को प्रासंगिक बनाए रखने में वास्तव में कबीर की मानवीय व जटिल द्वंद्वपूर्ण रचना-प्रक्रिया या बुनावट का है जो उनके काव्य में साँस की तरह चलती तो है, पर दिखाई नहीं देती   है | क्योंकि यह कविता ही नहीं उनका जीवन भी है जो एक जटिल बुनावट की कहानी है |
ऋतु चोपड़ा का कबीर से परिचय हालाँकि आबिदा परवीन की आवाज़ के ज़रिये हुआ; आबिदा परवीन की आवाज़ के जादू से प्रभावित होकर उन्होंने कबीर की साखी सुनना शुरू किया तो फिर कबीर उनकी आत्मा और उनकी सोच में रचते-बसते चले गये | कबीर का आत्मा और सोच में रचना-बसना उनके केनवस पर ट्रांसफर हुआ तो उनकी पेंटिग्स एक दर्शक के रूप में हमें व्यक्तिगत आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करती हुई लगती हैं | कबीर की रचनाओं से प्रेरणा पाकर बनी-रची ऋतु की पेंटिंग्स देखते हुए हम ख़ुद को अपने अंदर देखते हुए पाते   हैं | कबीर की रचनाओं के प्रभावों और / या अर्थों को विविधतापूर्ण प्रतिरूप रचते हुए ऋतु चाक्षुक बिम्ब की भाषा में ढालती हैं | ऋतु की पेंटिंग्स में प्रकट होने वाली आकृतियाँ और वह परिदृश्य जिसमें वे स्थित हैं, किसी पूर्वस्मृति की आभा से दीप्त लगती हैं | पेंटिंग्स के फ्रेम में जो कहा गया बताया गया है या लगता है, कई बार हम अपने आप को उस फ्रेम से बाहर जाते हुए भी पाते हैं | ऋतु भले ही यह कह रहीं हों कि फलाँ पेंटिंग कबीर के फलाँ दोहे या साखी पर आधारित है, पर उनकी पेंटिंग में कबीर की सारी सोच और उनका सारा दर्शन प्रतिध्वनित हो रहा होता है | शायद यही कारण है कि ऋतु की पेंटिंग्स अभिव्यक्ति के स्तर पर कहीं कहीं इंस्टालेशन का-सा आभास देती हैं | उनकी पेंटिंग्स में - दूसरी, तीसरी, चौथी ....बार देखे जाने पर अनुभव स्थानांतरित होते जाते हैं, बदलते जाते हैं और वह जैसे एक फ्रेम में होने के बावजूद स्पेस में होने का आभास देते हैं |
ऋतु चोपड़ा को कला का संस्कार उज्जैन में   मिला | कला की उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त की है, लेकिन कला के प्रति अपनी अभिरुचि को देखते हुए जब उन्हें लगा कि उन्हें कला के तकनीकी पक्ष से भी परिचित होना चाहिए तो कला की प्राथमिक शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए उन्होंने कला शिक्षक और कलाकार चंद्रशेखर काले से मार्गदर्शन प्राप्त   किया | इस बीच लिंडा हेस की पुस्तक 'सिंगिंग एम्प्टीनेस' उन्होंने पढ़ी, जिसने ऋतु को स्व से परिचित कराया | लिंडा हेस ने भारत के संत काव्य का विषद अध्ययन किया है और उनके उस विषद अध्ययन को देख / जान कर ऋतु ने जीवन और समाज को आध्यात्मिक नज़रिए से देखना / पहचानना शुरू किया | यह आध्यात्मिक नजरिया कब उनकी पेंटिंग्स में आ पहुँचा, और पेंटिंग्स में अभिव्यक्त होने वाले विषयों, विवरणों, रूपों व रंगों को निर्देशित व नियंत्रित करने लगा, यह ख़ुद उन्हें भी पता नहीं चला | उनके आध्यात्मिक नज़रिए में जो मानवीय पक्ष रहा, वह उन्हें कबीर के पास ले आया | कबीर के दोहे व साखियाँ वह प्रतिदिन रेडियो पर सुबह सुनती ही थीं | ऋतु की पेंटिंग्स के विषय अध्यात्म से जुड़े तो थे ही: लिहाजा धीरे-धीरे कबीर की रचनाओं ने उनके केनवस पर जगह बना ली | 1966 में जन्मी और उज्जैन जैसे कला व अध्यात्म से परिपूर्ण शहर में पली-बढीं ऋतु ने उज्जैन के अलावा देवास, इंदौर, जबलपुर, पुणे, मुंबई, नोएडा आदि में आयोजित समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | वह उज्जैन और दिल्ली में अपनी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनियाँ भी कर चुकीं हैं | इसी वर्ष मई व जुलाई के बीच अमेरिका के सनफ्रांसिस्को में आयोजित हुई एक बड़ी समूह प्रदर्शनी में भी उनकी पेंटिंग्स प्रदर्शित हुईं |
ऋतु चोपड़ा की अपर्णा कौर एकेडमी ऑफ फाइन ऑर्ट्स एण्ड लिटरेचर की कला दीर्घा में 20 अक्टूबर से आयोजित हो रही तीसरी एकल प्रदर्शनी उनकी कला-यात्रा के नए आयामों से परिचित होने का मौका तो हमें देगी ही, कबीर की रचनात्मक प्रासंगिकता का एक और उदाहरण व सुबूत भी प्रस्तुत करेगी |

Sunday, August 8, 2010

देविबा वाला की कला यथार्थ की नई पहचान तथा यथार्थ के प्रति नई दृष्टि का अनुभव कराती है

मास्को स्थित रूस के भव्य पैलेस म्यूजियम में अभी हाल ही में आयोजित 'मास्को इंटरनेश्नल यंग ऑर्ट बिनाले 2010' में देविबा वाला के काम को चुने जाने की जानकारी ने मुझे इस कारण से खासा रोमांचित किया क्योंकि देविबा की कलाकृतियों को मैंने उस साधक की तरह देखा/पहचाना है जो कुछ भी एप्रोप्रियेट नहीं करता | एप्रोप्रियेट करना जैसे उनका धर्म ही नहीं है | उनका धर्म जैसे अज्ञात की खोज है, उस अज्ञात की जिसके बारे में कोई भी न सचेत है और न उत्सुक | और इसीलिए वह किसी चीज़ को, किसी अनुभव को डिस्कवर नहीं करतीं; वह उस अनुभव को रोशनी में लाती हैं जो अब तक अँधेरे में छिपा था | देविबा ने अपने चित्रों के बारे में ख़ुद भी कहा है कि वह कुछ कहते नहीं हैं, बल्कि देखने वाले को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं | क्या सोचने के लिए प्रेरित करते हैं ? इसका जबाव न देविबा देती हैं, और न उनके चित्र | वास्तव में यही वह 'बात' है जो उनके काम को खास बनाती है | उनका काम एक पहेली से हमारा सामना कराता है : कभी हमने सोचा है, हम कहाँ होते हैं जब हम सोच रहे होते हैं ? बहुत सोच-विचार के बाद भी हम ज्यादा से ज्यादा यही कह सकते हैं कि वह चुप्पी की जगह होती है, मौन का एक ठौर जहाँ बहुत से ख्यालों, बहुत सी स्मृतियों, बहुत से दिवास्वप्नों की आवाजाही होती रहती है; और हम अतीत-वर्तमान-भविष्य के भंवर में गोते लगते रहते हैं | वह है क्या या वहाँ होता क्या है, इसका सीधा-सपाट जबाव देने में हमें यदि उलझन होती है तो इसलिए क्योंकि हम तर्कशील मानसिकता में जकड़े होते हैं जो हमें अनुभव को अलग-अलग रूपों में देखने के लिए तैयार करती है | देविबा का काम हमें इस तर्कशील मानसिकता की जकड़न से बाहर आने को प्रेरित करता है | हम यदि उस जकड़न से बाहर आ पायेंगे, तभी देविबा के काम के सामने खड़े रह पायेंगे, अन्यथा उन पर एक उचटती सी नज़र डाल कर आगे बढ़ जायेंगे | 
 'मास्को इंटरनेश्नल यंग ऑर्ट बिनाले 2010' में देविबा वाला के साथ भारत के 11 और जिन युवा कलाकारों के काम को चुना गया, उनमें एक अर्पित बिलोरिया के काम से मैं परिचित रहा हूँ | इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानूँगा कि बाकी 10 कलाकारों की कृतियों से मेरा परिचय नहीं है | मास्को बिनाले के लिए 35 देशों से आईं 2500 कलाकृतियों में भारत के जिन 12 युवा कलाकारों की 40 कृतियों को चुना गया, उनमें देविबा वाला और अर्पित बिलोरिया के साथ अजय राजपुरोहित, हितेंद्र भाटी, सुकेशन कंका, पद्मिनी मेहता, संजय सोनी, शरद भारद्वाज, सैयद अकबर अली, तेजसिंह जोसेफ, उमेश प्रसाद तथा विपुल प्रजापति के काम मास्को स्थित रूस के भव्य पैलेस म्यूजियम में सुशोभित हुए | मास्को बिनाले में देविबा के काम को चुने जाने को एक उदाहरण के रूप में देखते हुए मैं वहाँ प्रदर्शित काम की प्रखरता तथा स्तरीयता का आश्वस्त करने योग्य अनुमान लगा सकता हूँ |
देविबा वाला के काम के प्रति मेरी दिलचस्पी और आश्वस्ति का एक प्रमुख कारण यह रहा कि उनके काम को जब जब भी देखने का मौका मिला, मैंने अपनी सोच में अस्तित्व को एक अनूठे रूप में प्रस्फुठित होते हुए पाया | देविबा के चित्रों में 'अस्तित्व' की जो झलक 'दिखती' है उसे ज्ञान से एक्ज़्हास्ट करने की कोई कोशिश चित्रों में नहीं नज़र आती है, बल्कि उनमें एक रहस्य जैसा दिखता है | मुझे लगता है कि 'ज्ञान' यदि उनमें होता तो एक तरह के एपोरिया का अनुभव करता | देविबा ने जिस तरह से अपने चित्रों को आकार दिए हैं, उनमें ज्ञान असंभव ही होता और वह एक तरह की इनएक्सेसिबिलिटी का ही अनुभव करता | देविबा के चित्रों में मुझे अनुभूति ज्ञान की जगह लेती हुई नज़र आती है जो अपने आप में बुनियादी तौर पर अधूरापन महसूस कराती है | अनुभूति की अर्हता इसी बात में है कि अनुभूति के क्षण में हमें अपना समस्त ज्ञान अधूरा लगने लगता है | दरअसल इसी कारण देविबा की पेंटिंग्स मुझे एक चुनौती की तरह लगती हैं और मैं बार-बार उनके सामने आने को प्रेरित होता हूँ |

देविबा ने जो यह ख़ुद माना/कहा है कि उनके चित्र देखने वाले को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, उसे लेकर मेरा अनुमान है कि उनका आशय थिंकिंग के फॉर्मलाइज्ड थिंकिंग में बदलने से नहीं होगा; क्योंकि वह चीज़ अनुभव में सोच की प्रक्रिया को वाधित करती है | अनुभव में सोच का अर्थ मेरे लिए यह है कि अनुभव करते हुए ही रिफ्लेक्ट करना कि मैं क्या कर रहा हूँ | एकदम शुरू में हो सकता है कि रिफ्लेक्शन साफ-साफ न हो सके, चीज़ों को हम बहुत कुछ इंट्यूटिवली एप्रिहेंड करते हैं, दो और दो चार के लगे-बंधे नियम के आधार पर नहीं करते | कल्पना अपनी छलांग के बीच के रास्ते को लाँघ जाती है | यह विज्ञान में भी होता है, और कला में भी | मुझे लगता है कि ये सब चीज़ें हमारे जीवन में महत्त्व रखती हैं, जिसका अहसास देविबा की कला कराती है | जीवन को प्रभावित करने वाली चीजों को, यानि यथार्थ को जानने/पहचानने के लिए किए गए प्रयत्नों में पाया गया कि यथार्थ की तद्भव पहचान संभव नहीं है | माना गया है कि हम जिस किसी भी माध्यम से यथार्थ को पहचानने का उपक्रम करते हैं उस माध्यम का होना ही यथार्थ के हमारे ग्रहण को, हमारी पहचान को अनिवार्यतः प्रभावित करता है |

देविबा के चित्रों का संदर्भ ले कर मैं कहना चाहूँगा कि उनमें हम जो कुछ जान या अनुभव कर पाते हैं वह कोई निरपेक्ष यथार्थ नहीं, हमारे माध्यम की प्रकृति से रूपांतरित यथार्थ होता है | दूसरे शब्दों में, यथार्थ की पहचान की हमारी प्रक्रिया ही हमारा यथार्थ हो जाती है; बल्कि तब वह यथार्थ की पहचान की नहीं, यथार्थ के सृजन की प्रक्रिया हो जाती है और हम उसी का संप्रेषण कर रहे होते हैं | देविबा के काम को जब-जब भी देखने का मौका मिला, तब-तब मैंने महसूस किया कि जैसे जब भी हम यथार्थ की कोंई नई पहचान, यथार्थ के प्रति किसी नई दृष्टि का अनुभव करते हैं तो वास्तव में समूचे यथार्थ का, यथार्थ के हमारे समूचे बोध का नया सृजन कर रहे होते हैं | इसीलिए देविबा की कृतियों से साक्षात्कार के बाद हम वही नहीं रह जाते, हमारा बोध वही नहीं रह जाता - और हम क्या हैं सिवा इस बोध के - जो पहले था ? अपने परिवेश सहित हम नये सिरे से रचे गए हो जाते हैं | देविबा की कला सिर्फ एक कलागत प्रयोग नहीं रह जाती; बल्कि वह हमारी संपूर्ण कला-दृष्टि, कहना चाहिए कि कला के माध्यम से हमारे संपूर्ण यथार्थ-बोध की नयी रचना कर देती है | इसीलिए देविबा की कला एक दर्शक के रूप में हमें आश्वस्त भी करती है और हमारे सामने चुनौती भी प्रस्तुत करती है |
[ आलेख के साथ दिए गये चित्र
'मास्को इंटरनेश्नल यंग ऑर्ट बिनाले 2010' में प्रदर्शित देविबा वाला की पेंटिंग्स के हैं | ]

