Monday, October 1, 2012

मानव आकृति की उपस्थिति न होने के बावजूद वीणा जैन के चित्रों में एक 'मानवीय उपस्थिति' को पहचाना/महसूस किया जा सकता है

वीणा जैन के चित्रों में अभिव्यक्त कल्पनाशील संयोजन में रंगों व रंगतों की पृष्ठभूमि में विचरण सा करते, जैसे तैरते और उभरते ऐसे रूपाकारों को भी पहचाना जा सकता है जो किन्हीं जीवित संवेगों और अनुभूत मनःस्थितियों के पर्याय हैं | इन रूपाकारों की 'उपस्थिति' बताती है कि अंततः वह एक गुंफन में हैं - किसी निर्धारित गुंफन में नहीं, बल्कि कहीं से शुरू होकर कहीं मिलने और फिर खोजने की मनःस्थितियों के गुंफन में | उनके चित्रों में के सभी अमूर्त रूप संकेतित भर हैं | वीणा उन चित्रकारों में हैं जिनके चित्रों में चित्रता गुण भरपूर हैं और चित्रभाषा की उपस्थिति, एक वास्तविक उपस्थिति लगती है - एक ऐसी उपस्थिति जो देखते ही बनती है और जो अपने विश्लेषण के लिए हमें तरह तरह से उकसाती भी है | चित्रभाषा उनके चित्रों में अच्छे अर्थों में रचनात्मक संयोग भी घटित होने देती है, लेकिन इसी तरह कि हम यह भी देख सकें कि वह अपने को बराबर साधे भी रखती है |
कोई भी कलाकार अपने माध्यम से भावना और अनुभव ही व्यक्त करना चाहता है | वह निजी और व्यक्तिगत अनुभव तो होता ही है; किंतु सिर्फ निजी और व्यक्तिगत नहीं, उनमें सार्वजनिनता अवश्य ही होती है | वह शाश्वत मानवीय अनुभवों की निजी और व्यक्तिगत अभिव्यंजना है | तभी कलाकार की अनन्यता और सार्वजनिनता, एक साथ सार्थक होती है |
वीणा पिछले काफी समय से अलग अलग स्रोतों से प्राप्त या तैयार किए गए प्राकृतिक रंगों में काम कर रही हैं और इन रंगों की एक 'समानता' के बावजूद उनकी विविधतापूर्ण गतियों के कारण हर बार उनके काम में हमें एक और गहराई दिख पड़ती है | वीणा प्रायः हर चित्र में रंग-वातावरण के लिए किसी एक प्रमुख रंग का इस्तेमाल करती हैं और इसी चित्रभूमि में अक्सर पूरी पृष्ठभूमि में फैले रूप उभर आते हैं | इन रूपों के संयोजन में फिर कुछ और रूप दिखते हैं या उनके वहाँ होने का आभास मिलता है | यह रूप या रूप-संयोजन जिन भंगिमाओं व मुद्राओं का आभास देते हैं, वह मानों समय के लिए हैं | समय जो 'अतीत' है, 'वर्तमान' है और 'अनागत' है | वीणा के चित्र रूप प्रायः सरलीकृत हैं - यह 'सरलीकरण' किसी कलाकार में एक दुहराव में भी बदल जा सकता था, लेकिन वीणा के यहाँ यह दुहराव में न बदल कर हर बार एक नये विस्मय में बदल जाता है | हम हर बार अनुभव करते हैं कि हम ने जो पहले देखा था, वह इससे मिलता जुलता तो था लेकिन ठीक ऐसा ही नहीं था | लेकिन ठीक वैसा न लगने में 'ही' उनकी कला की सार्थकता नहीं है - वह तो इसी बात में है कि वह हर बार अपने को एक भिन्न तरीके से सार्थक करती है | इसी सार्थकता के कारण उनमें एक लगाव हमेशा महसूस किया जा सकता है |
वीणा के चित्रों में मानव आकृति की उपस्थिति न होने के बावजूद उनमें एक 'मानवीय उपस्थिति' को पहचाना/महसूस किया जा सकता है | उनके चित्रों में दरअसल एक वातावरण है जो चौतरफा व्याप्त रहा है | यहीं यह भी याद कर लें कि प्रकाश के रूप में रंग या रंग के रूप में प्रकाश की बात अपने में कोई नई बात नहीं है, लेकिन वीणा के चित्रों में वह एक ताजगी और अपनी ही एक जरूरत से है | वीणा की चित्रभाषा पर भी गौर करें - उनकी रंग सामग्री कहीं घनी गाढ़ी है, तो कहीं वह इतनी तरल भी है कि पानी की चमकती सतह बन सके और कई बार बादलों जितनी भारहीन भी | ब्रश के स्पर्श या आघात, रंगों के निर्देश से 'विलग' नहीं हैं; अक्सर रंग ही हैं जो ब्रश की गतियाँ तय करते हैं | हम यह भी देखते हैं कि कई बार ब्रश की गतियाँ उनके कुछ चित्रों में रेखाओं की तरह हैं, ऐसी रेखाओं की तरह जो कुछ माप रही हैं |
शायद इसीलिए वीणा के चित्र मानसिक गतियों के दृश्यजगत का एक निचोड़ हैं, जो कुल मिला कर एक आत्मिक अनुभव में बदल जाते हैं | रंगों में यह निचोड़, रंगभाषा के बारे में हमारी संवेदना में बहुत कुछ जोड़ता है | दरअसल यहीं आकर हम यह भी पहचान सकते हैं कि वीणा के चित्रों ने हमारे ही रंगों के साथ हमारे मानसिक चाक्षुक बौद्धिक संबंध को उजागर किया है, और उनके रंग बोध के स्तर पर अपने समय के साथ चलने वाले भी सिद्ध हुए हैं; उन्होंने उनमें अर्थ भरे हैं और उनके साथ हमारे लिए एक संवाद की स्थिति पैदा की है |   
[जहाँगीर ऑर्ट गैलरी, मुंबई में 18 से 23 सितंबर 2012 के बीच 'स्केटर्ड मेमोरीज' (छितराई स्मृतियाँ) शीर्षक से आयोजित वीणा जैन की पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी के मौके पर प्रकाशित कैट्लॉग में भी इस आलेख को पढ़ा जा सकता है |]

1 comment:

  1. अति सुन्दर जानकारी वाला लेखन आदरणीय मुकेश जी !

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