Monday, January 25, 2010

कृष्ण खन्ना के काम का सिंहावलोकन

सैफरन आर्ट द्वारा ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में इन दिनों कृष्ण खन्ना की रेट्रोस्पेक्टिव - सिंहावलोकन प्रदर्शनी आयोजित की जा रही है, जिसमें उनके पिछले पचास वर्षों में किए गये कामों में से एक सौ बीस कामों को प्रदर्शित किया गया है | प्रदर्शनी में एक विस्तृत कैटलॉग भी उपलब्ध है | प्रदर्शनी कृष्ण खन्ना के कुल कामकाज की एक व्यापक झलक पेश करती है | पिछले पचास वर्षों की अपनी रचना-यात्रा में कृष्ण खन्ना की कला ने कई मोड़ और पड़ाव देखे हैं | इसी का नतीजा है कि रचना-विधियों और चित्र-भाषा के मामले में हमें उनके काम में खासी विविधता देखने को मिलती है | कृष्ण खन्ना ने अपने आस-पास की 'दुनिया' से अपनी पेंटिंग्स के लिये विषय चुने | मुंबई में उन्होंने औद्योगिक मजदूरों की मुश्किलों व पीड़ाओं को करीब से देखा और उन्हें अपनी पेंटिंग्स में व्यक्त किया | श्रमिक स्त्री-पुरूषों की तकलीफों व मुश्किल ज़िन्दगी को कृष्ण खन्ना ने जिस संलग्नता व संवेदनशीलता से अपनी पेंटिंग्स में जगह दी, वैसा दूसरा उदाहरण शायद ही कोई मिलेगा |
कृष्ण खन्ना यूँ तो फिगरेटिव पेंटर हैं - और अपनी कलात्मक ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में अमूर्तन पर उन्होंने कभी विश्वास नहीं किया - लेकिन रेखाओं की अनुपस्थिति के कारण तथा रंगों के फार्म की तरह इस्तेमाल होने के चलते उनकी कई पेंटिंग्स अमूर्त काम की श्रेणी में आ जाती हैं | इस तरह का प्रयोग कृष्ण खन्ना के साथ-साथ पचास से साठ के दशक में उभरे दूसरे कलाकारों जैसे रामकुमार, मकबूल फ़िदा हुसैन, केजी सुब्रह्मण्यम आदि की भी खासियत रही है | इनकी बहुत सी पेंटिंग्स 'दिखती' तो फिगरेटिव हैं, लेकिन अपने रंग पैटर्न के कारण वह आती अमूर्तन की श्रेणी में हैं | ऐसा संभवतः इस कारण हुआ होगा कि पेंट करते समय इन कलाकारों ने विषय की तुलना में पेंटिंग्स को लेकर ज्यादा चिंता की होगी | टैक्सचर, रंगों के टोन तथा फोर्स पर बल देने को लेकर सभी में अपने-अपने ढंग की विशेषता है, सबने अपने-अपने ढंग से इन तत्त्वों का प्रयोग किया | कई तरह की समानताएं होते हुए भी सभी की अपनी-अपनी स्टाइल बनी, उनके चित्रों में उनकी स्टाइल को अभिव्यक्त होते हुए देखा गया और उनकी स्टाइल ही फिर उनकी पहचान बनी | कृष्ण खन्ना की पेंटिंग्स में - जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है - रंग ही फार्म है जो अंतर्वस्तु के बहुत अनुकूल प्रयुक्त हुआ है | कृष्ण खन्ना देश के उन शीर्षस्थ कलाकारों में हैं जिन्होंने समकालीन भारतीय कला को न केवल समृद्ध किया, बल्कि तमाम युवा कलाकारों को प्रेरित व दिशा-निर्देशित भी किया | कृष्ण खन्ना प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के अत्यंत सक्रिय सदस्य रहे और अपनी सक्रियता के भरोसे ही उन्होंने ग्रुप की कलात्मक व वैचारिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाई थी | जे. स्वामीनाथन उनके अच्छे मित्र थे लेकिन इसके बावजूद उनके साथ के अपने वैचारिक मतभेदों को प्रकट करने में उन्होंने कभी हिचक नहीं दिखाई | स्वामीनाथन दरअसल समकालीन भारतीय कला को भारतीय सौंदर्यशास्त्र, उसमें भी खासतौर से जनजातीय कला से विकसित