Monday, June 21, 2010

जन्मदिन के मौके पर, जगदीश स्वामीनाथन को याद करते हुए

आज का मेरा दिन प्रखर चित्रकार और बुद्विजीवी जगदीश स्वामीनाथन के नाम रहा | यह याद करते हुए कि आज स्वामीनाथन का जन्मदिन है, मैंने आज का दिन विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा इंटरनेट पर उपलब्ध स्वामीनाथन की पेंटिंग्स के चित्रों को देखते हुए और उनके बारे में छपी/लिखी सामग्री को पढ़ते हुए बिताया | स्वामीनाथन का जन्म वर्ष 1928 में आज के ही दिन शिमला में बसे एक तमिल परिवार में हुआ था | यह जान कर मुझे किंचित हैरानी भी हुई कि चित्रकला में उनकी दिलचस्पी यूँ तो बचपन से ही थी, लेकिन इसे गंभीरता से उन्होंने बहुत बाद में अपनाया | गंभीरता से उन्होंने पहला काम दिल्ली के हिंदू कॉलिज से प्री-मेडीकल की पढ़ाई का किया, पर इसमें ज्यादा दिन उनका मन नहीं लगा | पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में उनका रुझान पैदा हुआ | राजनीतिक जीवन की शुरूआत उन्होंने कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी से की और फिर कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए | राजनीतिक जीवन में ही उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता भी की और बच्चों के लिये कहानियां भी लिखीं | राजनीति से मोहभंग होने के बाद उन्होंने चित्रकला की तरफ कदम बढ़ाया और गंभीरतापूर्वक चित्रकला में रम गये | चित्रकला अपनाने के दौरान उन्होंने कुछ समय हालाँकि पत्रकारिता भी की और काफी कविताएँ भी लिखीं, लेकिन उनकी सक्रियता का मुख्य केंद्र चित्रकला ही रही | चित्रकला संसार में स्वामीनाथन की सक्रियता एक विचारोत्तेजक और उत्कट घटना की तरह देखी/पहचानी गई | जगदीश स्वामीनाथन के जन्मदिन के मौके पर आज उनकी रचनाओं से आमना-सामना करते हुए मैं उनकी 'दूसरा पहाड़' शीर्षक कविता को बार-बार याद करता रहा जो करीब तीस वर्ष पहले लिखी तथा प्रकाशित हुई थी | यहाँ मैं उनकी इस 'दूसरा पहाड़' शीर्षक कविता को दोहराना चाहूँगा :
यह जो सामने पहाड़ है
इसके पीछे एक और पहाड़ है
जो दिखाई नहीं देता
धार धार चढ़ जाओ इसके ऊपर
राणा के कोट तक
और वहाँ से पार झाँको
तो भी नहीं
कभी कभी जैसे
यह पहाड़
धुंध में दुबक जाता है
और फिर चुपके से
अपनी जगह लौट कर ऐसे थिर हो जाता है
मानों कहीं गया ही न हो
- देखो न
वैसे ही आकाश को थामे खड़े हैं दयार
वैसे ही चमक रही है घराट की छत
वैसे ही बिछी हैं मक्की की पीली चादरें
और डिंगली में पूंछ हिलाते डंगर
ज्यों के त्यों बने हैं, ठूँठ सा बैठा है चरवाहा 
आप कहते हो, वह पहाड़ भी
वैसे ही धुंध में लुपका है, उबर जायेगा
अजी जरा आकाश को तो देखो
कितना निम्मल है
न कहीं धुंध न कोहरा न जंगल के ऊपर अटकी
कोई बदल की फुही
वह पहाड़ दिखायी नहीं देता महाराज
उस पहाड़ में गूजरों का एक पड़ाव है
वह भी दिखाई नहीं देता
न गूजर, न काली पोशाक तनी
कमर वाली उनकी औरतें
न उन के मवेशी न झवड़े कुत्ते
रात में जिनकी आँखें
अंगारों सा धधकती हैं

इस पहाड़ के पीछे जो वादी है न महाराज
वह वादी नहीं, उस पहाड़ की चुप्पी है
जो बघेरे की तरह घात लगाये बैठा है

Monday, May 31, 2010

अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है

अमी चरणसिंह तीन सीरीज़ में मुक्तिबोध की कविता 'मुझे क़दम-क़दम पर चौराहे मिलते हैं' को लेकर जो चित्र-रचना कर रहे हैं, उसके कुछेक चित्र अभी हाल ही में देखने को मिले तो मुझे बरबस ही कला-रूपों के अंतर्संबंधों पर महादेवी वर्मा की 'दीपशिखा' की भूमिका याद आ गई जिसमें उन्होंने लिखा था कि 'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता   है |' इस क्षमता के बावजूद, हालाँकि आधुनिक कविता और चित्रकला के बीच रिश्ता पिछले वर्षों में कमजोर पड़ता गया है | ऐसे में अमी चरणसिंह का मुक्तिबोध की कविताओं में व्यक्त हुए भाषा के परे के बिम्बों व छवियों के चित्रांकन के लिये प्रेरित होना उत्साह भी जगाता है और आश्वस्त भी करता है | अमी चरणसिंह पिछले करीब तीन वर्ष से भारत के एक महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की उक्त कविता को विभिन्न रूपों में चित्रित कर रहे हैं | पहले उन्होंने पेपर पर दो-एक रंगों में एक्रिलिक से काम किया, फिर कई रंगों में काम किया और हाल ही में उन्होंने पेपर पर ऑयल से उक्त कविता को 'देखा' | अमी चरणसिंह ख़ुद भी कविताएँ लिखते हैं और उनकी कविताएँ पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं हैं |
अमी चरणसिंह ने चित्र-रचना और कविता लिखने का काम अपने जीवन में हालाँकि देर से शुरू किया - इतनी देर से कि उनके कॉलिज के साथियों को हैरान होकर उनसे पूछना पड़ा कि 'यह' सब कब हुआ ? कला की दुनिया में अमी चरणसिंह की सक्रियता कला समीक्षक के तौर पर शुरू हुई थी | हालाँकि इससे पहले, कॉलिज के दिनों में उन्होंने प्रसिद्व चित्रकार भाऊ समर्थ पर एक किताब का संपादन किया था | कला प्रदर्शनियों के साथ-साथ उन्होंने फिल्मों पर भी समीक्षात्मक रिपोर्ट्स लिखीं; और फिर वह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाने लगे | उन्होंने कला और कलाकारों पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाईं | यही सब करते हुए वह कब चित्र बनाने लगे, यह दूसरों को तो क्या शायद उन्हें भी पता नहीं चला | जब 'पता' चला तब उन्होंने चित्र-रचना के काम को गंभीरता से लेना शुरू किया | मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में अपने चित्रों को प्रदर्शित करने के साथ-साथ उन्होंने दिल्ली व मुंबई में भी अपने चित्रों को प्रदर्शित किया है | मुक्तिबोध की कविता पर अमी चरणसिंह ने जो चित्र बनाए हैं उनमें चित्रकला की जटिल शास्त्रीयता भी है, और इसीलिए यह उल्लेखनीय भी हैं | मुक्तिबोध की कविताओं पर फिल्में भी बन चुकीं हैं, जिन्हें प्रसिद्व फिल्म निर्माता मणि कौल ने संभव किया था | ज़ाहिर है कि मुक्तिबोध की कविताएँ दूसरे कला माध्यमों में काम करने वाले कलाकारों के लिये प्रेरणा और चुनौती की तरह रहीं हैं | अमी चरणसिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया और निभाया, तो यह कला के प्रति उनकी प्रतिबद्वता का सुबूत भी है | 
अमी चरणसिंह ने कला के प्रति अपनी प्रतिबद्वता का सुबूत प्रस्तुत करते हुए वास्तव में हिंदी की कला-चिंतन की उस समृद्व परंपरा को ही निभाने की कोशिश की है, जिसके तहत अनेक कवि-कथाकारों ने चित्रकला में भी अपनी सक्रियता रखी और दिखाई है | महादेवी वर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, जगदीश गुप्त, रामकुमार, लक्ष्मीकांत वर्मा, चंद्रकांत देवताले, विपिन अग्रवाल, विजेंद्र, नरेन्द्र जैन आदि कुछ नाम तुरंत याद आ रहे हैं - नाम और भी हैं तथा इस सूची को और बढाया जा सकता है | मकबूल फ़िदा हुसैन, गुलाम मोहम्मद शेख, जगदीश स्वामीनाथन, जय झरोटिया जैसे मशहूर चित्रकारों ने कविताएँ भी लिखीं | मुझे याद आया कि ऑल इंडिया फाइन ऑर्ट एण्ड क्रॉफ्ट सोसायटी (आइफैक्स) ने कई वर्ष पहले कविता लिखने वाले चित्रकारों के काव्यपाठ का कार्यक्रम आयोजित किया था | कवियों द्वारा चित्रकारों और या उनके चित्रों पर कविताएँ लिखने के तो असंख्य उदाहरण मिल जायेंगे | इसका उल्टा भी खूब हुआ है | चित्रकारों ने कविताओं को केनवस पर उतारने में भी काफी दिलचस्पी ली हैं | कालिदास की प्रसिद्व काव्य-कृति 'मेघदूत' चित्रकारों को शुरू से ही आकर्षित करती रही है | 'बिहारी सतसई' ने अनेक चित्रकारों को अपनी ओर आकर्षित किया | यहाँ यह याद करना भी प्रासंगिक होगा कि पिकासो से कवियों के कितने गहरे रिश्ते थे और नये काव्यान्दोलनों को जन्म देने में उसके अभिनव प्रयोगों की क्या भूमिका थी | गुलाम मोहम्मद शेख ने कविताएँ तो लिखी हीं, कबीर की कविताओं पर एक पूरी श्रृंखला भी बनाई थी | विवान सुन्दरम ने कई कविताओं पर पेंटिंग्स बनाई हैं | जय झरोटिया ने सौमित्र मोहन की 'लुकमान अली' कविता पर एक पूरी श्रृंखला बनाई थी | अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त करने के लिये शब्दों के अतिरिक्त रंगों और रेखाओं का सहारा लेने का उपक्रम सिर्फ हिंदी के लेखकों ने ही नहीं किया है, बल्कि अन्य भाषों के लेखकों के बीच भी इस तरह के उदाहरण मिल जायेंगे | यहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर को याद करना प्रासंगिक होगा | फ्रांसीसी कवि एपोलिनेयर और आंद्रे ब्रेतों ने तो अपने समय के प्रसिद्व अतियथार्थवादी (सुर्रियलिस्ट) कला-आंदोलन में खासी सक्रियता दिखाई थी |
कविता, भाषा और मानवीय अनुभवों की प्रतीकात्मक दुनिया है | चित्रकला इस प्रतीकात्मक दुनिया को चाक्षुषता से जोड़ कर दृश्य में रूपांतरित करते हुए प्रभावोत्पादक ढंग से अधिक स्पष्ट और सम्प्रेषणीय बना सकती है | कविता शब्दों का संसार अवश्य है; किंतु साहित्य में कविता ही ऐसी विधा है जिसमें शब्दों का अतिरिक्त अर्थ बहुत अधिक होता है | वह अनुभव, यथार्थ, स्मृति, कल्पना और स्वप्नों की सांकेतिक बुनावट के साथ ही द्वंद्व, तनाव, व्यंग्य और यातना की विस्फोटक दुनिया भी है | चित्र में उसे साधना स्वाभाविक रूप से एक बड़ी चुनौती है - तब तो और भी जबकि कवि-कर्म और चित्र-रचना दोनों ही व्यक्तिगत साधना की चीज़    हैं | भले ही - जैसा कि महादेवी वर्मा ने कहा है कि - 'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता है', लेकिन फिर भी उनमें एक के दूसरे पर प्रभाव तलाशने की कोशिश फिजूल की बात ही समझी जाती है | कवि-कर्म और चित्र-रचना एक दूसरे को प्रभावित और प्रेरित तो करते हैं तथा उनमें संबंध भी होता है; लेकिन कविता कविता का काम करती है, और चित्र चित्र का | दोनों का काम और प्रभाव अलग-अलग ही होगा | इसीलिए मुक्तिबोध की कविता पर बनाए गये अमी चरणसिंह के चित्रों को देखते हुए मैं उनमें मुक्तिबोध की कविता को नहीं अमी चरणसिंह की रचनात्मकता को समझने / पहचानने की कोशिश करता हूँ - ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान यूँ भी मुक्तिबोध के ही दिये गये पद हैं |
मध्यकाल के बाद और खासतौर से उत्तर मध्यकाल के बाद चित्रकला व कविता के बीच जो प्रभावपरक रिश्ता बना था वह आधुनिक परिवेश में किसी नवोत्थान के साथ आगे नहीं बढ़ सका और धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया | उक्त रिश्ता कमजोर जरूर पड़ गया है, पर पूरी तरह बिसरा नहीं है; और उस रिश्ते को नये रूप में खोजने / बनाने के प्रयास भी जारी दिखते ही हैं | ऐसे में, मुक्तिबोध की कविताओं पर अमी चरणसिंह का सीरीज़ में काम करना - मैं फिर दोहराना चाहूँगा कि - आश्वस्त करता  है |

Tuesday, May 11, 2010

पारुल की चित्रकृतियों में रूपकालंकारिक छवियों को बहुत सूक्ष्मता के साथ विषयानुरूप चित्रित किया गया है

