आज का मेरा दिन प्रखर चित्रकार और बुद्विजीवी जगदीश स्वामीनाथन के नाम रहा | यह याद करते हुए कि आज स्वामीनाथन का जन्मदिन है, मैंने आज का दिन विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा इंटरनेट पर उपलब्ध स्वामीनाथन की पेंटिंग्स के चित्रों को देखते हुए और उनके बारे में छपी/लिखी सामग्री को पढ़ते हुए बिताया | स्वामीनाथन का जन्म वर्ष 1928 में आज के ही दिन शिमला में बसे एक तमिल परिवार में हुआ था | यह जान कर मुझे किंचित हैरानी भी हुई कि चित्रकला में उनकी दिलचस्पी यूँ तो बचपन से ही थी, लेकिन इसे गंभीरता से उन्होंने बहुत बाद में अपनाया | गंभीरता से उन्होंने पहला काम दिल्ली के हिंदू कॉलिज से प्री-मेडीकल की पढ़ाई का किया, पर इसमें ज्यादा दिन उनका मन नहीं लगा | पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में उनका रुझान पैदा हुआ | राजनीतिक जीवन की शुरूआत उन्होंने कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी से की और फिर कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए | राजनीतिक जीवन में ही उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता भी की और बच्चों के लिये कहानियां भी लिखीं | राजनीति से मोहभंग होने के बाद उन्होंने चित्रकला की तरफ कदम बढ़ाया और गंभीरतापूर्वक चित्रकला में रम गये | चित्रकला अपनाने के दौरान उन्होंने कुछ समय हालाँकि पत्रकारिता भी की और काफी कविताएँ भी लिखीं, लेकिन उनकी सक्रियता का मुख्य केंद्र चित्रकला ही रही | चित्रकला संसार में स्वामीनाथन की सक्रियता एक विचारोत्तेजक और उत्कट घटना की तरह देखी/पहचानी गई | जगदीश स्वामीनाथन के जन्मदिन के मौके पर आज उनकी रचनाओं से आमना-सामना करते हुए मैं उनकी 'दूसरा पहाड़' शीर्षक कविता को बार-बार याद करता रहा जो करीब तीस वर्ष पहले लिखी तथा प्रकाशित हुई थी | यहाँ मैं उनकी इस 'दूसरा पहाड़' शीर्षक कविता को दोहराना चाहूँगा :
यह जो सामने पहाड़ है
इसके पीछे एक और पहाड़ है
जो दिखाई नहीं देता
धार धार चढ़ जाओ इसके ऊपर
राणा के कोट तक
और वहाँ से पार झाँको
तो भी नहीं
कभी कभी जैसे
यह पहाड़
धुंध में दुबक जाता है
और फिर चुपके से
अपनी जगह लौट कर ऐसे थिर हो जाता है
मानों कहीं गया ही न हो
- देखो न
वैसे ही आकाश को थामे खड़े हैं दयार
वैसे ही चमक रही है घराट की छत
वैसे ही बिछी हैं मक्की की पीली चादरें
और डिंगली में पूंछ हिलाते डंगर
ज्यों के त्यों बने हैं, ठूँठ सा बैठा है चरवाहा
आप कहते हो, वह पहाड़ भी
वैसे ही धुंध में लुपका है, उबर जायेगा
अजी जरा आकाश को तो देखो
कितना निम्मल है
न कहीं धुंध न कोहरा न जंगल के ऊपर अटकी
कोई बदल की फुही
वह पहाड़ दिखायी नहीं देता महाराज
उस पहाड़ में गूजरों का एक पड़ाव है
वह भी दिखाई नहीं देता
न गूजर, न काली पोशाक तनी
कमर वाली उनकी औरतें
न उन के मवेशी न झवड़े कुत्ते
रात में जिनकी आँखें
अंगारों सा धधकती हैं
इस पहाड़ के पीछे जो वादी है न महाराज
वह वादी नहीं, उस पहाड़ की चुप्पी है
जो बघेरे की तरह घात लगाये बैठा है
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Dhanyvaad Mukesh Ji. Aapne J. Swaminathan ko yaad karke unki kavita ki prastuti dekar unki paintings ke PAHAAD ko jeevant kar diyaa... punah dhanyavaad...
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