करने के पक्ष में थे, जबकि कृष्ण खन्ना समकालीन कला को पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र की बजाये अंतर्राष्ट्रीय बनाने के पक्ष में थे | स्वामीनाथन इतिहास को मृत मानते थे, जबकि कृष्ण खन्ना व्यक्ति की ऐतिहासिकता को न सिर्फ स्वीकार करते थे बल्कि उसे महत्त्वपूर्ण भी मानते रहे | अमूर्तता की हदों तक पहुँचते-पहुँचते हुए भी अपनी पेंटिंग्स में कृष्ण खन्ना ने कभी आकृतियों को विलीन नहीं होने दिया; उन्होंने कभी शून्य में जाने की जाने की कोशिश नहीं की | अपनी पेंटिंग्स में, व्यक्ति की ऐतिहासिकता और ऐहिकता को पहचानने की कोशिश करते हुए उसे, उन्होंने लगातार व्यक्त करने का काम ही   किया | यही वह 'जगह' है - जहाँ उनकी राह स्वामीनाथन की राह से अलग होती है |
स्वामीनाथन और कृष्ण खन्ना के बीच के वैचारिक संघर्ष को दक्षिणपंथी व वामपंथी संघर्ष के रूप में भी देखा/पहचाना गया | हालाँकि कृष्ण खन्ना प्रचलित अर्थों में कभी भी वामपंथी नहीं रहे | स्वामीनाथन के साथ चले वैचारिक संघर्षों के बावजूद, कृष्ण खन्ना ने 'बैंड वाला' शीर्षक से सामाजिक यथार्थवादी विषयों पर जो
चित्र-श्रृंखला तैयार की थी, उसका कैटलॉग उन्होंने स्वामीनाथन से ही लिखवाया और स्वामीनाथन ने ही उसे लिखा |
कृष्ण खन्ना का जन्म 1925 में ल्यालपुर, पाकिस्तान का जो शहर अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है, में हुआ था |  जन्म के बाद लेकिन उनका परिवार लाहौर आ गया था, जहाँ वह पले/बढ़े | ग्रेजुएशन हालाँकि उन्होंने इंग्लैंड के इम्पीरियल सर्विस कॉलिज से 1940 में किया था | देश के विभाजन के बाद कृष्ण खन्ना का परिवार शिमला आ गया था | भारत में कृष्ण खन्ना ने ग्रिंडलेज़ बैंक में नौकरी प्राप्त की और उन्हें मुंबई में पोस्टिंग मिली | मुंबई में ग्रिंडलेज़ बैंक की नौकरी करते हुए ही कृष्ण खन्ना प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संपर्क में आये; और उसी संपर्क के साथ उन्होंने कला जगत में प्रवेश किया | कला से उनका परिचय हालाँकि लाहौर  में हो गया था, जहाँ उन्होंने मेयो कॉलिज ऑफ ऑर्ट में शाम की कक्षाओं में दाखिला लिया था | कला की औपचारिक शिक्षा के नाम पर उन्होंने यही कुछ किया था | मुंबई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संपर्क में आने के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं     देखा | देश में नहीं, विदेशों में भी कृष्ण खन्ना ने न सिर्फ अपनी कला को प्रदर्शित किया, बल्कि तमाम प्रशंसा व पुरस्कार भी प्राप्त किए | देश में भी उनकी कला  को खास सम्मान मिला | 1996 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया | मजेदार संयोग है कि कृष्ण खन्ना की पहली पेंटिंग टाटा समूह के टाटा इंस्टीट्यूट के डॉक्टर होमी भाभा ने खरीदी थी, तो सैफरन आर्ट द्वारा आयोजित इस पुनरावलोकन प्रदर्शनी को संभव बनाने में भी टाटा समूह की टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड का सहयोग रहा   है |
कृष्ण खन्ना के काम की सिंहावलोकन प्रदर्शनी को देखना अपने आप में एक खास अनुभव है | समकालीन कला में दिलचस्पी रखने वालों को यह प्रदर्शनी अवश्य ही देखना चाहिए | ललित कला अकादमी की दीर्घाओं में इस प्रदर्शनी को पांच फरवरी तक देखा जा सकता है | 