त्रिवेणी कला दीर्घा में 28 मई से शुरू हो रही पारुल आर्य के चित्रों की 'अ मैटर ऑफ फेथ' शीर्षक एकल प्रदर्शनी में व्यक्ति के विश्वास के विविधतापूर्ण रूपों की अभिव्यक्ति को देखा जा सकेगा | पारुल के चित्रों की यह चौथी एकल प्रदर्शनी है, जो करीब तीन वर्ष बाद हो रही है | इससे पहले, सितंबर 2007 में 'नेचर' शीर्षक से उनके चित्रों की तीसरी एकल प्रदर्शनी हुई थी | उससे पहले, वर्ष 2006 तथा वर्ष 2004 में क्रमशः 'एक्सप्रेशंस' तथा 'सिटी स्पेस' शीर्षक से उन्होंने अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनी की थी | इस बीच अमेरिका के कोलंबिया में पोर्टफोलिओ आर्ट गैलरी में भी कला प्रेक्षकों व दर्शकों को उन्होंने अपने चित्रों को दिखाया है | 'ह्युमनिटी चैलेंजेड' शीर्षक से नई दिल्ली की ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में आयोजित हुई एक समूह प्रदर्शनी में भी पारुल ने अपने चित्रों को प्रदर्शित किया था | पारुल को अपनी कला प्रतिभा को निखारने तथा उसे वैचारिक स्वरूप प्रदान करने का मौका उस समय मिला, जब उन्होंने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविधालय से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया | कला की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के साथ पारुल ने अपनी जिस कला-यात्रा को समकालीन कला जगत में विधिवत रूप से शुरू किया, उसमें उन्होंने प्रायः एक दार्शनिक भावभूमि पर खड़े होकर ही अपने चित्रों की रचना की है | पारुल आर्यकी सिटी स्पेस श्रृंखला की 'सिटी ऑफ कलर्स', 'पर्पल हेज', 'रिफ्लेक्शन ऑफ नाईट', 'इन द लैंपलाइट' शीर्षक चित्रकृतियाँ तथा ह्युमनिटी चैलेंजेड श्रृंखला की 'द सर्च', 'इयरिंग', 'माई इंसपिरेशन', 'होप' शीर्षक चित्रकृतियाँ न केवल अपनी अंतर्वस्तु में महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं, बल्कि फॉर्म में भी महत्त्वपूर्ण हैं |
इनके अलावा 'डिवोशन', 'वाइल्ड फैंटेसी', 'सन एण्ड लीव्स', 'ए ट्री बाय माई विंडो' शीर्षक चित्रकृतियों में भी गंभीर दार्शनिक विमर्शों को पारुल ने जिस तरह चित्रित किया है, उसके चलते ही उन्हें युवा कलाकारों के बीच एक अलग पहचान मिली है | 'अ मैटर ऑफ फेथ' शीर्षक की चित्रकृतियों में जीवन के द्वैत को बखूबी दर्शाया गया है | जीवन के द्वंद्वात्मक स्वरूप को चित्रित करती ये कलाकृतियाँ पारुल की रचनात्मकता के एक नये आयाम से हमारा परिचय कराती हैं | इन चित्रकृतियों में रूपकालंकारिक छवियों को बहुत सूक्ष्मता के साथ विषयानुरूप चित्रित किया गया है | उनकी कला यात्रा के इस चरण की चित्रकृतियों का चरित्र रूपकालंकारिक तो है ही, साथ ही वह रेटॉरिकल भी है | पारुल की पेंटिंग्स से गुज़रना अपने आस-पास की दुनिया को अपने भीतर जगह बनाते हुए महसूस करते गुज़रने जैसा है, और इस तरह एक अलग अनुभव देता है | यूं तो प्रत्येक कलाकार के लिये यह अभीष्ट है कि वह अपनी विशिष्टताओं और सृजन शैली के माध्यम से एक भिन्न तरह की कला का सृजन      करे | वास्तव में यह सचमुच की जीती जागती दुनिया का ही कलात्मक प्रत्याख्यान होता है जिसमें उस कलाकार की अपनी जीवन-दृष्टि, संवेदना और अनुभव समाहित होते हैं |
पारुल के कुछेक काम एक चेहरे के इर्द-गिर्द हैं - अपने रूपों, विरूपणों और विकृतियों में व्यक्त होता एक मानवीय चेहरा | लेकिन उनके कई कामों में मानवीय चेहरे या आकृतियों के साथ वाहय-जगत की उपस्थिती भी दिखती है | यह वाहय-जगत कभी व्यक्ति (चेहरे) के कंट्रास्ट में है, कभी द्वंद्व में तो कभी सहयोजन में | व्यक्ति के आभ्यंतर और वहिर्जगत का संबंध पारुल के चित्रों में अनेक रूपाकारों में तो दर्ज है ही, उसे उनके अमूर्त चित्रों में भी पहचाना जा सकता है | पारुल के चित्रों का प्रतिसंसार एक ओर मनुष्य के अंतर्जगत की उथल-पुथल को रूपायित करता है, तो दूसरी ओर व्यक्ति को बाहय-परिवेश से द्वंद्वरत दिखाता है | पारुल के चित्रों की विवरण-बहुलता एक खास अर्थवत्ता रखती है और इसी कारण से हमें हमारे विश्वासों और हमारे आसपास की स्थितियों के प्रति सोचने-विचारने के लिये प्रेरित करती है |
28 मई से नई दिल्ली की त्रिवेणी कला दीर्घा में शुरू हो रही 'अ मैटर ऑफ फेथ' शीर्षक एकल प्रदर्शनी में पारुल आर्य के चित्रों को 6 जून तक देखा जा सकेगा |

Friday, May 7, 2010

रवीन्द्रनाथ टैगोर के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं

रवीन्द्रनाथ टैगोर की आज 150 वीं वर्षगांठ शुरू हो रही है | 7 मई 1861 को जन्मे रवीन्द्रनाथ ने अस्सी वर्ष की उम्र पाई थी | 7 अगस्त 1941 को अंतिम साँस लेने से पहले एक हजार से ज्यादा कविताओं, दो हजार से ज्यादा गीतों, करीब दो दर्जन नाटकों, आठ उपन्यासों, कहानियों के आठ से ज्यादा संकलनों, राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक-साहित्यिक विषयों पर लिखे तमाम लेखों की रचना करने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर को जानने वाले लोगों में बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि उन्होंने करीब 2500 पेंटिंग्स व स्केचेज भी बनाए हैं, जिनमें से 1500 से कुछ ज्यादा शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविधालय के संग्रहालय में देखे जा सकते हैं | वर्ष 1913 में 52 वर्ष की उम्र में साहित्य के लिये नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाले रवीन्द्रनाथ के चित्रों की पहली प्रदर्शनी वर्ष 1930 में जब हुई थी, तब वह 69 वर्ष के थे | दिलचस्प संयोग है कि 80 वर्ष पहले पेरिस में हुई रवीन्द्रनाथ के चित्रों की यह पहली प्रदर्शनी इन्हीं दिनों हुई थी | 5 मई से 19 मई 1930 के बीच हुई प्रदर्शनी की इतनी जोरदार चर्चा हुई कि इसके तुरंत बाद यह प्रदर्शनी कई यूरोपीय देशों में हुई | भारत में उनके चित्रों की पहली प्रदर्शनी पेरिस में हुई प्रदर्शनी के ठीक एक वर्ष बाद, वर्ष 1931 में कलकत्ता में हुई |
रवीन्द्रनाथ में चित्रकला के प्रति यूं तो बचपन से ही उत्सुकता का भाव था | अपने बड़े भाई ज्योतिरिन्द्रनाथ को स्केच बनाते देख वह ड्राइंग के प्रति आकर्षित व प्रेरित हुए थे और बचपन में उन्होंने कुछेक ड्राइंग व स्केच बनाए भी थे | उन दिनों उन्हें चूंकि सभी कुछ आकर्षित करता था और अपनी बहुआयामी प्रतिभा के कारण वह अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों में सक्रिय हो रहे थे, इसलिए चित्रकला की औपचारिक शिक्षा वह नहीं ले सके |
इसके बावजूद चित्रकला के प्रति अपनी अदम्य आकांक्षा से वह मुक्त नहीं हो सके और रेखांकन व चित्रांकन, रंग और रूप उनको हमेशा ही सहज भाव से उल्लसित तथा उद्वेलित करते रहे | इसी का नतीजा रहा कि जब भी और जैसे भी उनको यह अंतर्प्रेरणा मिली कि वह चित्रों के माध्यम से अपनी गहनतम अनुभूतियों को बहिर्गमित कर सकते हैं, उन्होंने निहायत सरलता व सुगमता से अपना मंतव्य पूरा कर लिया | चित्रकला के संदर्भ में उनकी सृजनात्मक ऊर्जा इतने तीव्र आवेगात्मक रूप में अवतरित हुई कि उसने उन्हें जानने वालों के साथ-साथ ख़ुद उन्हें भी चकित और स्तंभित किया | उन्होंने कहा भी है कि चित्रकला के लिये उन्हें जो मौका मिला वह परमपिता से उन्हें अतिरिक्त जीवन के रूप में मिला | रवीन्द्रनाथ ने कला की कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं की थी, लेकिन अपनी इस कमी को उन्होंने अपने लिये एक अवसर में बदल दिया और रंग व रेखाओं की अभिव्यक्ति में उन्होंने नये और अभिनव आवेगपूर्ण प्रयोग किए | यह प्रयोग वह इसलिए भी कर सके क्योंकि बंगाल चित्रशैली से वह नितांत अपरिचित व अछूते ही थे | इस अछूतेपन के कारण ही वह बंगाल चित्रशैली को उसकी जड़ और रूढ़ मान्यताओं से मोक्ष दिलवा सके | यह काम रवीन्द्रनाथ जैसी प्रतिभा के लिये ही संभव था | उनके इन्हीं आवेगपूर्ण प्रयोगों के चलते रवीन्द्रनाथ की कला-भाषा का त्वरित किंतु क्रमिक विकास हुआ | रवीन्द्रनाथ ने अपने अंतर्जगत को आलोकित करने के लिये जिस समय चित्रकला को चुना था, उस समय तक वह एक महान कवि और प्रखर दार्शनिक के रूप में अपनी प्रभावी पहचान बना चुके थे | ज़ाहिर है कि एक कवि और दार्शनिक के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ दे देने के बाद भी उनके अंतर्जगत में संवेगों का खजाना अभी बाकी था जो रूपायित होने के लिये एक भिन्न माध्यम पर सवार होने का इंतजार कर रहा था | रवीन्द्रनाथ ने इस भिन्न माध्यम के रूप में चित्रकला को पहचाना और कला-जगत को अनेकानेक अमूल्य निधियाँ प्रदान कीं |
रवीन्द्रनाथ के चित्रों से स्थापित कृतियों जैसी परिपूर्णता की मांग करना अन्याय ही होगा, क्योंकि उनकी चित्र-कृतियाँ वृद्वावस्था के तथा एक ऐसे हाथ के काम हैं जो कलागत अनुशासन से सर्वथा अनभिज्ञ था | इसका अभाव उनकी विशेषता का अंग है, जिसमें विसंगति, दृष्टि व रूपरंग की न होकर, रूपरंग और प्रस्तुति की है | यह अभाव स्वयं रूपभाषा में ही एक प्रकार की कारुणिकता उत्पन्न करता है | अपने काम की समस्त मांगें पूरी कर रवीन्द्रनाथ जब काम की तन्मयता से बाहर आते थे तब वह काम की प्रासंगिकता पर सोचते निश्चय ही थे | फिर भी वह जो काम कर रहे थे वह उन्हें करना ही था, क्योंकि मनोवेगों की अनिवार्यता ने उनके हाथ की शक्ति-सीमाओं पर अधिकार कर लिया था | इसके चलते रवीन्द्रनाथ रचना प्रक्रिया की लय और तर्कसंगति के अनुकूल काम करने को 'विवश' थे | इस पूरी प्रक्रिया में वह जैसे अपने भीतर से दिशानिर्देशित थे, उन्होंने इस भीतरी निर्देशन को मानते हुए काम में हाथ लगाया, मनोवेग को एक रूपाकार में बदला और एक रूपरंग दे दिया | चित्र बन जाने पर ख़ुद रवीन्द्रनाथ भी चकित होते थे | चित्र में यद्यपि पूर्णता का अभाव रहता, पर वह पूर्ण प्रतीत होती | शायद यही कारण रहा होगा कि वह अपनी किसी चित्रकृति का शीर्षक न तो दे पाए और न ही उन्होंने दिया |
रवीन्द्रनाथ में सृजनशीलता का सीधा नाता उनके व्यक्तिगत आत्मसंलाप से था | वह वही चित्रित कर रहे थे जो वह स्वयं थे | उनकी रचनात्मक मेधा और उनके आत्म-प्रकाश के बीच में कोई छाया न थी | समस्त जीवन और उसकी क्षणभंगुरता एवं निस्सारता का भाव उनकी कृतियों में देखा जा सकता है, साथ ही जीवन और आकांक्षा के अविभक्त, स्पंदनशील रूपाकार को भी ये चित्र निरुपित करते हैं | यही उनकी कविता का भी मुख्य स्वर है | रवीन्द्रनाथ के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं | रूपों और भंगिमाओं का विस्तार अभिव्यक्ति द्वारा निर्दिष्ट होता है और जीवन की चलती-फिरती दृश्यावली इस प्रमुख धारणा के अधीन है कि जीवन की प्रत्येक घटना एक साथ मानवीय और देवीय है | रवीन्द्रनाथ की कला अपनी अकृत्रिमता, करुणा और मनोहरता से हमें उद्वीप्त करती है |

Friday, April 16, 2010

नीनू विज के चित्र लैंडस्केप का आभास देते हुए भी दरअसल जगहों, वस्तुओं, रूपों और मानसिक गतियों का एक निचोड़ हैं

