Thursday, February 11, 2010

नंदा गुप्ता ने केनवस पर जो किया है, उसमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं

नंदा गुप्ता के चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी 12 फरवरी से नई दिल्ली की गीता आर्ट गैलरी में शुरू हो रही है | इस प्रदर्शनी को 28 फरवरी तक देखा जा सकेगा | नंदा इससे पहले एक समूह प्रदर्शनी में अपने चित्रों को प्रदर्शित कर चुकी हैं, तथा कुछेक आर्ट गैलरीज के संग्रहों में उनका काम उपलब्ध है | इस कारण से कह / मान सकते हैं कि नंदा के काम से कला प्रेक्षकों का पहले से जो परिचय है, उनकी एकल प्रदर्शनी उस परिचय को और प्रगाढ़ बनाने का ही काम करेगी | नंदा के काम से जो लोग परिचित हैं और उनके काम को लगातार देखते रहे हैं उन्होंने, पीछे हुई समूह प्रदर्शनी में प्रदर्शित उनके काम को देख कर महसूस किया कि उनके काम में न सिर्फ विषय-वस्तु बदल रही है बल्कि वह समकालीन कला के मुहावरे को पकड़ने की कोशिश भी कर रहा है | इसीलिए नंदा के चित्रों की एकल प्रदर्शनी को लेकर उनके काम से परिचित लोगों के बीच खासी उत्सुकता है |
नंदा गुप्ता ने अपनी कला-यात्रा लैंडस्केप चित्रों से की थी | उन्होंने मानवीय आकृतियों - खासकर चेहरों और चेहरों पर आते-जाते भावों को चित्रित करने में भी खासी दिलचस्पी ली थी | दरअसल प्रकृति ने उन्हें एक व्यक्ति के रूप में भी और एक चित्रकार के रूप में भी गहरे तक प्रभावित किया है; तथा प्रकृति की जादूगरी व उसकी रहस्यमयता ने उन्हें हैरान भी किया और सवालों में उलझाया भी | इस उलझन ने उन्हें अहसास कराया कि जैसे उनसे कुछ छूट रहा है | उलझन से बाहर निकलने और छूट रहे को पहचानने व उसे बनाये रखने तथा वापस पाने की कोशिश में नंदा आध्यात्म व साधना की शरण में गईं तो जैसे उन्होंने अपने आप को और ज्यादा प्रखरता से जानना व पहचानना शुरू किया | सोच में और जीवन में आ रहे इस बदलाव का असर उनकी पेंटिंग्स पर पड़ना स्वाभाविक ही था और वह पड़ा भी | लैंडस्केप, मानवीय आकृतियों व वास्तविक जीवन की वस्तुओं को अपनी पेंटिंग्स का विषय बना रहीं नंदा ने अचानक से अमूर्त रूपाकारों की तरफ अपना कदम बढ़ा लिया |
नंदा गुप्ता की कला-यात्रा को आगे बढ़ाने और एक सुनिश्चित दिशा देने में कविता जायसवाल तथा सुनंदो बसु की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही | नंदा ने कला की औपचारिक शिक्षा का पहला पाठ कविता जायसवाल से सीखा, जिन्होंने उन्हें कला की बुनियादी बारीकियों से परिचित कराने के साथ-साथ प्रयोगों के लिये व केनवस पर खुलकर 'खेलने' के लिये प्रेरित किया | बाद में, नंदा ने जब सुनंदो बसु के 'स्कूल' में कला प्रशिक्षण पाना शुरू किया तो सुनंदो ने उन्हें केनवस पर किए जाने वाले 'खेल' को व्यवस्थित रूप देने की सीख दी | सुनंदो की उस बात की तो जैसे उन्होंने गांठ बांध ली कि उन्हें इतना काम करना है, काम में ऐसा ध्यान लगाना है कि वह सपने भी देखें तो पेंटिंग के ही देखें | इस का जो नतीजा निकला वह यह कि नंदा के काम की अपनी एक विशिष्ट शैली बन गई और उनकी पेंटिंग्स का मूल स्वभाव पहचाना जाने लगा |
नंदा गुप्ता के नये काम को देख कर लगता है कि उनकी कला में रंग जैसे अपनी एक निश्चित भूमिका बनाना चाहते हैं | उनके प्रायः प्रत्येक चित्र में एक रंग का ही प्रभुत्व मिलेगा, जिसके साथ और एक या दो रंग इस तरह प्रस्तुत किए गये हैं कि दोनों या तीनों आपस में पूरक न बन कर, एक दूसरे को और अधिक उभारें | नंदा के चित्रों को अमूर्त दृश्यचित्र भी कह सकते हैं, क्योंकि उनमें जाने-पहचाने या परिचित लगने जैसे कोई आकार या आकृति नहीं हैं | चित्रों में एक विस्तार, फैलाव भी है जिसे विभिन्न रंगों से, या एक ही रंग की गहरी, घनी या हल्की वर्णच्छ्टा से विभाजित किया है | इस विभाजन में कहीं गहराई बनती है तो कहीं विस्तार आकार लेता है | केनवस पर नंदा ने जो किया है, उसमें हम एक 'अचरज' भी ढूंढ या पहचान सकते हैं | यह अचरज सहज अचरज है | कुछ उसी तरह का जो कुछ चीजें अपने में कई तरह के चित्र विचित्र आकार छिपाये होने के भ्रम से देती हैं; और जिनमें हम अपनी संवेदना और समझ को बार-बार कुछ टोहता हुआ पाते हैं | उनके चित्रों में लेकिन सिर्फ अचरज ही नहीं है | नंदा ने रंगों व रंग-छायाओं का जो एक सुमेल प्रस्तुत किया है, उसमें हम एक उड़ान, मिथक, विश्वास, स्वप्न और कल्पना के कई संदर्भ बनते भी देख सकते हैं |
नंदा गुप्ता ने जिस तेजी से अपनी कला का परिष्कार किया है, उससे कला के प्रति उनकी ललक का और सीखने की उनकी सामर्थ्य का सुबूत भी मिलता है | कला के प्रति अपनी ललक तथा सीखने की अपनी ज़िद को यदि वह लगातार बनाये रख सकीं, तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में उनके और उम्दा व परिष्कृत चित्रों को देखने का सुख व सौभाग्य मिलेगा |

