Saturday, March 27, 2010

परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों में जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है

परमिंदर सिंह संधू के मूर्तिशिल्पों को लेकर मैं पिछले कुछ समय से लगातार एक दिलचस्प अनुभव का साक्षी और सहभागी बना हुआ हूँ | पिछले कुछ समय में, जब भी मूर्तिशिल्प कला को लेकर किसी से कोई बात हुई और या मूर्तिशिल्प कला को लेकर हो रही बातचीत का मैं हिस्सा बना तो अधिकतर मौकों पर मैंने  दिल्ली के कलाकारों व कला प्रेक्षकों को परमिंदर के मूर्तिशिल्पों को लोगों को याद करते तथा रेखांकित करते हुए पाया है | परमिंदर एक युवा शिल्पकार हैं और अभी तक उनकी सक्रियता का केंद्र मौटे तौर पर चंडीगढ़ ही है | कहने को तो उन्होंने दीमापुर ( नागालैंड ), शांतिनिकेतन ( पश्चिम बंगाल ), नागपुर ( महाराष्ट्र ), उदयपुर ( राजस्थान ), मुरथल ( हरियाणा ), भोपाल ( मध्य प्रदेश ) और नई दिल्ली में किसी समूह प्रदर्शनी या किसी प्रतियोगिता या किसी कैम्प में शामिल होने के बहाने से अपने काम को प्रदर्शित किया है; लेकिन बड़े स्तर पर अपने काम को प्रदर्शित कर पाने का अवसर उन्हें अभी भी प्राप्त करना है | नई दिल्ली में पिछले वर्ष जून में उन्होंने चंडीगढ़ के बाहर अपने शिल्पों की पहली एकल प्रदर्शनी जरूर की थी | मैंने अपने जिस अनुभव का ज़िक्र किया है, वह शायद आठ महीने पहले हुई उसी प्रदर्शनी का असर है | मुहावरे का सहारा लेँ तो कह सकते हैं कि परमिंदर के मूर्तिशिल्पों का जादू लोगों के जैसे सिर चढ़ कर बोल रहा है | उक्त प्रदर्शनी को देख सकने का सौभाग्य मुझे भी मिला था और परमिंदर के मूर्तिशिल्पों के साथ-साथ परमिंदर की काम करने की जिजीविषा ने मुझे भी प्रभावित किया था | मैंने अपने जिस अनुभव का ज़िक्र किया है, उससे मुझे स्वाभाविक रूप से यह भी पता चला ही है कि परमिंदर के काम से एक मैं ही प्रभावित नहीं हुआ था, बल्कि और कई लोगों को भी परमिंदर के काम ने छुआ है |  
सबसे पहले तो, ललित कला में सबसे दुस्साध्य और कठिन माध्यम के रूप में पहचाने जाने वाले मूर्तिशिल्प कला में किसी युवा कलाकर का काम करना ही लोगों को चौंकाता है | स्वाभाविक रूप से इस माध्यम में वही कलाकार काम करना पसंद करते हैं जो कठिन परिश्रम करने को तैयार होते हैं, तथाकथित सफलता पाने की जल्दी में नहीं होते हैं और कलाकार के रूप में कला-बाजार की उपेक्षा का खतरा उठाने से घबराते नहीं हैं | अमृतसर जिले की तरन तारन तहसील के गाँव छुटाला में वर्ष 1977 के फरवरी माह की तेरह तारिख को जन्मे परमिंदर सिंह संधू के काम को देखने वालों ने तो लेकिन यह भी रेखांकित किया है कि उन्होंने मूर्तिकला जैसे अधिक मेहनत और समय की मांग करने वाले दृश्यगत भाषा-माध्यम को सिर्फ चुना ही नहीं, बल्कि पूरी तल्लीनता और शिद्दत के साथ उसे निभाया भी है |
परमिंदर की कलाकृतियों में मानवा-कारों के साथ-साथ बीज व सर्प रूपाकारों और अमूर्त तत्त्वों को साफ़  देखा / पहचाना जा सकता है | उनकी प्रायः सभी कृतियों में 'एरॉटिक' तत्त्वों का समावेश है, लेकिन उनमें सौंदर्य की सूक्ष्मता तथा संयम दोनों को सहज ही महसूस किया जा सकता है | परमिंदर की कलाकृतियाँ माँसल ऐंद्रिकता से भरपूर हैं और जिनमें व्यक्त हुई परिष्कृत कला-चेतना की बारीकियाँ पहली बार में ही आकर्षित भी करती हैं और प्रभावित भी | परमिंदर के मूर्तिशिल्पों के रूपाकारों के सृजन में ऐंद्रिकता की कोमलता व रेखाओं की उदात्त मितव्ययिता का समावेश है, जिससे इन रूपाकारों के स्पर्श-संवेदन और रहस्यमय गत्यात्मकता में विलक्षणता प्रकट होती है | परमिंदर ने विविधतापूर्ण रूपाकारों की जो रचना की है, उनमें व्यक्त होने वाले अप्रत्याशित मोड़, उठान, प्रक्षेपन, दरारें और ढलानें आदि - सभी तत्त्व अपनी सामूहिकता में जिस कलात्मक लय का सृजन करते हैं, उसके चलते कलाकृति की सौंदर्यात्मक एकात्मकता में और भी श्रीवृद्वि हो जाती है |
मूर्तिशिल्प सृजन की अपनी सशक्त भाषा को विकसित कर चुके परमिंदर के टैक्सचर की विशेषता है कलाकृतियों में शिलाओं की रूक्षता और स्निग्धता के परस्पर विपरीत गुणों के बीच विद्यमान सृजनात्मक तथा दृश्यमूलक समन्वय स्थापित करना | मूर्तिशिल्प के उत्तेजक और कहीं-कहीं चमत्कारिक से लगते उठाव-गिराव उनकी वर्णात्मक लय को दर्शक के लिये और अधिक आकर्षक बना देते हैं, क्योंकि उनमें जीवन की लय और ताल थिरकती नज़र आती है | खासी मेहनत और निरंतर संलग्नता के भरोसे अपनी प्रतिभा को व्यापक रूप देते हुए परमिंदर ने वास्तव में मूर्तिकला में पंजाब की भागीदारी व उपस्थिति को और गाढ़ा बनाने का ही काम किया है, तथा धनराज भगत, अमरनाथ सहगल, वेद नैयर, बलबीर सिंह कट्ट, हरभजन संधू, शिव सिंह, ए सी सागर, अमरीक सिंह, अवतार सिंह आदि प्रमुख शिल्पकारों की परंपरा को और समृद्व करते जाने के प्रति आश्वस्त करने का ही काम किया है |      
परमिंदर सिंह संधू को पिछले ही वर्ष पंजाब ललित कला अकादमी ने सम्मानित किया है | पंजाब ललित कला अकादमी में सम्मानित होने का यह उनका दूसरा मौका था | इससे पहले, वर्ष 2004 में भी परमिंदर पंजाब ललित कला अकादमी के वार्षिक आयोजन में सम्मानित हो चुके थे | वर्ष 2008 में नागपुर में आयोजित हुई बाइसवीं अखिल भारतीय कला प्रतियोगिता में वह पुरुस्कृत हुए | उससे पिछले वर्ष, यानि वर्ष 2007 में चंडीगढ़ ललित कला अकादमी की वार्षिक कला प्रदर्शनी में परमिंदर का काम पुरुस्कृत हुआ था |
उससे भी पहले, वर्ष 2006 में आईफैक्स की 78 वीं वार्षिक कला प्रदर्शनी में परमिंदर सिंह को सम्मानित करने के लिये चुना गया था और वह दिल्ली में संपन्न हुए एक भव्य कार्यक्रम में कई कलाकारों के बीच सम्मानित हुए थे | आईफैक्स में सम्मानित होने का भी परमिंदर का यह दूसरा अवसर था | इससे पहले हालाँकि वह दिल्ली में नहीं, बल्कि चंडीगढ़ में सम्मानित हुए थे | चंडीगढ़ में वर्ष 2002 में आयोजित हुई आईफैक्स की राज्यस्तरीय प्रदर्शनी में उन्हें सम्मानित करने के लिये चुना गया था | ज़ाहिर तौर पर, परमिंदर सिंह संधू के काम को संस्थाओं की ओर से भी और लोगों से भी व्यापक सराहना मिली है | वास्तव में यह सराहना ही उनकी प्रतिभा और रचनात्मक क्षमता की गवाह भी है और सुबूत भी |