नीनू विज की गुड़गाँव के एपैरल हॉउस में स्थित एपिसेंटर कला दीर्घा में 17 अप्रैल से आयोजित होने जा रही एकल प्रदर्शनी के शीर्षक 'एण्ड सो द स्टोरी गोज ....' ने मुझे हंगरी के विख्यात कला इतिहासकार आर्नल्ड हाऊजर की वह उक्ति याद दिला दी, जिसमें उन्होंने कलाकृति की तुलना दुनिया की ओर खुलने वाली खिड़की से की है | 'एण्ड सो द स्टोरी गोज ....' शीर्षक में मुझे ठीक खिड़की वाले अर्थ ही ध्वनित होते लगे हैं जो भविष्य की ओर - दुनिया की ओर खुलने का दावा या वायदा कर रहा है | नीनू विज की कलाकृतियों से मैं परिचित हूँ और उनकी कलाकृतियों को लगातार मैं देखता रहा     हूँ | नीनू पिछले काफी समय से प्रकृति-उपकरणों को लेकर ही काम कर रहीं हैं और इन उपकरणों की एक समानता के बावजूद हर बार उनके काम में एक और गहराई दीख पड़ती है | नीनू विज के कैनवस पहली नज़र में लैंडस्केप का आभास देते हैं | लेकिन उनके चित्र निरे लैंडस्केप नहीं हैं | उनके चित्रों में प्रकृति-उपकरण किसी यथातथ्य चित्रण के रूप में प्रकट नहीं हैं, बल्कि उसी रूप में वह कैनवस पर दिखते हैं, जिसमें वह उनके मन के आकाश को बदलते रहे हैं या जिस रूप में नीनू विज के मन का आकाश उनमें अपने को प्रक्षेपित करता रहा है | भीतरी-बाहरी 'दुनिया' और स्पेस के एक गहरे अंतर्संबंध को नीनू विज के चित्रों में बराबर से साफ़ देखा / पहचाना जा सकता है | इसीलिए 'एण्ड सो द स्टोरी गोज ....' शीर्षक मुझे बहुत मौजूं भी लगा और सटीक भी | इस शीर्षक के चलते, नीनू विज के पिछले काम जब मेरी स्मृति में आते गये तो सहसा आर्नल्ड हाऊजर की खिड़की वाली उक्ति याद आ गई |  
आर्नल्ड हाऊजर ने कलाकृति की तुलना जब दुनिया की ओर खुलने वाली खिड़की से करने की सोची होगी, तब उनका आशय यही रहा होगा कि देखने वाला चाहे तो सारा ध्यान खिड़की पर ही दे या बिल्कुल ही न दे | वह चाहे तो खिड़की के शीशे की गुणवत्ता, संरचना या रंग से बिना कोई मतलब रखे सीधे बाहर के दृश्य का अवलोकन करे | इस तुलना के मुताबिक, कलाकृति को अनुभवों का वाहक मात्र, खिड़की का पारदर्शी कांच या आँख का चश्मा कहा जा सकता है जिस पर पहनने वाला कोई ध्यान नहीं देता है और जो एक उद्देश्य का साधन मात्र है | इसके विपरीत, कोई चाहे तो बाहरी दृश्य को नजरंदाज करके अपना सारा ध्यान खिड़की के कांच और उसकी संरचना पर ही लगाये रह सकता है; मतलब कलाकृति को एक स्वतंत्र, अपारदर्शी रूपगत संरचना, अपने बाहर की किसी भी चीज से अलग थलग स्वयंसंपूर्ण सत्ता की तरह देख सकता है | निस्संदेह, कोई भी जब तक चाहे खिड़की के कांच पर ही टकटकी लगाये रख सकता है, लेकिन ध्यान देने की और याद रखने की बात यह है कि खिड़की बाहरी दुनिया को देखने के लिये बनी होती है |
नीनू विज के चित्रों के सामने खड़े होते ही हम अपने भीतर और बाहर 'देखने' के लिये प्रेरित होते है | नीनू विज के चित्रों में हर बड़ी-छोटी चीज का रचनात्मक इस्तेमाल होता हुआ दिखता है : जितना ध्यान उन्होंने किसी रंग की व्याप्ति पर दिया है, उतना ही उस छोटे से रंग क्षेत्र पर या रंगतों पर भी दिया है जो इस व्याप्ति के बीच - तेज 'बहाव' के बीच - झांक रहा है | शायद इसीलिए नीनू विज के चित्र लैंडस्केप का आभास देते हुए भी दरअसल जगहों, वस्तुओं, रूपों और मानसिक गतियों का एक निचोड़ हैं | रंगों में यह निचोड़, रंगभाषा के बारे में हमारी संवेदना में बहुत कुछ जोड़ता है | दरअसल यहीं आकर हम यह भी पहचान सकते हैं कि नीनू विज के चित्रों में हमारे ही रंगों के साथ हमारे मानसिक चाक्षुष बौद्विक संबंध को जैसे उजागर किया गया है; और उनके रंगबोध के स्तर पर अपने समय के साथ चलने वाले भी सिद्व हुए हैं - उन्होंने उनमें अर्थ भरे हैं और उनके साथ हमारे लिये एक संवाद की स्थिति पैदा की है |
नीनू विज के अमूर्त रूपाकारों को देखते हुए मैं इस बात को लगातार रेखांकित करता हूँ कि कला के शुद्व रूपगत नियम सारतः खेल के नियमों से भिन्न नहीं होते | ये नियम जितने भी जटिल, सूक्ष्म और उम्दा हों खेल जीतने के अलावा उनका कोई स्वतंत्र महत्त्व नहीं होता | फुटबाल के खिलाड़ी के प्रयासों को अगर हम केवल हलचल के रूप में देखेंगे तो पहले वे दुर्बोध और कुछ देर बाद उबाऊ लगने लगेंगे | कुछ देर के लिये हो सकता है कि उनकी तेजी और चपलता से थोड़ा मजा आये - लेकिन जो इस सारी दौड़धूप, उछलकूद और धक्का-मुक्की के उद्देश्य को जानता है उस विशेषज्ञ दर्शक के आनंद के मुकाबले यह अत्यंत अर्थहीन होगा | कलाकार अपनी कृति के जरिये लोगों को सूचित करने, सहमत करने, प्रभावित करने का जो लक्ष्य लेकर चला है उस लक्ष्य को यदि हम नहीं जानते या नहीं जानना चाहते तो उसकी कला के बारे में हमारी समझ फुटबाल के उस जाहिल दर्शक से बहुत आगे नहीं बढ़ सकती जो खिलाड़ियों की गति की सुंदरता के ही आधार पर फुटबाल को समझता है | कलाकृति संवाद होती है - यद्यपि यह बात पूरी तरह सही है कि इसके सफल संप्रेषण के लिये ऐसे बाहय रूप की जरूरत होती है जो एकदम प्रभावी, आकर्षक और निर्दौष हो; लेकिन यह भी उतना ही सही है कि यह रूप जो संवाद संप्रेषित करता है उसके परे इसका कोई महत्त्व नहीं होता | किसी भी कलाकृति का एक आंतरिक तर्क होता ही है और इसके विशिष्ट गुण इसके विविध स्तरों और विभिन्न मूल भावों के आंतरिक संरचनात्मक संबंधों में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते ही हैं |       
यह आकस्मिक नहीं है कि केशव मलिक जैसे कला मर्मज्ञ ने कुछ ही वर्ष पहले इस तथ्य को रेखांकित किया था कि नीनू विज उन युवा चित्रकारों में हैं जिनके चित्रों में चित्रता गुण भरपूर है और चित्रभाषा की उपस्थिति, एक वास्तविक उपस्थिति लगती है - एक ऐसी उपस्थिति जो स्वयं को देखे जाने के लिये ठिठकाती तो है ही, साथ ही अपने होने को विश्लेषित करने के लिये हमें तरह-तरह से उकसाती और प्रेरित भी करती है |

Tuesday, April 6, 2010

मूर्तिभंजक चित्रकार फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा ने अपने जीवन में और अपने काम में हमेशा ही चीजों को व स्थितियों को तार्किक तरीके से समझने का प्रयास किया

धूमीमल ऑर्ट गैलरी के सौजन्य से फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा के बहुत से काम एक साथ देखने का मौका हमें मिलने जा रहा है, तो यह सचमुच एक बड़े रोमांच की बात है | दिल्ली में धूमीमल ऑर्ट गैलरी के रवि जैन को सूज़ा के काम के एक बड़े संग्रहकर्ता के रूप में जाना-पहचाना जाता है | दिल्ली में, हालाँकि इब्राहिम अलक़ाज़ी के पास भी सूज़ा के चित्रों का अच्छा खासा संग्रह है | इब्राहिम अलक़ाज़ी के पास तो सूज़ा की बिल्कुल शुरुआती पेंटिंग्स भी हैं, जिन पर न्यूटन के नाम से हस्ताक्षर हैं | इन पेंटिंग्स को अलक़ाज़ी ने कुछ साल पहले - सूज़ा जब जीवित थे - अपने एक शो में प्रदर्शित भी किया था | साल 2002 के मार्च माह की 28 तारीख को हुए सूज़ा के निधन के बाद वढेरा ऑर्ट गैलरी ने हालाँकि 'ए ट्रिब्यूट टु फ्रांसिस न्यूटन  सूज़ा' शीर्षक से सूज़ा के चित्रों की एक बड़ी प्रदर्शनी की थी, लेकिन उसमें सूज़ा के पचास और साठ के दशक में किए गये काम ही ज्यादा थे; बाद के भी कुछ काम थे, पर उनकी संख्या कम थी | धूमीमल ऑर्ट गैलरी के सौजन्य से ललित कला अकादमी की दीर्घाओं में 9 अप्रैल से सूज़ा के चित्रों की जो प्रदर्शनी होने जा रही है, उसमें सूज़ा के साल 1940 से 1990 के बीच किए गये कामों में से चुने गये करीब दो सौ कामों को प्रदर्शित करने की तैयारी है | इस हिसाब से कह सकते हैं कि निधन के बाद सूज़ा के चित्रों की यह सबसे बड़ी प्रदर्शनी है | इस तरह इसे सूज़ा की सिंहावलोकन प्रदर्शनी के रूप में भी देखा जा सकता है | इस प्रदर्शनी को यशोधरा डालमिया ने क्यूरेट किया है |  
सूज़ा पहले भारतीय चित्रकार हैं जिन्हें पश्चिम के कला प्रेमियों, प्रशंसकों, प्रेक्षकों व व्यापारियों ने मान्यता दी और एक कलाकार के रूप में जिनका लोहा माना | प्रसिद्व दार्शनिक व चिंतक एज़रा पाउंड ने घोषित किया था कि 'सूज़ा महान है और वह इस बात को जानता भी है |' सूज़ा 1949 में लंदन चले गये थे | हालाँकि वह वहाँ गये थे घूमने - फिरने के लिहाज से और म्यूजियम आदि देखने ताकि उनका ज्ञान और सौंदर्यशास्त्र की समझ बढ़ सके | लेकिन वहाँ पहुँच कर उनका पेंटिग करने में ऐसा मन लगा कि फिर उन्होंने वहीं बस जाने का फैसला कर लिया | उनकी पत्नी मारिया ने वहाँ नौकरी की और उन्होंने पेंटिंग | 1955 में उन्होंने लंदन में पहली प्रदर्शनी की | उस समय तक हालाँकि वह वहाँ खासे जाने - पहचाने हो गये थे | प्रदर्शनी के बाद तो वह वहाँ पूरी तरह स्थापित हो गये | महान कलाकार हेनरी मूर और ग्रैम सदरलैंड वहाँ उनके खास दोस्तों में थे | 1956 में सूज़ा स्टॉकहोम गये | वहाँ वह अकबर पदमसी और हैदर रज़ा के साथ मैडम कुटूरी से मिलने गये, जो पिकासो की मित्र थीं | वह लोग बातें कर ही रहे थे कि पिकासो वहाँ आ गये | इस बात को याद करते हुए सूज़ा ने एक बार कहा था कि 'वह बहुत ही रोमांचकारी क्षण था |'
सूज़ा का जन्म गोवा में हुआ था, लेकिन जल्दी ही उनकी माँ उन्हें लेकर मुंबई आ गई थीं | सूज़ा के जन्म के कुछ ही बाद उनके पिता का देहांत मात्र 24 साल की उम्र में ही हो गया था | सूज़ा की बड़ी बहन की भी मृत्यु डेढ़ - दो साल की उम्र में ही हो गई थी | बचपन में सूज़ा को भी चेचक हो गई थी, जिसके कारण उनकी माँ को उन्हें लेकर डर हुआ और नतीजतन वह उन्हें लेकर मुंबई आ गईं | मुंबई में उनकी माँ को किसी चर्च से कपड़े सिलने का काम मिला था, जो कि वह बहुत बारीकी से करती थीं | सिले हुए कपड़े को वह कशीदाकारी से सजाती भी थीं | इस बात को याद करते हुए सूज़ा ने एक बार कहा था कि वह भी अपनी पेंटिंग्स को उसी तरह सजाने की कोशिश करते हैं | सूज़ा की माँ उन्हें संत बनाना चाहती थीं क्योंकि बचपन में उन्हें जब चेचक हुई थी तब उनकी माँ ने सेंट फ्रांसिस जेवियर के सामने उन्हें संत बनाने की प्रतिज्ञा की थी | लेकिन सूज़ा ने माँ की इस प्रतिज्ञा को पूरा करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली | दरअसल धर्म को लेकर सूज़ा में कभी कोई दिलचस्पी पैदा ही नहीं हो सकी, क्योंकि उन्होंने हमेशा ही चीजों को व स्थितियों को तार्किक तरीके से समझने का प्रयास किया |
सूज़ा को चित्र बनाना तो बचपन से ही पसंद था और इसीलिए बड़े होकर उन्होंने कला की विधिवत शिक्षा लेने का फैसला किया | इसके लिये उन्होंने जे जे कॉलेज ऑफ ऑर्ट में दाखिला लिया, पर वह वहाँ अपना कोर्स पूरा नहीं कर सके | असल में, कॉलेज में लगे इंग्लैंड के झंडे यूनियन जैक को उतार कर गांधी जी का झंडा लहराने के काम में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ बढ़चढ़ कर भाग लिया था, जिसके चलते उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था | तब वह गोवा लौट गये थे और वहाँ लैंडस्केप पेंट करने लगे | गोवा में बनाई पेंटिंग्स की उन्होंने मुंबई में प्रदर्शनी की और पहली ही प्रदर्शनी में उनकी एक पेंटिग बड़ौदा म्यूजियम ने खरीदी थी | गोवा में उनका मारिया फिनरारो नाम की लड़की से परिचय हुआ | उन्हें बाद में पता चला कि उसने अपनी सारी तनख्वाह उनकी पेंटिंग्स खरीदने में खर्च कर दी है | मारिया से ही बाद में उनकी शादी हुई | सूज़ा ने कुछ लिखा - लिखाया भी है, लेकिन लिखना उनके लिये कभी भी पेंट करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं रहा | पेंट करना उनका मन का काम रहा | इसके चक्कर में उन्होंने नौकरी नहीं की | जब साधन कम रहे, तब भी नहीं | साधन कम रहे, तब भी उन्होंने लेकिन पेंटिंग करना नहीं छोड़ा |
सूज़ा ने प्रायः आकृतिमूलक काम ही किया है | उनका साफ़ कहना रहा कि उनके लिये आकृति ही सब कुछ है | इसलिए वह जब भी कोई पेंटिंग बनाते हैं तो वह किसी आकृति की ही होती है, जिसकी एक निश्चित रूपरेखा हो | उनका मानना और कहना रहा कि एक महान पेंटिंग वही है जिसमें आकृति एक निश्चित रूपरेखा में चित्रित की गई हो | दो आयामी चित्रों में आप त्रिआयामी चीजों को उतार सकते हैं और साथ ही उनमें रंग भर सकते हैं, पर इसके लिये यह जरूरी है कि पेंटिंग का एक निश्चित आधार हो | सूज़ा का व्यवहार खासा आक्रामक था और अपने समकालीन चित्रकारों के साथ उनकी खासी गर्मागर्मी रहती थी | उनका यह 'व्यवहार' उनके चित्रों में भी दिखता रहा है, और इसी 'व्यवहार' के कारण उनके चित्रों में 'बोल्डनेस' रही है - रूप के स्तर पर भी और विषय के स्तर पर भी | इसी के चलते उन पर यह आरोप भी लगा कि उनमें एक प्रकार का परावर्शन और डिस्टार्शन है | 'बोल्डनेस' के कारण ही उन्हें मूर्तिभंजक चित्रकार के रूप में भी देखा / पहचाना गया है |