8 comments:

  1. जयंती रायFeb 11, 2010 04:36 PM
    पहली एकल प्रदर्शनी के अवसर पर नंदा गुप्ता को बधाई और शुभकामनायें |
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  2. आलोक त्रिवेदीFeb 11, 2010 04:55 PM
    किसी भी चित्रकार के लिये उसके चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी का खास महत्त्व होता है | नंदा गुप्ता के लिये खास महत्त्व का यह मौका संभावनाओं की राह भी बनाये, ऐसी हमारी कामना है |
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  3. संजीव कुमारFeb 11, 2010 05:41 PM
    समकालीन कला की दुनिया में नंदा गुप्ता का स्वागत है | उनके लिये बहुत सी शुभकामनायें |
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  4. राजेंद्र प्रसादFeb 11, 2010 06:28 PM
    कविता जायसवाल और सुनंदो बसु का काम मैंने देखा है, और दोनों का काम मुझे पसंद भी है | मैं उम्मीद करता हूँ कि इन दोनों से कला का प्रशिक्षण पाने वालीं नंदा गुप्ता का काम भी अच्छा ही होगा |
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  5. रजत नायकFeb 11, 2010 08:09 PM
    नंदा गुप्ता को पहली एकल प्रदर्शनी के मौके पर मेरी शुभकामनायें |
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  6. परमानन्द सक्सेनाFeb 12, 2010 08:00 AM
    नंदा गुप्ता के काम का आपने जो सघन, तत्त्वदर्शी और मूलबद्व आकलन किया है, उससे उनके काम का अच्छा परिचय मिलता है | इसके लिये आपका आभार और नंदा गुप्ता के लिये शुभकामनायें |
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  7. उदय चंद त्रिपाठीFeb 12, 2010 08:32 AM
    समकालीन कला के दबावों व प्रभावों से गुजरते हुए नंदा गुप्ता ने अपने चित्रों के लिये जो शैली प्राप्त की है, वह मैं समझता हूँ कि उन्होंने एक बड़ा काम किया है | जिस प्रखरता और कौशल से उन्होंने यह किया है, उसे देख / जान कर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि वह अपना एक खास मुकाम बना सकेंगी |
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  8. Brilliance of the Colours in Nanda gupta's Paintings. Her form, Which emerges out of the Personal interaction with the material, suggests multiple interpretations.
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