4 comments:

  1. राजेंद्र जोशीJanuary 26, 2010 at 5:46 PM

    कृष्ण खन्ना की पेंटिंग्स ने मुझे हमेशा उद्ववेलित किया है | खास तौर पर, 'मृत्यु' विषय को लेकर बनाई गई उनकी पेंटिंग्स को मैंने जब भी देखा है, अपने को बेचैन होता हुआ पाया है | मैंने कहीं पढ़ा भी है कि उनसे जब पूछा गया कि वह मृत्यु को केनवस पर उतारने की ज़रूरत क्यों महसूस करते हैं, तो उनका जबाव था कि क्योंकि उन्होंने मृत्यु को बहुत करीब से देखा है और उसका साक्षात्कार किया है, इसलिए पेंट करना शुरू करते ही वह खुद व खुद केनवस पर उतर आती है; उसे उतारने के लिये उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता | कृष्ण खन्ना ने विभाजन की जिस विभीषिका को नजदीक से देखा और भोगा है, उसे ही शायद उन्होंने मृत्यु से साक्षात्कार कहा है | इस बात को भी उन्होंने, तात्कालिक रूप में या हल्के-फुल्के अंदाज में नहीं बल्कि, बड़े संदर्भ में देखा है | यही कारण है कि उनकी पेंटिंग्स के विषय जीवन में मृत्यु तथा मृत्यु में जीवन हैं | स्थितियों को बड़े संदर्भ में देखने के कारण ही कृष्ण खन्ना समकालीन भारतीय कला के शीर्ष कलाकारों के बीच अपनी जगह बना पायें हैं |

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  2. संतोष अग्रवालJanuary 26, 2010 at 11:02 PM

    कृष्ण खन्ना ने कला की औपचारिक शिक्षा लिये बिना जो काम किया है, और उनके उस काम ने देश के ही नहीं बल्कि दुनिया के कला प्रेक्षकों को जिस तरह आकर्षित तथा प्रभावित किया है, वह वास्तव में चकित करने वाली बात है | कृष्ण खन्ना की उपलब्धियां उन लोगों के लिये प्रेरणास्त्रोत हो सकती हैं जो किसी भी कारणवश ऑर्ट कॉलिज नहीं जा पाते हैं |

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  3. राकेश सिंघलJanuary 26, 2010 at 11:15 PM

    कृष्ण खन्ना और जे. स्वामीनाथन के बीच के वैचारिक मतभेदों को आपने जिस तरह से प्रस्तुत किया है, उसमें आप मुझे जे. स्वामीनाथन के साथ अन्याय-सा करते हुए लगे हैं | हमें याद रखना चाहिए कि जे. स्वामीनाथन ने परंपरा में रह कर भी एक स्वतंत्र चेतना विकसित की और एक मौलिक चिंतन प्रस्तुत किया है | एक चित्रकार के रूप में जे. स्वामीनाथन ने जो कुछ भी किया है, समकालीन भारतीय कला परिदृश्य में वह खासा उल्लेखनीय है और उसका बहुत महत्त्व है |

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  4. मुकेश मिश्रJanuary 27, 2010 at 8:48 PM

    राकेश जी, कृष्ण खन्ना और जे. स्वामीनाथन के बीच के वैचारिक मतभेदों की प्रस्तुति में आपको जे. स्वामीनाथन के साथ अन्याय होता हुआ दिखा, यह मेरे लिये बहुत ही खेद की बात है | आप विश्वास करें कि मेरा ऐसा उद्देश्य बिल्कुल भी नहीं था | स्वामीनाथन की कला और एक चित्रकार के रूप में स्वामीनाथन के प्रति मेरे मन में अपार प्रतिष्ठा व सम्मान है; तथा उनकी कला या उनके साथ अन्याय करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता हूँ | मैं अपने पूरे विश्वास के साथ यह मानता हूँ कि स्वामीनाथन उन थोड़े से कलाकर्मियों में से हैं जो मनुष्य की अंतरात्मा व कला माध्यम के प्रश्नों को अटूट रूप से देखने में समर्थ रहे; और जिन्होंने जो कुछ भी कहा या किया वह सब हमारे लिये गहरा अर्थ रखता है | स्वामीनाथन का काम अनुभवातीत के सिद्वांत पर आधारित रहा और उन्होंने समकालीन भारतीय कला को जनजातीय कला के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया, और अपने इस प्रयास के कारण वह कृष्ण खन्ना या अन्य भारतीय कलाकारों की तरफ पीठ किए खड़े दिखे, तो इससे उनका कद छोटा कैसे व क्यों हो जाता है; और इस बात के जिक्र को उनके साथ अन्याय किए जाने के रूप में क्यों देखा जाये ? मैंने कृष्ण खन्ना और जे. स्वामीनाथन के बीच के वैचारिक मतभेदों के तथ्य को प्रस्तुत करने के साथ-साथ उन दोनों के बीच के भरोसे के तथ्य को भी रेखांकित किया है | इससे ही जाहिर होता है कि स्वामीनाथन के साथ किसी भी तरह का अन्याय करने की या कृष्ण खन्ना की तुलना में उन्हें छोटा बताने/दिखाने की मेरी कोई इच्छा या कोशिश नहीं थी | मैं एक बार फिर जोर देकर कहना चाहूँगा कि स्वामीनाथन तथा उनकी कला के प्रति मेरे मन में अपार प्रतिष्ठा व सम्मान है |

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