Wednesday, March 31, 2010

सिद्वार्थ ने 'डेकोरेटिव काऊ' के जरिये जीवन और समाज की विविधतापूर्ण परिघटनाओं को समग्रता में तथा संवेदना के स्तर पर अभिव्यक्त किया है

रेलिगेअर आर्ट्स डॉट आई ने 'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों की एक बड़ी प्रदर्शनी आयोजित की है | सिद्वार्थ भारतीय समकालीन कला के चित्रकारों में एक अलग तरह की पहचान रखते हैं | समकालीनता को परंपरा के साथ जोड़ कर देखने और दिखाने का काम करने का प्रयास यूं तो बहुत लोगों ने किया है, पर वास्तव में उसे कर सकने में जो थोड़े से लोग ही सफल हो सके हैं, उनमें सिद्वार्थ भी एक     हैं | सिद्वार्थ ने जैसे एक ज़िद की तरह अपने चित्रों को पूरने में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया है | बचपन के असर से दुनिया भर का चक्कर लगा लेने के बाद भी वह जैसे मुक्त नहीं हो पाए    हैं | सिद्वार्थ ने अपनी माँ को काम करते देखते हुए मिट्टियों के रंगों की, फूलों के रंगों की, नीलडली व हिरमिची और रंग-बिरंगे पत्थरों को पीस/घोंट कर तैयार किए गये रंगों की जिस चमक को जाना/पहचाना था, वह चमक जैसे आज भी उनमें बसी हुई है | उनकी माँ रंगों से सजे पेपरमैशी के बर्तन बनाती थीं | सिद्वार्थ को अपने बचपन में कारीगरी और रंगों का कैसा वातावरण मिला, इसे दिनभर के कामकाज से थके-मांदे घर लौटे उनके पिता की शिकायतभरी चुहल से जाना जा सकता है जो वह अक्सर करते थे - 'ओ कोई रोटी-पानी भी बना है घर में या फिर बेल-बूटा, चित्र-कढ़ाई ही है |' इसके साथ ही वह यह कहना भी नहीं चूकते थे 'हैं तो सुंदर पर भूख भी तो लगती है न |' गाँव के स्कूल में जहाँ मास्टर को यह तो पता था कि चित्र बनाने का काम सुंदर दिखने वाले ब्रशों से और चमकदार रंगों से सफेद कागज पर होता है, सिद्वार्थ को यह उलाहना अक्सर सुनना पड़ता था - 'यह तू कौन मिट्टियों से चित्र बनाता               है |' माता-पिता की साझी मेहनत-मजदूरी पर पलते चार बेटे व दो बेटियों के परिवार के सदस्य के रूप में सिद्वार्थ के लिये हो सकता है कि उस समय मिट्टियों से चित्र बनाना मजबूरी भी रहा हो, लेकिन मिट्टियों में उन्होंने अपनी रचनात्मकता के जो स्त्रोत देखे / पाए थे, उन्हीं मिट्टियों पर भरोसा बनाये रखने के चलते सिद्वार्थ की एक भिन्न पहचान बनी है |
'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से प्रदर्शित सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों ने उनकी भिन्न पहचान के रंग को वास्तव में और गाढ़ा बनाने/करने का ही काम किया है | गाय (काउ) तो सिर्फ बहाना है | उसे डेकोरेट करके सिद्वार्थ ने जीवन और समाज की विविधतापूर्ण परिघटनाओं - चाहें वह आर्थिक हों, सामाजिक हों, धार्मिक हों, स्वार्थी हों या मनमौजी हों - को समग्रता में अभिव्यक्त किया है; तथा संवेदना के स्तर पर गहरे अर्थों को पहचानने के लिये प्रेरित करने से लेकर उनसे जुड़ने के लिये जैसे उकसाने का काम किया है | विषय-वस्तु के नजरिये से देखें, तो सिद्वार्थ ने प्रायः जानी-पहचानी स्थितियों को लेकर ही अपने चित्रों व मूर्तिशिल्पों को रचा है और एक बड़ा खतरा उठाया है | दरअसल, हमारे यहाँ समकालीन कला में जानी-पहचानी चीजों व स्थितियों पर चित्र रचना करने की कोई बहुत सार्थक परंपरा ही नहीं है | यह खासा खतरेभरा और चुनौतीभरा भी माना जाता है | जानी-पहचानी चीजों व स्थितियों पर आधारित चित्र रचना में दर्शक/प्रेक्षक (और ख़ुद कलाकार) के लिये भी यह खतरा तो रहता ही है कि उनकी नज़र चित्र के रचनात्मक 'तथ्यों' को पहचानने की बजाये चीजों व स्थितियों की 'आकार रेखाओं' को ही चित्र में ढूँढ़ने लग जाती हैं | सिद्वार्थ ने अपने चित्रों व मूर्तिशिल्पों में इस खतरे को पास भी नहीं फटकने दिया है तो यह उनका रचनात्मक कौशल तो है ही, साथ ही संवेदनात्मक यथार्थपरकता पर यह उनकी पकड़ का सुबूत भी है |
सिद्वार्थ की सक्रियता को देख/जान कर भी समझा जा सकता है कि उनके लिये जैसे कला और जीवन एक  दूसरे के पर्याय जैसे हैं | उन्होंने ख़ुद भी कहा है 'सदा से मुझे याद है कि चित्रों के साथ-साथ ही जिया हूँ | इसके बिना रहने का कोई अवसर हुआ ही नहीं |' सिद्वार्थ ने यूं तो चंडीगढ़ कॉलिज ऑफ ऑर्ट से डिप्लोमा किया है, लेकिन कला की मूल भावना व बारीकियों को पहचानने तथा पकड़ने के हुनर को पाने के लिये उन्होंने दूसरे ठिकानों पर ज्यादा भरोसा किया | सिद्वार्थ ने घर-गाँव तो छोड़ा था शोभा सिंह से पोट्रेट सीखने के लिये, पर फिर उन्होंने तिब्बतन कला थानग्का सीखने का निश्चय किया और इसके लिये धर्मशाला स्थित एक बौद्व मठ में उन्होंने छह साल बिताये | इसके अलावा, सिद्वार्थ ने मधुबनी पेंटिंग भी सीखी और कश्मीरी पेपरमैश क्राफ्ट कला सीखने के लिये पुश्तैनी शिल्पकारों की शागिर्दी भी    की | स्वीडन में उन्होंने ग्लास ब्लो का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया | कोई भी चकित हो सकता है और जानने का इच्छुक भी कि कला में सिद्वार्थ आखिर क्या-क्या जानना-सीखना और करना चाहते हैं ? उनकी सक्रियता किसी को भी हैरान कर सकती है | उन्होंने देश के विभिन्न शहरों के साथ-साथ ब्रिटेन, अमेरिका, स्वीडन आदि देशों में बाईस एकल प्रदर्शनियाँ की हैं तथा करीब सवा सौ समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | देश-विदेश में सिद्वार्थ को अपनी कला के प्रशंसक तो मिले ही हैं, वह पुरुस्कृत और सम्मानित भी खूब हुए हैं | ब्रिटिश काउंसिल से अवार्ड पाने वाले गिने-चुने भारतीय चित्रकारों में सिद्वार्थ का नाम भी    है | सिद्वार्थ ने सिर्फ पेंटिंग्स ही नहीं की है; उन्होंने मूर्तिशिल्प भी बनाये हैं तथा भारत की कला, यहाँ के शिल्प और यहाँ के मंदिरों पर पंद्रह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनाई हैं | ख़ुद उनके काम और उनकी कला पर भी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनी है | 'इन सर्च ऑफ कलर - ए पेंटर सिद्वार्थ' शीर्षक से उक्त फिल्म का निर्माण कला फिल्मों के मशहूर निर्माता के बिक्रम सिंह ने किया  है |
रेलिगेअर कला दीर्घा में 'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से आयोजित सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों की प्रदर्शनी को देखते हुए मैं लगातार उस कहानी को याद करता रहा जो सिद्वार्थ ने करीब पांच साल पहले नागपुर में आयोजित हुए एक कला शिविर में 'संदर्भ और स्मृतियाँ' विषय पर दिये अपने व्याख्यान में सुनाई थी : 'एक शिष्य गुरु के पास गया और कहने लगा गुरु जी मुझे चित्र कला सिखा दो | गुरु ने कहा पहले मूर्तिकला सीख कर आओ | शिष्य मूर्तिकला के गुरु के पास गया | कहने लगा - मुझे मूर्तिकला सिखा दो | गुरु ने कहा - सिखा देंगे, पहले नृत्य कला सीख कर आओ | वह नृत्यकला के गुरु के पास गया और उनसे कहा - गुरुजी मुझे नृत्यकला सिखा दो | गुरु ने कहा - सिखा देंगे राजन, पहले तुम संगीत कला सीख कर आओ | वह संगीत कला के गुरु के पास गया और उनसे कहा - गुरुजी मुझे संगीत सिखा दो | गुरु ने कहा - क्या तुम्हें शब्दों का ज्ञान    है ? शब्दों  की ध्वनियों को तुमने कभी ध्यान से सुना है ? तुम्हें अपनी मातृभाषा आती है ? ऐसा करो, ध्वनियों को सुनने तुम जंगल में चले जाओ | वहाँ बहते झरने को सुनो, जो सदियों से बह रहा है | बहुत सारी स्मृतियाँ लिये हुए आता है, जाता है, फिर वापस आता है | कल-कल नाद करते हुए बह रहा है, जाओ उसको सुनो, फिर आना |' 'डेकोरेटिव काऊ' देखते हुए और देख कर लौट आने के बाद भी मैं गायों से जुड़ी यादों व अनुभवों के घेरे से मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ | रेलिगेअर कला दीर्घा में 'डेकोरेटिव काऊ' शीर्षक से आयोजित प्रदर्शनी में सिद्वार्थ के चित्रों व मूर्तिशिल्पों को देखना मेरे लिये सचमुच में एक विलक्षण अनुभव रहा | किसी और गैलरी में उनके इन चित्रों व मूर्तिशिल्पों को शायद ही इतने प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता होता | इसका श्रेय सीमा बावा तथा दीर्घा के कर्ताधर्ताओं को भी है | सीमा बावा ने इस प्रदर्शनी को क्यूरेट किया है और वास्तव में उन्होंने अपना काम खासी दक्षता के साथ किया है |

Saturday, March 27, 2010

परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों में जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है

परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों को लेकर मैं पिछले कुछ समय से लगातार एक दिलचस्प अनुभव का साक्षी और सहभागी बना हुआ हूँ | पिछले कुछ समय में, जब भी मूर्तिशिल्प कला को लेकर किसी से कोई बात हुई और या मूर्तिशिल्प कला को लेकर हो रही बातचीत का मैं हिस्सा बना तो अधिकतर मौकों पर मैंने  दिल्ली के कलाकारों व कला प्रेक्षकों को परमिंदर के मूर्तिशिल्पों को लोगों को याद करते तथा रेखांकित करते हुए पाया है | परमिंदर एक युवा शिल्पकार हैं और अभी तक उनकी सक्रियता का केंद्र मौटे तौर पर चंडीगढ़ ही है | कहने को तो उन्होंने दीमापुर ( नागालैंड ), शांतिनिकेतन ( पश्चिम बंगाल ), नागपुर ( महाराष्ट्र ), उदयपुर ( राजस्थान ), मुरथल ( हरियाणा ), भोपाल ( मध्य प्रदेश ) और नई दिल्ली में किसी समूह प्रदर्शनी या किसी प्रतियोगिता या किसी कैम्प में शामिल होने के बहाने से अपने काम को प्रदर्शित किया है; लेकिन बड़े स्तर पर अपने काम को प्रदर्शित कर पाने का अवसर उन्हें अभी भी प्राप्त करना है | नई दिल्ली में पिछले वर्ष जून में उन्होंने चंडीगढ़ के बाहर अपने शिल्पों की पहली एकल प्रदर्शनी जरूर की थी | मैंने अपने जिस अनुभव का ज़िक्र किया है, वह शायद आठ महीने पहले हुई उसी प्रदर्शनी का असर है | मुहावरे का सहारा लेँ तो कह सकते हैं कि परमिंदर के मूर्तिशिल्पों का जादू लोगों के जैसे सिर चढ़ कर बोल रहा है | उक्त प्रदर्शनी को देख सकने का सौभाग्य मुझे भी मिला था और परमिंदर के मूर्तिशिल्पों के साथ-साथ परमिंदर की काम करने की जिजीविषा ने मुझे भी प्रभावित किया था | मैंने अपने जिस अनुभव का ज़िक्र किया है, उससे मुझे स्वाभाविक रूप से यह भी पता चला ही है कि परमिंदर के काम से एक मैं ही प्रभावित नहीं हुआ था, बल्कि और कई लोगों को भी परमिंदर के काम ने छुआ है |  
सबसे पहले तो, ललित कला में सबसे दुस्साध्य और कठिन माध्यम के रूप में पहचाने जाने वाले मूर्तिशिल्प कला में किसी युवा कलाकर का काम करना ही लोगों को चौंकाता है | स्वाभाविक रूप से इस माध्यम में वही कलाकार काम करना पसंद करते हैं जो कठिन परिश्रम करने को तैयार होते हैं, तथाकथित सफलता पाने की जल्दी में नहीं होते हैं और कलाकार के रूप में कला-बाजार की उपेक्षा का खतरा उठाने से घबराते नहीं हैं | अमृतसर जिले की तरन तारन तहसील के गाँव छुटाला में वर्ष 1977 के फरवरी माह की तेरह तारिख को जन्मे परमिंदर सिंह संधू के काम को देखने वालों ने तो लेकिन यह भी रेखांकित किया है कि उन्होंने मूर्तिकला जैसे अधिक मेहनत और समय की मांग करने वाले दृश्यगत भाषा-माध्यम को सिर्फ चुना ही नहीं, बल्कि पूरी तल्लीनता और शिद्दत के साथ उसे निभाया भी है |
परमिंदर की कलाकृतियों में मानवा-कारों के साथ-साथ बीज व सर्प रूपाकारों और अमूर्त तत्त्वों को साफ़  देखा / पहचाना जा सकता है | उनकी प्रायः सभी कृतियों में 'एरॉटिक' तत्त्वों का समावेश है, लेकिन उनमें सौंदर्य की सूक्ष्मता तथा संयम दोनों को सहज ही महसूस किया जा सकता है | परमिंदर की कलाकृतियाँ माँसल ऐंद्रिकता से भरपूर हैं और जिनमें व्यक्त हुई परिष्कृत कला-चेतना की बारीकियाँ पहली बार में ही आकर्षित भी करती हैं और प्रभावित भी | परमिंदर के मूर्तिशिल्पों के रूपाकारों के सृजन में ऐंद्रिकता की कोमलता व रेखाओं की उदात्त मितव्ययिता का समावेश है, जिससे इन रूपाकारों के स्पर्श-संवेदन और रहस्यमय गत्यात्मकता में विलक्षणता प्रकट होती है | परमिंदर ने विविधतापूर्ण रूपाकारों की जो रचना की है, उनमें व्यक्त होने वाले अप्रत्याशित मोड़, उठान, प्रक्षेपन, दरारें और ढलानें आदि - सभी तत्त्व अपनी सामूहिकता में जिस कलात्मक लय का सृजन करते हैं, उसके चलते कलाकृति की सौंदर्यात्मक एकात्मकता में और भी श्रीवृद्वि हो जाती है |
मूर्तिशिल्प सृजन की अपनी सशक्त भाषा को विकसित कर चुके परमिंदर के टैक्सचर की विशेषता है कलाकृतियों में शिलाओं की रूक्षता और स्निग्धता के परस्पर विपरीत गुणों के बीच विद्यमान सृजनात्मक तथा दृश्यमूलक समन्वय स्थापित करना | मूर्तिशिल्प के उत्तेजक और कहीं-कहीं चमत्कारिक से लगते उठाव-गिराव उनकी वर्णात्मक लय को दर्शक के लिये और अधिक आकर्षक बना देते हैं, क्योंकि उनमें जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है | खासी मेहनत और निरंतर संलग्नता के भरोसे अपनी प्रतिभा को व्यापक रूप देते हुए परमिंदर ने वास्तव में मूर्तिकला में पंजाब की भागीदारी व उपस्थिति को और गाढ़ा बनाने का ही काम किया है, तथा धनराज भगत, अमरनाथ सहगल, वेद नैयर, बलबीर सिंह कट्ट, हरभजन संधू, शिव सिंह, ए सी सागर, अमरीक सिंह, अवतार सिंह आदि प्रमुख शिल्पकारों की परंपरा को और समृद्व करते जाने के प्रति आश्वस्त करने का ही काम किया है |      
परमिंदर सिंह संधू को पिछले ही वर्ष पंजाब ललित कला अकादमी ने सम्मानित किया है | पंजाब ललित कला अकादमी में सम्मानित होने का यह उनका दूसरा मौका था | इससे पहले, वर्ष 2004 में भी परमिंदर पंजाब ललित कला अकादमी के वार्षिक आयोजन में सम्मानित हो चुके थे | वर्ष 2008 में नागपुर में आयोजित हुई बाइसवीं अखिल भारतीय कला प्रतियोगिता में वह पुरुस्कृत हुए | उससे पिछले वर्ष, यानि वर्ष 2007 में चंडीगढ़ ललित कला अकादमी की वार्षिक कला प्रदर्शनी में परमिंदर का काम पुरुस्कृत हुआ था |
उससे भी पहले, वर्ष 2006 में आईफैक्स की 78 वीं वार्षिक कला प्रदर्शनी में परमिंदर सिंह को सम्मानित करने के लिये चुना गया था और वह दिल्ली में संपन्न हुए एक भव्य कार्यक्रम में कई कलाकारों के बीच सम्मानित हुए थे | आईफैक्स में सम्मानित होने का भी परमिंदर का यह दूसरा अवसर था | इससे पहले हालाँकि वह दिल्ली में नहीं, बल्कि चंडीगढ़ में सम्मानित हुए थे | चंडीगढ़ में वर्ष 2002 में आयोजित हुई आईफैक्स की राज्यस्तरीय प्रदर्शनी में उन्हें सम्मानित करने के लिये चुना गया था | ज़ाहिर तौर पर, परमिंदर सिंह संधू के काम को संस्थाओं की ओर से भी और लोगों से भी व्यापक सराहना मिली है | वास्तव में यह सराहना ही उनकी प्रतिभा और रचनात्मक क्षमता की गवाह भी है और सुबूत भी |

Wednesday, February 24, 2010

रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स जीवन के शाश्वत संदर्भों की पड़ताल का मौका देती हैं

रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स विस्मित तो करती ही हैं, पेंटिंग्स में विविधतापूर्ण रचना सामग्रियों के इस्तेमाल के सवाल की तरफ भी ध्यान खींचतीं हैं | उनकी कुछेक नई पेंटिंग्स म्यूरल का-सा आभास देती हैं, तो उनकी पिछली कुछेक पेंटिंग्स को 'बुना हुआ' पाया गया था | विविधतापूर्ण रचना सामग्रियों का इस्तेमाल करते हुए रुचि गोयल कौरा  ने चित्रों का अपना ही एक वास्तुशिल्प बनाया है, अपना ही एक स्ट्रक्चर - जो अनुभवों, स्मृतियों, भावों और मनःस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेता है | रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स में प्रकट हुईं रंग - रूप - रेखाएं, स्मृति और स्वप्न को आंतरिक अनुभव से जोड़ते हुए एक स्वप्नलोक-सा रचती हैं | स्मृतियों को खंगालते रहने में और स्मृतियों की ओर लौटते-लौटते उनमें 'जा बसने' में रुचि की खास दिलचस्पी    है | इस बात का सुबूत यह तथ्य भी है कि दो वर्ष पहले - जब वह नॉटिंघम में थीं - उन्होंने 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' शीर्षक से एक ब्लॉग बनाया था और उसकी कई पोस्ट्स लिखी थीं | नॉटिंघम वह अपनी पढ़ाई के सिलसिले में गईं थीं | रुचि गोयल कौरा ने नॉटिंघम ट्रेंट यूनीवर्सिटी से टेक्सटाइल डिजाइन एण्ड इनोवेशन में मास्टर्स किया है | इससे पहले उन्होंने निफ्ट से फैशन डिजाइनिंग में डिप्लोमा किया था |
रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स देखते हुए मुझे सहसा काफी पहले पढ़ी 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' की पोस्ट्स याद आ गईं | पेंटिंग्स को देखते हुए उन पोस्ट्स को याद करने के क्रम में मुझे लगा कि हमारे भीतर कहीं जैसे एक त्रास मौजूद रहता है - इतिहास और समय के प्रति त्रास | क्या हम मनुष्य के भीतर बहने वाली सृजन धारा को इतिहास के दावों और दबावों से मुक्त रख सकते हैं - या यह सिर्फ एक आदर्शवादी लालसा और स्वप्न है | मैं जैसे अपने आप से मुठभेड़ करता हूँ और रुचि की पेंटिंग्स के स्रोतों को 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' की पोस्टों में तलाशने की कोशिश करता हूँ और जल्दी ही अपनी इस कोशिश को निरर्थक पाता हूँ | अपनी कोशिश को इसलिए भी निरर्थक पाता हूँ क्योंकि मैं गौर करता हूँ कि खुद रुचि को ही 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है और उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिये अब पेंटिंग्स को चुन लिया है | अपनी सुविधा के लिये मैं मान लेता हूँ कि रुचि की पेंटिंग्स के स्रोत वहीं होंगे जहाँ 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' के लिये उन्हें प्रेरणा मिली होगी | इस सोच विचार में लेकिन यह सवाल आ खड़ा हुआ कि एक कलाकृति का अर्थ कैसे निकलता है ? क्या वह विज्ञान या समाजशास्त्र या गणित के सूत्रों या सिद्वान्तों से जो अर्थ निकलता है - उससे अलग है  ? किसी ने कहा है कि कोई भी कलाकृति या तो अपने में संपूर्ण रूप से अभेद्य होती है या हजारों अर्थ खोलती है | ऐसे में जब हम किसी कलाकृति को किसी एक खास अर्थ के साथ नत्थी कर देते हैं, उसी समय हम उसकी समग्र और संश्लिष्ट अर्थवत्ता को नष्ट कर देते हैं |
रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स को देखते हुए पहले तो उनके ब्लॉग 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' की याद आना और फिर उनकी पेंटिंग्स के स्रोतों को 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' में खोजने की कोशिश को निरर्थक पाना/मानना - मैंने निष्कर्ष यह निकाला कि कोई कलाकृति किसी एक खास अनुभव या घटना या आइडियोलॉजी या दर्शन से उत्प्रेरित तो हो सकती है - किंतु एक कलाकृति की सत्ता में उसका अर्थ उस अनुभव या घटना या आइडियोलॉजी या दर्शन के सन्देश या डॉगमा से कहीं अधिक व्यापक और संश्लिस्ट होता है | महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि एक चित्र के ऊपरी बिम्ब या प्रतीक क्या हैं - वह कहीं से भी लिये जा सकते हैं - महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कलाकृति की अर्थवत्ता उन संदर्भों का अतिक्रमण कर पाती है या नहीं - कर पाती है तो एक स्वायत्त इकाई बन जाती है और इस तरह समय के गुजरने के साथ यदि उसके प्रतीक और बिम्ब अप्रासंगिक या अर्थहीन भी हो जाते हैं - तो भी चित्र का कलात्मक अर्थ रत्ती-भर भी मलिन नहीं पड़ता | मुझे लगता है कि जिन दिनों रुचि 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' में दिलचस्पी ले रहीं थीं उन दिनों भी वह दरअसल कलाकारी ही कर रहीं थीं | 'मेमोयर्स फ्रॉम द पास्ट' को उनकी एक कलाकृति के रूप में भी देखा जा सकता है | यहाँ यह भी याद किया जा सकता है कि उन्हीं दिनों उन्होंने बहुत ही प्रयोगधर्मी अपना एक विजीटिंग कार्ड भी बनाया था |
रुचि गोयल कौरा की कलाकृतियों में संवेदना स्वयं अपनी ऊर्जा से पुष्ट होती दिखती हैं | ऐक्य की तलाश ही उनमें जैसे एकमात्र लक्ष्य है | रुचि ने अपनी पेंटिंग्स को जो 'बुना हुआ' और म्युरल-सा रूप दिया है और विविधतापूर्ण रचनासामग्रियों का अपनी पेंटिंग्स में जो इस्तेमाल किया है - उसके चलते मनुष्य और भौतिक जगत की समानता, जड़ पदार्थों और भावनाओं का जो मेल तैयार होता नजर आता है वह सतह को मूल से जोड़ता-सा दिखता है | विविधतापूर्ण रचनासामग्रियों के इस्तेमाल से लगता है कि रुचि जैसे बाह्य यथार्थ को संपूर्ण रूप से ठुकरा कर अपने चित्रों का रेफरेंस अपने भीतर या अपने अहम् में खोजने का प्रयास कर रहीं हैं : क्योंकि अपने से अधिक इस दुनिया में और कौन-सी चीज, नैतिकता, मूल्य या यथार्थ विश्वसनीय और प्रामाणिक हो सकता है | अहम् का एक विस्तृत और समग्र रूप है - जिसे हम सेल्फ या आत्मन कह सकते हैं और यह भौतिक जगत का विरोधी या प्रतिद्वंदी तत्त्व नहीं है : यह अपने सत्य में उस परम का ही अणु है, जो सामाजिक यथार्थ से कहीं ज्यादा व्यापक और सार्वभौम है - जिसमें समूची प्रकृति, समूचा जीव-संसार, समय और इतिहास की धारणाएं शामिल हैं | क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि रुचि ने इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित हुई अपनी पिछली एकल प्रदर्शनी को नाम ही 'अहम्' दिया था | रुचि का काम जीवन के शाश्वत संदर्भों की पड़ताल का मौका देता है और एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि कला में जब तक जीवन है, कोई प्रश्न पुराना नहीं पड़ता और कोई उत्तर अंतिम नहीं होता |
रुचि गोयल कौरा की पेंटिंग्स को 26 फरवरी से 3 मार्च के बीच गुड़गाँव की एपिसेंटर कला दीर्घा में 'बियोंड बाउनड्रीज' शीर्षक से शालिनी महाजन व संगीता मल्होत्रा द्वारा क्युरेट की गई समूह प्रदर्शनी में देखा जा सकता है | इस समूह प्रदर्शनी में उनके अलावा आशीष पाही, किशोर चावला, सायरा एच, संगीता मल्होत्रा, वंदना तनेजा, अर्चना भसीन, भावना रस्तोगी और सुरेखा सदाना के काम को भी देखा जा          सकेगा |

Monday, February 22, 2010

सैयद हैदर रजा की कला वस्तुगत स्तर पर समय-काल के परे है, और शैलीगत स्तर पर पूरी तौर से आधुनिक

