
प्रख्यात कलालोचक पॉल गोथिये ने उनका परिचय देते हुए वर्षों पहले लिखा था :
'रजा एक भारतीय कलाकार हैं, जो अब पेरिस में जा बसे हैं |' सैयद हैदर रजा के मन में फ्रांस सरकार की फेलोशिप मिलने से पहले ही फ्रांस के प्रति एक उत्सुकता पैदा हो गई थी | रजा ने बताया है कि उन दिनों - उन दिनों यानि बोम्बे ऑर्टिस्ट ग्रुप के गठन के दिनों में - एक किताब ने उनकी कल्पना को झिंझोड़ दिया था | इरविंग स्टोन की वह किताब थी - लस्ट फॉर लाइफ, जो दरअसल विन्सेंट वॉन गॉग की जीवनी है | रजा को यह तो पता ही था कि विन्सेंट वॉन गॉग एक ऊंचे दर्जे के कलाकार थे, जो फ्रांस में काम करते रहे और वहीं जिनका निधन हुआ था | उन्हीं दिनों - वर्ष 1949 में मुंबई में फ्रेंच कांसुलेट द्वारा आयोजित जीवित फ्रेंच चित्रकारों के काम की बड़ी अनुकृतियों की एक प्रदर्शनी हुई | रजा ने समझ लिया था कि कला के विस्तृत स्त्रोतों तक यदि पहुँच बनानी है तो उन्हें फ्रांस जाना ही होगा | पेरिस उन दिनों यूं भी समकालीन कला का एक स्पंदित केंद्र था |
सैयद हैदर रजा ने पेरिस में समकालीन कला की दुनिया से परिचय ही प्राप्त नहीं किया, पेंटिंग को पहचानने का नजरिया भी पाया | उन्होंने स्वीकार किया है कि 1951 - 52 से पहले दरअसल पेंटिंग की असलियत को वह समझते ही नहीं थे | प्रकृति के, रंगों के, लैंडस्केपों के कुछ प्रभाव थे जिन्हें वह एक चित्रनिर्मिति (कंस्ट्रक्शन) में बदल दिया करते थे | उन्होंने कहा है कि यह तो बाद में ही जाना कि आप्टिकल रियलिटी (आँख-यथार्थ) अपने-आप में काफी नहीं है या कि वह पूरा यथार्थ नहीं है | जो चीज चित्र को चित्र बनाती है, वह केवल ऊपर से दीख पड़ने वाली चीज नहीं है | जब चित्र अपनी साँस ले, तभी वह चित्र है | रजा ने 1948 से 1951 तक बहुत काम किया | अपनी पूरी याद के साथ उन्होंने बताया है कि 1949 में उन्होंने करीब तीन सौ चित्र बनाये थे | उन दिनों वह केरल, मद्रास, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, श्रीनगर की कई जगहों तथा कई शहरों में गये थे | वहाँ के जो ढेरों प्रभाव थे और मन में जो ढेरों दृश्य घूमते थे, रजा उन्हें अपने चित्रों में ले आते थे | रजा ने कहा है कि पेरिस पहुँच कर उन्होंने जो देखा / समझा तो पाया कि अभी तक वह जो कर रहे हैं यदि वही करते रहे तो वह तो खो जायेंगे | उन्होंने इस बात को समझा कि उन्हें आप्टिकल रियलिटी से छुटकारा पाना होगा और अपने अंदर की बात ढूंढनी होगी | तब उन्होंने चित्र के आंतरिक जीवन (इनर लाइफ) को तलाशने, चित्र की संगीतात्मक संरचना को समझने, रंगों के साथ एक नया संबंध बनाने का काम शुरू किया; और चाक्षुक यथार्थ (विजुअल रियलिटी) के मर्म को वास्तव में पहचानने का प्रयास किया | रजा ने बहुत साफ शब्दों में स्वीकार किया
है कि सचमुच पहली पेंटिंग उन्होंने पेरिस में 1952 में बनाई |
रजा की कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति को संपन्न करने में फ्रांस की आबोहवा का निस्संदेह बहुत योगदान रहा है; लेकिन भारतीय स्त्रोत उनमें बहुत गहरे और अखंड रूप में मौजूद रहे हैं | पॉल गोथिए ने लिखा है कि इन दोनों संसारों के* *बीच उन्होंने अपनी कला का एक ऐसा पुल बांध लिया है जो न तो आधुनिक कला की विशिष्टताओं को नजरअंदाज करता है, और न ही अपनी जड़ों से कतई कटा हुआ है - उनकी कला वस्तुगत स्तर पर समय-काल के परे है, और शैलीगत स्तर पर पूरी तौर से आधुनिक | सैयद हैदर रजा के बनाये चित्र एक जीवंत सार्वभौमिक कला के भौतिक प्रतिरूप हैं | सैयद हैदर रजा के अठ्ठासीवें जन्मदिन के मौके पर इस बात को रेखांकित करना अच्छा भी लग रहा है और रजा पर व अपने बीच उनकी उपस्थिति पर गर्व भी हो रहा है |
रजा साहब दमोह के गुरूगोविन्द स्कूल में पढ़े और जब भी दमोह आते हैं तो स्कूल जरूर जाते हैं। पिछले वर्ष जब दमोह आते, लाखों रूपये स्कूल के लिए दे जाते हैं । पर स्कूल बैसा ही पिछडा हुआ है। उनके नाम से एक हाल बनवा दिया हे। लेकिन सारा स्कूल बुरी स्थिति में है। आप उन तक यह समाचार जरूर भिजवायें ।
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