7 comments:

  1. हेमंत गोस्वामीMarch 28, 2010 at 5:58 PM

    परमिंदर के मूर्तिशिल्पों में जो रंगमंचीय सूझबूझ, वातावरणीय परिदृश्यता, अलंकर्णात्मक प्रवृत्ति और समकालीन संयोजन का ललित तालमेल अभिव्यक्त हुआ है, वह रुचिकर लगता है |
    परमिंदर के लिये बहुत शुभकामनायें |

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    1. Thanks for your precious complement hemani goswami ji

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  2. Kishore Kr. GhoshMarch 29, 2010 at 3:59 AM

    Vision of Parminder Singh towards art and an understanding of his socio-cultural milieu provide inputs for a better appreciation of his works. This helps in touching the core of his inner self, his thought process and his experiences over a period of time which are manifested in his sculptures.

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  3. Parminder's sculptures depict the musical and lyrical soul of life & society.He translated his vision in sculpture which shared smooth and rough surface on the same piece and had the depiction of undulating hillocks, streams and rivulets and shrubs.

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  4. प्रभात कुमार त्रिपाठीMarch 29, 2010 at 5:31 PM

    परमिंदर सिंह से परिचय कराना भा गया | उनका आकृतिपरक एप्रोच एक गहरा विचार देता है, जो विषयगत होने के साथ पूर्ण यथार्थपरक भी है |

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  5. Parminder perceives human bodies and structures in his own way and depicts his imaginations with clarity and purity. Interdependence of human form with non-human structures and their cohesion and co-existence with the world beyond them is not overstated.

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  6. i thank you for your precious words for me & my art . it give me motivation to excel in the field. thanks again,paramsculptor.

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