भारतीय अध्यात्म तथा दर्शन के अनेक गूढ़ रहस्यों के साथ-साथ जीवन की क्षणभंगुरता में आत्मिक आनंद की प्रतीति को कला का मर्म बना देने वाले सैयद हैदर रजा का आज जन्मदिन है | सैयद हैदर रजा आज अपने जीवन के अठ्ठासी वर्ष पूरे कर रहे हैं | स्थाई रूप से पेरिस स्थित अपने घर में रह रहे सैयद हैदर रजा आजकल भारत आये हुए हैं और आज दिल्ली में हैं | सैयद हैदर रजा ने वर्ष 1922 में आज ही के दिन मध्य प्रदेश के मांडला क्षेत्र के बाबरिया गाँव में ताहिरा बेगम की कोख से जन्म लिया था | उनके पिता सईद मोहम्मद  राजी उस समय डिप्टी फोरेस्ट रेंजर के पद पर थे | बारह वर्ष की उम्र तक वह गाँव में ही अपने माता-पिता के साथ रहे | तेरह वर्ष की उम्र में वह हाई स्कूल करने दमोह गये | हाई स्कूल करने के बाद वह नागपुर स्कूल ऑफ ऑर्ट गये, जहाँ वह 1939 से 1943 तक रहे | 1943 से 1947 तक उन्होंने मुंबई के जे जे स्कूल ऑफ ऑर्ट में  शिक्षा प्राप्त की | वर्ष 1946 में उन्होंने अपने चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी बोम्बे ऑर्ट सोसायटी की कला दीर्घा में की थी | वर्ष 1947 में उनके जीवन की दो प्रमुख घटनाएँ हुईं : पहले उन्होंने अपनी माँ के निधन का सामना किया और फिर फ्रांसिस न्यूटन सूजा के साथ मिलकर उन्होंने बोम्बे ऑर्टिस्ट ग्रुप का  गठन किया | वर्ष 1950 में फ्रांस सरकार की एक फेलोशिप के तहत वह तीन वर्ष के लिये पेरिस चले गये, जहाँ उन्होंने कला के विश्व-संसार से परिचय प्राप्त किया | कला के विश्व-संसार से परिचय प्राप्त करने के क्रम में हालत कुछ ऐसे बने कि रजा स्थाई रूप से पेरिस में ही बस गये | फ्रांस सरकार से उन्हें कला का सर्वोच्च सम्मान मिला | रजा पहले गैर फ्रांसीसी कलाकार हैं जिन्हें उक्त सम्मान मिला | पेरिस में लंबे समय तक रहने और वैश्विक कला जगत में अपनी प्रखर पहचान बना लेने  के बावजूद रजा का भारत से नाता नहीं टूटा | वह लगातार न सिर्फ भारत आते रहे  बल्कि यहाँ के कला जगत के साथ गहरे से जुड़े भी रहे हैं |
प्रख्यात कलालोचक पॉल गोथिये ने उनका परिचय देते हुए वर्षों पहले लिखा था :
'रजा एक भारतीय कलाकार हैं, जो अब पेरिस में जा बसे हैं |'  सैयद हैदर रजा के मन में फ्रांस सरकार की फेलोशिप मिलने से पहले ही फ्रांस के  प्रति एक उत्सुकता पैदा हो गई थी | रजा ने बताया है कि उन दिनों - उन दिनों  यानि बोम्बे ऑर्टिस्ट ग्रुप के गठन के दिनों में - एक किताब ने उनकी कल्पना को झिंझोड़ दिया था | इरविंग स्टोन की वह किताब थी - लस्ट फॉर लाइफ, जो दरअसल विन्सेंट वॉन गॉग की जीवनी है | रजा को यह तो पता ही था कि विन्सेंट वॉन गॉग एक ऊंचे दर्जे के कलाकार थे, जो फ्रांस में काम करते रहे और वहीं जिनका निधन हुआ था | उन्हीं दिनों - वर्ष 1949 में मुंबई में फ्रेंच कांसुलेट द्वारा आयोजित  जीवित फ्रेंच चित्रकारों के काम की बड़ी अनुकृतियों की एक प्रदर्शनी हुई | रजा  ने समझ लिया था कि कला के विस्तृत स्त्रोतों तक यदि पहुँच बनानी है तो उन्हें फ्रांस जाना ही होगा | पेरिस उन दिनों यूं भी समकालीन कला का एक स्पंदित केंद्र था |
सैयद हैदर रजा ने पेरिस में समकालीन कला की दुनिया से परिचय ही प्राप्त नहीं किया, पेंटिंग को पहचानने का नजरिया भी पाया | उन्होंने स्वीकार किया है कि 1951 - 52 से पहले दरअसल पेंटिंग की असलियत को वह समझते ही नहीं थे | प्रकृति के, रंगों के, लैंडस्केपों के कुछ प्रभाव थे जिन्हें वह एक चित्रनिर्मिति (कंस्ट्रक्शन) में बदल दिया करते थे | उन्होंने कहा है कि यह तो बाद में ही जाना कि आप्टिकल रियलिटी (आँख-यथार्थ) अपने-आप में काफी नहीं है या कि वह पूरा यथार्थ नहीं है | जो चीज चित्र को चित्र बनाती है, वह केवल ऊपर से दीख पड़ने वाली चीज नहीं है | जब चित्र अपनी साँस ले, तभी वह चित्र है | रजा ने 1948 से 1951 तक बहुत काम किया | अपनी पूरी याद के साथ उन्होंने बताया है कि 1949 में उन्होंने करीब तीन सौ चित्र बनाये थे | उन दिनों वह केरल, मद्रास, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, श्रीनगर की कई जगहों तथा कई शहरों में गये थे | वहाँ के जो ढेरों प्रभाव थे और मन में जो ढेरों दृश्य घूमते थे, रजा उन्हें अपने चित्रों में ले आते थे | रजा ने कहा है कि पेरिस पहुँच कर उन्होंने जो देखा / समझा तो पाया कि अभी तक वह जो कर रहे हैं यदि वही करते रहे तो वह तो खो जायेंगे | उन्होंने इस बात को समझा कि उन्हें आप्टिकल रियलिटी से छुटकारा पाना होगा और अपने अंदर की बात ढूंढनी होगी | तब उन्होंने चित्र के आंतरिक जीवन (इनर लाइफ) को तलाशने, चित्र की संगीतात्मक संरचना को समझने, रंगों के साथ एक नया संबंध बनाने का काम शुरू किया; और चाक्षुक यथार्थ (विजुअल रियलिटी) के मर्म को वास्तव में पहचानने का प्रयास किया | रजा ने बहुत साफ शब्दों में स्वीकार किया
है कि सचमुच पहली पेंटिंग उन्होंने पेरिस में 1952 में बनाई |
रजा की कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति को संपन्न करने में फ्रांस की आबोहवा का निस्संदेह बहुत योगदान रहा है; लेकिन भारतीय स्त्रोत उनमें बहुत गहरे और अखंड रूप में मौजूद रहे हैं | पॉल गोथिए ने लिखा है कि इन दोनों संसारों के* *बीच उन्होंने अपनी कला का एक ऐसा पुल बांध लिया है जो न तो आधुनिक कला की विशिष्टताओं को नजरअंदाज करता है, और न ही अपनी जड़ों से कतई कटा हुआ है - उनकी कला वस्तुगत स्तर पर समय-काल के परे है, और शैलीगत स्तर पर पूरी तौर से आधुनिक | सैयद हैदर रजा के बनाये चित्र एक जीवंत सार्वभौमिक कला के भौतिक प्रतिरूप हैं | सैयद हैदर रजा के अठ्ठासीवें जन्मदिन के मौके पर इस बात को रेखांकित करना अच्छा भी लग रहा है और रजा पर व अपने बीच उनकी उपस्थिति पर गर्व भी हो रहा है |

Thursday, February 11, 2010

नंदा गुप्ता ने केनवस पर जो किया है, उसमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं

नंदा गुप्ता के चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी 12 फरवरी से नई दिल्ली की गीता आर्ट गैलरी में शुरू हो रही है | इस प्रदर्शनी को 28 फरवरी तक देखा जा सकेगा | नंदा इससे पहले एक समूह प्रदर्शनी में अपने चित्रों को प्रदर्शित कर चुकी हैं, तथा कुछेक आर्ट गैलरीज के संग्रहों में उनका काम उपलब्ध है | इस कारण से कह / मान सकते हैं कि नंदा के काम से कला प्रेक्षकों का पहले से जो परिचय है, उनकी एकल प्रदर्शनी उस परिचय को और प्रगाढ़ बनाने का ही काम करेगी | नंदा के काम से जो लोग परिचित हैं और उनके काम को लगातार देखते रहे हैं उन्होंने, पीछे हुई समूह प्रदर्शनी में प्रदर्शित उनके काम को देख कर महसूस किया कि उनके काम में न सिर्फ विषय-वस्तु बदल रही है बल्कि वह समकालीन कला के मुहावरे को पकड़ने की कोशिश भी कर रहा है | इसीलिए नंदा के चित्रों की एकल प्रदर्शनी को लेकर उनके काम से परिचित लोगों के बीच खासी उत्सुकता है |
नंदा गुप्ता ने अपनी कला-यात्रा लैंडस्केप चित्रों से की थी | उन्होंने मानवीय आकृतियों - खासकर चेहरों और चेहरों पर आते-जाते भावों को चित्रित करने में भी खासी दिलचस्पी ली थी | दरअसल प्रकृति ने उन्हें एक व्यक्ति के रूप में भी और एक चित्रकार के रूप में भी गहरे तक प्रभावित किया है; तथा प्रकृति की जादूगरी व उसकी रहस्यमयता ने उन्हें हैरान भी किया और सवालों में उलझाया भी | इस उलझन ने उन्हें अहसास कराया कि जैसे उनसे कुछ छूट रहा है | उलझन से बाहर निकलने और छूट रहे को पहचानने व उसे बनाये रखने तथा वापस पाने की कोशिश में नंदा आध्यात्म व साधना की शरण में गईं तो जैसे उन्होंने अपने आप को और ज्यादा प्रखरता से जानना व पहचानना शुरू किया | सोच में और जीवन में आ रहे इस बदलाव का असर उनकी पेंटिंग्स पर पड़ना स्वाभाविक ही था और वह पड़ा भी | लैंडस्केप, मानवीय आकृतियों व वास्तविक जीवन की वस्तुओं को अपनी पेंटिंग्स का विषय बना रहीं नंदा ने अचानक से अमूर्त रूपाकारों की तरफ अपना कदम बढ़ा लिया |
नंदा गुप्ता की कला-यात्रा को आगे बढ़ाने और एक सुनिश्चित दिशा देने में कविता जायसवाल तथा सुनंदो बसु की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही | नंदा ने कला की औपचारिक शिक्षा का पहला पाठ कविता जायसवाल से सीखा, जिन्होंने उन्हें कला की बुनियादी बारीकियों से परिचित कराने के साथ-साथ प्रयोगों के लिये व केनवस पर खुलकर 'खेलने' के लिये प्रेरित किया | बाद में, नंदा ने जब सुनंदो बसु के 'स्कूल' में कला प्रशिक्षण पाना शुरू किया तो सुनंदो ने उन्हें केनवस पर किए जाने वाले 'खेल' को व्यवस्थित रूप देने की सीख दी | सुनंदो की उस बात की तो जैसे उन्होंने गांठ बांध ली कि उन्हें इतना काम करना है, काम में ऐसा ध्यान लगाना है कि वह सपने भी देखें तो पेंटिंग के ही देखें | इस का जो नतीजा निकला वह यह कि नंदा के काम की अपनी एक विशिष्ट शैली बन गई और उनकी पेंटिंग्स का मूल स्वभाव पहचाना जाने लगा |
नंदा गुप्ता के नये काम को देख कर लगता है कि उनकी कला में रंग जैसे अपनी एक निश्चित भूमिका बनाना चाहते हैं | उनके प्रायः प्रत्येक चित्र में एक रंग का ही प्रभुत्व मिलेगा, जिसके साथ और एक या दो रंग इस तरह प्रस्तुत किए गये हैं कि दोनों या तीनों आपस में पूरक न बन कर, एक दूसरे को और अधिक उभारें | नंदा के चित्रों को अमूर्त दृश्यचित्र भी कह सकते हैं, क्योंकि उनमें जाने-पहचाने या परिचित लगने जैसे कोई आकार या आकृति नहीं हैं | चित्रों में एक विस्तार, फैलाव भी है जिसे विभिन्न रंगों से, या एक ही रंग की गहरी, घनी या हल्की वर्णच्छ्टा से विभाजित किया है | इस विभाजन में कहीं गहराई बनती है तो कहीं विस्तार आकार लेता है | केनवस पर नंदा ने जो किया है, उसमें हम एक 'अचरज' भी ढूंढ या पहचान सकते हैं | यह अचरज सहज अचरज है | कुछ उसी तरह का जो कुछ चीजें अपने में कई तरह के चित्र विचित्र आकार छिपाये होने के भ्रम से देती हैं; और जिनमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं | उनके चित्रों में लेकिन सिर्फ अचरज ही नहीं है | नंदा ने रंगों व रंग-छायाओं का जो एक सुमेल प्रस्तुत किया है, उसमें हम एक उड़ान, मिथक, विश्वास, स्वप्न और कल्पना के कई संदर्भ बनते भी देख सकते हैं |
नंदा गुप्ता ने जिस तेजी से अपनी कला का परिष्कार किया है, उससे कला के प्रति उनकी ललक का और सीखने की उनकी सामर्थ्य का सुबूत भी मिलता है | कला के प्रति अपनी ललक तथा सीखने की अपनी ज़िद को यदि वह लगातार बनाये रख सकीं, तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में उनके और उम्दा व परिष्कृत चित्रों को देखने का सुख व सौभाग्य मिलेगा |

Tuesday, February 9, 2010

कोलकाता को देखते हुए, बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव रहा

कोलकाता पहुंचा तो जरूरी कामों की फेहरिस्त में बिकास भट्टाचार्य का काम देखना भी दर्ज था, जिसे मैं किसी भी हालत में पूरा कर लेना चाहता था | बिकास भट्टाचार्य का काम यूं तो मैंने दिल्ली में कई बार देखा है, लेकिन एक बार किसी ने कहा था कि कोलकाता में घूमते / रहते हुए बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव होता है | कुछेक वर्ष पहले, यह सुन कर मैंने जैसे ठान लिया था कि जब भी कोलकाता जाऊँगा पहला काम बिकास भट्टाचार्य की पेंटिंग्स देखने का करूंगा | मैंने ठान तो लिया था लेकिन बात आई-गई सी हो गई थी, क्योंकि कोलकाता जाने का कोई मौका ही नहीं मिला | लेकिन लगता है कि जो ठाना था, वह गहरे घर कर गया था; क्योंकि रोटरी इंटरनेशनल के एक कार्यक्रम में कोलकाता जाने का प्रोग्राम जब सचमुच बना और कार्यक्रम के स्थानीय आयोजक ने पूछा कि कोलकाता में मैं कहाँ कहाँ जाना चाहूँगा, तो जैसे बेसाख्ता मेरे मुंह से यही निकला की मैं वहाँ बिकास भट्टाचार्य का काम जरूर देखना चाहूँगा | मैं यह सचमुच जानना / समझना चाहता था कि जिस किसी ने भी यह कहा था कि - कोलकाता में घूमते / रहते हुए या कहें कि कोलकाता को देखते हुए बिकास भट्टाचार्य के काम को देखना एक अलग ही तरह का अनुभव होता है, वह यूं ही कहा था या उस कहे हुए के कोई खास मतलब भी थे |
बिकास भट्टाचार्य के काम और उनके चित्रकार बनने की कथा ने मुझे यूं भी खासा उद्वेलित किया है | उन्होंने अपनी कला को जिस तरह सामाजिक यथार्थ से जोड़ा और उनके आसपास की ज़िन्दगी व दिन-प्रतिदिन के अनुभव, संवेग, विचार उनके आत्म प्रत्यक्षीकृत हो उनके चित्रों में आकार ग्रहण करते रहे; और जो देश, काल व समाज के यथार्थ के साथ उसकी विसंगतियों व विद्रूपताओं को उजागर करने का जरिया बने - वह बिकास भट्टाचार्य के विजन तथा अपने विजन को केनवस पर ट्रांसफर करने की उनकी कलात्मक सामर्थ्य को प्रकट करती है | उन्होंने यह विजन और सामर्थ्य कहाँ से पाया - इसे जानने / समझने में उनके जीवन के शुरुआती दिनों के उनके संघर्ष की कथा काफी मदद करती है |
बिकास भट्टाचार्य का जन्म सीलन, गंदगी और अभावों से भरी एक मलिन बस्ती के एक बहुत ही साधारण से परिवार में हुआ था | उनके जन्म लेने के कुछ ही समय बाद उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया था | परिवार चलाने के लिये उनकी विधवा माँ को मजदूरी करनी पड़ी | उससे भी मुश्किल से ही गुजारा हो पाता | इसी कारण, बिकास को होश सँभालते-सँभालते ही मजदूरी करने के लिये मजबूर होना पड़ा | बिकास ने बचपन तो जैसे 'देखा' ही नहीं | गरीबी, अभाव, मजबूरी और संघर्ष के बीच ही बिकास ने न सिर्फ होश संभाला, बल्कि अपने जीवन की दिशा भी तय की; और यहीं उनमें कला के बीज पड़े / पनपे | पच्चीस वर्ष की उम्र में बिकास ने अपने चित्रों की जो पहली एकल प्रदर्शनी की, उसने कोलकाता के लोगों के बीच इस कारण से धूम मचाई थी क्योंकि उनके चित्रों में उपेक्षित व शनै-शनै मरते हुए कोलकाता की सच्चाई को उदघाटित किया गया था |
बिकास भट्टाचार्य ने अपनी पहली ही प्रदर्शनी से कोलकाता के कला जगत में अपनी धाक जमा ली थी, जिसके बाद फिर उनके लिये राष्ट्रिय व अंतर्राष्ट्रीय ख्याति बहुत दूर नहीं रह गई थी | बिकास अभी तीस वर्ष के भी नहीं हुए थे कि उनकी पेंटिंग्स को पेरिस की द्विवार्षिकी में स्थान मिला | इकतीस वर्ष की उम्र में उन्हें ललित कला अकादमी का पुरस्कार मिला | देश-विदेश की अनेकों प्रतिष्ठित प्रदर्शनियों और आर्ट गैलरियों में उनके चित्रों को सम्मानपूर्ण तरीके से स्थान मिला और उन्हें ढेर सारा मान व प्रशंसा | इसके बावजूद बिकास इस सम्मान और प्रशंसा से नहीं, बल्कि अपने काम से पहचाने गये हैं | शहरी बंगाली मध्य वर्ग की मानसिकता को, उसके सामाजिक परिवेश को, उसकी विसंगति व विद्रूपता को जिस गहरी समझ व दोटूक ढंग से बिकास भट्टाचार्य ने केनवस पर चित्रित किया है - वह अपने आप में कला प्रेक्षकों के लिये एक अनोखा अनुभव रहा; और उनके इसी अनोखे अनुभव ने बिकास भट्टाचार्य को बड़ा कलाकार तो बनाया ही, उन्हें खास पहचान भी दी |
बिकास भट्टाचार्य की इस पहचान ने पेंटिंग्स के उद्देश्यपरक होने की बात को स्वीकृति व मान दिलाने का काम भी किया | अन्यथा इस बात को हेय रूप में देखा / माना जाता था | अपने इस काम के जरिये बिकास ने समकालीन कला को एक नई भाषा और एक नया व्याकरण दिया | बिकास भट्टाचार्य का विश्वास चूंकि यथार्थवादी चित्रण में रहा है, इसी कारण से उनके बनाये चित्र प्रायः फोटो जैसे दिखते हैं; हालाँकि कथ्य के अनुरूप उन्होंने अक्सर चित्रों में की आकृतियों का विरूपीकरण भी किया है | उनका मानना और कहना रहा है - जिसे उन्होंने अपने चित्रों में अभिव्यक्त भी किया है - कि चित्र को दर्शक के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, न कि उसे चित्रकार के विचारों को संप्रेषित करने का काम | बिकास भट्टाचार्य ने कोलकाता में अभाव, गरीबी व मजबूरी के शिकार लोगों के बीच अपना बचपन व किशोरावस्था बिताते हुए जीवन-जगत की जिस सच्चाई को पहचाना उसे ही कलात्मक संवेदना के साथ केनवस पर उकेरा | यही कारण रहा कि उनकी कला ने दर्शक के साथ विश्वास का रिश्ता बनाया | कोलकाता में घूमते / रहते हुए बिकास भट्टाचार्य के काम को देखते हुए इस रिश्ते की व्यापकता व गहराई की और-और परतें मैंने खुलती हुई पाईं तथा पहचानीं |

Monday, January 25, 2010

कृष्ण खन्ना के काम का सिंहावलोकन

सैफरन आर्ट द्वारा ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में इन दिनों कृष्ण खन्ना की रेट्रोस्पेक्टिव - सिंहावलोकन प्रदर्शनी आयोजित की जा रही है, जिसमें उनके पिछले पचास वर्षों में किए गये कामों में से एक सौ बीस कामों को प्रदर्शित किया गया है | प्रदर्शनी में एक विस्तृत कैटलॉग भी उपलब्ध है | प्रदर्शनी कृष्ण खन्ना के कुल कामकाज की एक व्यापक झलक पेश करती है | पिछले पचास वर्षों की अपनी रचना-यात्रा में कृष्ण खन्ना की कला ने कई मोड़ और पड़ाव देखे हैं | इसी का नतीजा है कि रचना-विधियों और चित्र-भाषा के मामले में हमें उनके काम में खासी विविधता देखने को मिलती है | कृष्ण खन्ना ने अपने आस-पास की 'दुनिया' से अपनी पेंटिंग्स के लिये विषय चुने | मुंबई में उन्होंने औद्योगिक मजदूरों की मुश्किलों व पीड़ाओं को करीब से देखा और उन्हें अपनी पेंटिंग्स में व्यक्त किया | श्रमिक स्त्री-पुरूषों की तकलीफों व मुश्किल ज़िन्दगी को कृष्ण खन्ना ने जिस संलग्नता व संवेदनशीलता से अपनी पेंटिंग्स में जगह दी, वैसा दूसरा उदाहरण शायद ही कोई मिलेगा |
कृष्ण खन्ना यूँ तो फिगरेटिव पेंटर हैं - और अपनी कलात्मक ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में अमूर्तन पर उन्होंने कभी विश्वास नहीं किया - लेकिन रेखाओं की अनुपस्थिति के कारण तथा रंगों के फार्म की तरह इस्तेमाल होने के चलते उनकी कई पेंटिंग्स अमूर्त काम की श्रेणी में आ जाती हैं | इस तरह का प्रयोग कृष्ण खन्ना के साथ-साथ पचास से साठ के दशक में उभरे दूसरे कलाकारों जैसे रामकुमार, मकबूल फ़िदा हुसैन, केजी सुब्रह्मण्यम आदि की भी खासियत रही है | इनकी बहुत सी पेंटिंग्स 'दिखती' तो फिगरेटिव हैं, लेकिन अपने रंग पैटर्न के कारण वह आती अमूर्तन की श्रेणी में हैं | ऐसा संभवतः इस कारण हुआ होगा कि पेंट करते समय इन कलाकारों ने विषय की तुलना में पेंटिंग्स को लेकर ज्यादा चिंता की होगी | टैक्सचर, रंगों के टोन तथा फोर्स पर बल देने को लेकर सभी में अपने-अपने ढंग की विशेषता है, सबने अपने-अपने ढंग से इन तत्त्वों का प्रयोग किया | कई तरह की समानताएं होते हुए भी सभी की अपनी-अपनी स्टाइल बनी, उनके चित्रों में उनकी स्टाइल को अभिव्यक्त होते हुए देखा गया और उनकी स्टाइल ही फिर उनकी पहचान बनी | कृष्ण खन्ना की पेंटिंग्स में - जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है - रंग ही फार्म है जो अंतर्वस्तु के बहुत अनुकूल प्रयुक्त हुआ है | कृष्ण खन्ना देश के उन शीर्षस्थ कलाकारों में हैं जिन्होंने समकालीन भारतीय कला को न केवल समृद्ध किया, बल्कि तमाम युवा कलाकारों को प्रेरित व दिशा-निर्देशित भी किया | कृष्ण खन्ना प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के अत्यंत सक्रिय सदस्य रहे और अपनी सक्रियता के भरोसे ही उन्होंने ग्रुप की कलात्मक व वैचारिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाई थी | जे. स्वामीनाथन उनके अच्छे मित्र थे लेकिन इसके बावजूद उनके साथ के अपने वैचारिक मतभेदों को प्रकट करने में उन्होंने कभी हिचक नहीं दिखाई | स्वामीनाथन दरअसल समकालीन भारतीय कला को भारतीय सौंदर्यशास्त्र, उसमें भी खासतौर से जनजातीय कला से विकसित करने के पक्ष में थे, जबकि कृष्ण खन्ना समकालीन कला को पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र की बजाये अंतर्राष्ट्रीय बनाने के पक्ष में थे | स्वामीनाथन इतिहास को मृत मानते थे, जबकि कृष्ण खन्ना व्यक्ति की ऐतिहासिकता को न सिर्फ स्वीकार करते थे बल्कि उसे महत्त्वपूर्ण भी मानते रहे | अमूर्तता की हदों तक पहुँचते-पहुँचते हुए भी अपनी पेंटिंग्स में कृष्ण खन्ना ने कभी आकृतियों को विलीन नहीं होने दिया; उन्होंने कभी शून्य में जाने की जाने की कोशिश नहीं की | अपनी पेंटिंग्स में, व्यक्ति की ऐतिहासिकता और ऐहिकता को पहचानने की कोशिश करते हुए उसे, उन्होंने लगातार व्यक्त करने का काम ही   किया | यही वह 'जगह' है - जहाँ उनकी राह स्वामीनाथन की राह से अलग होती है |
स्वामीनाथन और कृष्ण खन्ना के बीच के वैचारिक संघर्ष को दक्षिणपंथी व वामपंथी संघर्ष के रूप में भी देखा/पहचाना गया | हालाँकि कृष्ण खन्ना प्रचलित अर्थों में कभी भी वामपंथी नहीं रहे | स्वामीनाथन के साथ चले वैचारिक संघर्षों के बावजूद, कृष्ण खन्ना ने 'बैंड वाला' शीर्षक से सामाजिक यथार्थवादी विषयों पर जो
चित्र-श्रृंखला तैयार की थी, उसका कैटलॉग उन्होंने स्वामीनाथन से ही लिखवाया और स्वामीनाथन ने ही उसे लिखा |
कृष्ण खन्ना का जन्म 1925 में ल्यालपुर, पाकिस्तान का जो शहर अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है, में हुआ था |  जन्म के बाद लेकिन उनका परिवार लाहौर आ गया था, जहाँ वह पले/बढ़े | ग्रेजुएशन हालाँकि उन्होंने इंग्लैंड के इम्पीरियल सर्विस कॉलिज से 1940 में किया था | देश के विभाजन के बाद कृष्ण खन्ना का परिवार शिमला आ गया था | भारत में कृष्ण खन्ना ने ग्रिंडलेज़ बैंक में नौकरी प्राप्त की और उन्हें मुंबई में पोस्टिंग मिली | मुंबई में ग्रिंडलेज़ बैंक की नौकरी करते हुए ही कृष्ण खन्ना प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संपर्क में आये; और उसी संपर्क के साथ उन्होंने कला जगत में प्रवेश किया | कला से उनका परिचय हालाँकि लाहौर  में हो गया था, जहाँ उन्होंने मेयो कॉलिज ऑफ ऑर्ट में शाम की कक्षाओं में दाखिला लिया था | कला की औपचारिक शिक्षा के नाम पर उन्होंने यही कुछ किया था | मुंबई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संपर्क में आने के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं     देखा | देश में नहीं, विदेशों में भी कृष्ण खन्ना ने न सिर्फ अपनी कला को प्रदर्शित किया, बल्कि तमाम प्रशंसा व पुरस्कार भी प्राप्त किए | देश में भी उनकी कला  को खास सम्मान मिला | 1996 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया | मजेदार संयोग है कि कृष्ण खन्ना की पहली पेंटिंग टाटा समूह के टाटा इंस्टीट्यूट के डॉक्टर होमी भाभा ने खरीदी थी, तो सैफरन आर्ट द्वारा आयोजित इस पुनरावलोकन प्रदर्शनी को संभव बनाने में भी टाटा समूह की टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड का सहयोग रहा   है |
कृष्ण खन्ना के काम की सिंहावलोकन प्रदर्शनी को देखना अपने आप में एक खास अनुभव है | समकालीन कला में दिलचस्पी रखने वालों को यह प्रदर्शनी अवश्य ही देखना चाहिए | ललित कला अकादमी की दीर्घाओं में इस प्रदर्शनी को पांच फरवरी तक देखा जा सकता है |